गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

इति श्री असहिष्णुता कथा

***************वर्ष दो हजार पंद्रह अवसान की ओर अग्रसर है। साथ ही भारत में असहिष्णुता पर चर्चा- परिचर्चा भी समाप्त हो रही है। टीवी पटल से इस विषय का गायब होना और दूसरे विषयों का अवतरित होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके कई उदाहरणों में प्रथम भारत द्वारा पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना या दूसरा सोनिया जी व राहुल का दल -बल के साथ न्यायलय में उपस्थित होना है। किसी न किसी रूप में  यह असहिष्णुता सदियों से समाज के ताने -बाने में विद्यमान रही है। इतिहास साक्षी है कि पूर्व मध्य काल से आज तक,विदेशी आक्रान्ताओं और देशी दमनकारी शासकों  के लिए सहिष्णु भारत एवँ सहिष्णु भारतीय प्रशंसनीय रहे हैं क्योंकि हमारी सहिष्णुता पर ही उनकी असहिष्णुता फूलती - फलती रही है। बारहवीं सदी वाले उस काल -खण्ड को लोग आज भी याद करते हैं जिसमें सहिष्णु पृथ्वीराज चौहान बार - बार विजयी होने पर असहिष्णु एवँ आक्रान्ता मुहम्मद गोरी को छोड़ते गए और सन  ग्यारह सौ बानवे में आक्रमण कर जब उसने चौहान को पराजित किया तो उन्हें बन्दी बना कर अफगानिस्तान ले गया और यातनापूर्ण मृत्युदण्ड दिया।भारतीय इतिहास के हर नए पृष्ठ पर कुछ ऐसे ही घटनाक्रम झाँकते हैं। देशी राज्यों में आपसी असहयोग एवँ स्वभावगत सहिष्णुता के कारण लगातार बाहरी आक्रमण होते रहे और हमारे देश का इतिहास, भूगोल एवँ समाज  बदलता रहा। वर्तमान भारत में उसी समाज की नई         पीढ़ियाँ  बसती हैं जिसमें ढेर सारे अयोग्य एवँ असहिष्णु लोग भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के सहारे समाज में स्थान बना लिए हैं। आज की भारतीय जलवायु में जब शुद्ध धर्मनिरपेक्षता,प्रखर राष्ट्रवाद एवँ सबके विकास की बात होने लगी है तो ऐसे लोगों में घबराहट हुई है और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वे सरकार और उनके समर्थन वाली जनता को असहिष्णु बनाने लगे हैं।यदि इस दबाव को निष्प्रभावी नहीं किया गया तो सरकार अपने मुद्दों से भटके गी और कुचक्र चलनेवाले अपने मंतव्य में सफल हो जाँयगे।
***************कोई घटनाक्रम नहीं अपितु दो घटनाएँ थीं जिनकी पृष्ठभूमि में वर्तमान असहिष्णुता का वितान रचा गया। ये थीं -कन्नड़ भाषा के साहित्यकार श्री कुल्बर्गी की हत्या एवँ दादरी में बीफ खाने की अफवाह पर अखलाक नामक एक व्यक्ति की पिटाई से मौत।दोनों ही घटनाएँ कानून व्यवस्था से जुड़ीं हैं और राज्य सरकारों का प्रथम दायित्व है कि हर नागरिक के जान -माल उसके संवैधानिक अधिकारों को चुस्त दुरुस्त सुरक्षा प्रदान करें।यदि ऐसा करने में राज्य सरकारें विफल होती  हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का कोई औचित्य नहीं है। अतः अतीत के पुरस्कार विजेताओं में यदि कुछ लोगों को विरोध जताने की बात सूझी तो उन्हें कर्नाटक की काँग्रेस एवँ उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकारों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए था न कि केंद्र की गठबन्धन सरकार के बिरुद्ध। पूरे देश ने देखा कि दोषी कौन और कठघरे में खड़ा किसको किया गया।उद्देश्य एक ही था कि मारो कहीं लगे वहीँ।
***************यह सर्व विदित है कि किसी व्यक्ति को पुरस्कृत होने के लिए उत्कृष्टता के साथ एक अहं मापदण्ड पुरस्कार देने वाली सरकार या संस्था का ,विचारधारा आधारित, पसन्द भी होता है। पुरस्कृत होने पर  प्राप्त कर्ता को अल्पकालिक एवँ दीर्घकालिक दो प्रकार के लाभ होते हैं यथा एकाएक व्यक्ति को ख्याति मिलती है ,अपने क्षेत्र में उसकी पूछ बढ़ती है और भविष्य में सरकारी एवँ गैर सरकारी सुविधाओँ के लिए उसकी पात्रता बढ़ती है।यही कारण है कि गैर राष्ट्रवादी सरकारों के दौर में वामपंथी ,काँग्रेसी ,क्षद्म धर्मनिरपेक्षी और गैर हिंदूवादी विचारों वाले साहित्यकार ,समाजसेवी  वैज्ञानिक ,सिनेधर्मी ,संगीतज्ञ इत्यादि खूब पुरस्कृत होते रहे और दीर्घकालिक लाभ उठाते रहे।इन आदरणीयों में कुछ लोग  ऐसे भी हैं जो राष्ट्रवाद , वहुसंख्यकवाद एवँ मूल धर्मनिरपेक्षता को अपने एवँ देश के लिए अस्पृश्य मानते हैं। फलतः बेमेल विचार की व्यवस्था में ऐसे लोगों के सर्वकालिक लाभ भी बाधित  हुए । फिर क्या कुल्बर्गी या दादरी के बहाने , घटती आदरणीयता वाले  ये लोग सरकार के ऊपर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिए। साहित्य अकादमी के सदस्य ,पैंतीस पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकार ,समाजसेवी,रंगकर्मी ,नेता. पुरस्कारों से जुडी संस्थायें इत्यादि मैदान में कूद पड़े। मीडिया के मैदान में भयंकर वाकयुद्ध हुआ कि सरकार असहिष्णु हो गई या नहीं।  अंततः मिथ्या बादल छँटने लगे और देशवासी समझ पाये कि असहिष्णु कौन हैं। वस्तुतः एक बहुमत से चुनी सरकार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी असहिष्णुता है।
***************************** पूरी दुनियाँ में अपनी श्रेष्ठता एवँ स्वार्थपूर्ति के लिए विभिन्न समुदाय  के लोगों में दूसरों के प्रति  असहिष्णुता रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह बढ़ती ही जा रही है। संभवतः यही असहिष्णुता भविष्य में  विनाश का कारण बने क्योंकि हम एक दूसरे के लिए ही नहीं बल्कि अपनी धरती पहाड़  ,पर्यावरण  ,जल ,वायु ,जीव -जन्तु सबके प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं।असहिष्णुता के एक से बढ़ कर एक गम्भीर विषय दुनियाँ के सामने हैं। अतः असहिष्णुता -असहिष्णुता का खेल खेलने वालों को सोचना होगा कि कौन सी असहिष्णुता की बात कर रहे हैं। दादरी एवँ बंगलुरू वाली लकीरों के सापेक्ष तो जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार व लाखों हिन्दुओं का घाटी से पलायन या सन चौरासी में  श्रीमती  इन्दिरा ग़ांधी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार की लकीरें बहुत बड़ी थीं। लगता है कि उस समय उन्हें असहिष्णुता की याद नहीं आई।बांग्ला देश की लेखिका तस्लीमा नसरीन  ने ऐसा कुछ कह कर,  कि भारत में जो मुसलमानों की बात करे वह धर्मनिरपेक्ष (सहिष्णु ) और जो हिन्दुओं की बात करे वह हिंदूवादी ( असहिष्णु ) ,ऐसा आईना दिखाया है कि तथाकथित आदरणीयों को अपनी कुरूपता के लिए पूरे राष्ट्र से क्षमा माँगनी चाहिए।
***************परन्तु केंद्र सरकार को भी विरोधिओं के मिथ्या आचरण व उनके उद्देश्य से सतर्क हो जाना चाहिए। असहिष्णुता ठण्डी पड़ेगी तो भ्रष्टाचार को गरमा जाय गा ,एक मंत्री का कोई वक्तव्य ठण्डा पड़ेगा तो किसी दूसरे मंत्री या भाजपाई का वक्तव्य उछाल दिया जाय गा। अर्थ व्यवस्था को गति देने के लिए जीएसटी जैसे कानून चाहिए तो राज्य सभा में बहुमत के बल पर वे ऐसा होने नहीं देंगे ,मुद्दों की कमी होगी तो प्रधान मंत्री को प्रवासी भारतीय बनायेंगे अथवा उनके पहनावे पर कटाक्ष करें गे और देश विदेश में ऐसा वातावरण बनायें गे कि मेक इन इंडिया की ऐसी तैसी हो जाय। संसद तो इस लिए चलने नहीं देंगे क्योंकि उनके शासनकाल में भाजपा वाले भी गतिरोध पैदा किये थे। ये लोग  सौहार्द ,आर्थिक विकास एवँ रोजगार के अवसरों को बाधित करने का पुरजोर प्रयास करेंगे।इनके षड्यन्त्रों  को निष्फल करने ,अपने चुनावी वादों को पूरा करने एवँ जनता से सक्रिय संवाद बनाये रखने में ही वर्तमान सरकार एवँ देश की प्रगति का मंगलकारी भविष्य छिपा है।
***************सारी दुनियाँ सहमत है कि गाँधी की अहिँसा सहिष्णुता की आदर्श अवस्था है और समाज में इसी की स्थापना के लिए असहिष्णुता के विरुद्ध हिंसात्मक संघर्ष होते हैं। यह प्रवृत्ति बहुदा दबती हुई तो पाई गई है परन्तु किसी भी संस्कृति में कभी भी समूल नष्ट होते नहीं पाई गई है। इसका कारण शायद  इसी तथ्य में छिपा है कि सामाजिक होने के साथ ही मनुष्य एक जानवर है। फिर भी सामाजिकता के नाते मनुष्य यदि मनुष्य से मनुष्यता का व्यवहार करे तो असहिष्णुता न्यूनतर होती जायगी और मानवता गाँधी के सपनो वाले राम राज्य को प्राप्त कर लेगी।मानव जाति में भी जिन्हें समाज आदरणीय कहता है उन्हें आदरणीयता के मापदण्ड पर सदैव खरा उतरना होगा वरन रँगा सियार की कहानी सत्यार्थ होगी।इति श्री असहिष्णुता कथा।----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,तिथि :२४ दिसम्बर 2015                    mangal-veena.blogspot.com
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शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

क्या होगा बिहार का

***************बिहार में नई सरकार बनाने हेतु चुनाव प्रक्रिया जारी है।परिणाम बतायें गे कि वहाँ के मतदाता अपने पूर्वाग्रह पर  पूर्ववत  डटे हुए हैं या रूढ़ियों को तोड़कर विकास व प्रगति की धारा में अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा का विचार बनाते हैं। यह चुनाव सरकार के बदलाव के साथ वहाँ के मतदाता की अपेक्षाओं को नए ढंग से परिभाषित करने एवँ पाने का सुअवसर भी है।हम सभी जानते हैं कि स्वतन्त्र भारत में समान अवसर की उपलब्धता व बिहार वासियों की बेहतर बौद्धिक सम्पन्नता के बाद भी बिहार से राजनीतिक गांभीर्य गायब हो गया ,शिक्षा अशिक्षित शिक्षा हो गई और सामाजिक पिछडापन वहाँ का ट्रेड मार्क बन गया। न बिहारियों का दूसरे राज्यों में तीब्रतम पलायन बन्द हुआ ,न दूसरे राज्य के लोगों का बिहारियों के प्रति दृष्टिकोण बदला। सामाजिक पिछड़ापन दूर करने केलिए जो आरक्षण की व्यवस्था हुई उससे कुछ वर्गों के पिछड़ेपन को दूर होने की क्या बात हो ,उल्टे पूरा बिहार ही पिछड़ गया। फिर क्या इसके साथ  हीनभावना पैदा करने वाला बीमारू राज्य जैसा नाम नत्थी कर दिया गया। अब बीमारू राज्य को स्वास्थ्यलाभ के लिए विशेष पैकेज की माँग हो रही है और यह इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा है।
***************वैसे तो बिहार में किसी भी जाति का प्रतिशत घनत्व इतना नहीं है कि अकेले अपने दम पर किसी प्रत्याशी को विधायक या सांसद का चुनाव जिता दे परन्तु जातिवादी नेताओं के गठजोड़ के कारण जब दो या दो से अधिक जातियों के ध्रुवीकरण का मायाजाल फैलता है तो अयोग्य एवँ जातिवादी लोग विधान सभा और संसद में पहुँचने में सफल हो जाते हैं और प्रदेश एवँ देश की बर्बादी के कर्ता और कारण बनते हैं। शिक्षा को पटरी से उतार देने से बिहार की आम जनता में जाति ,धर्म ,आम जनोपयोगी कानून  व विकास का घाल मेल हो गया। यदि इस प्रदेश में समृद्ध शिक्षा का समुचित विकास हुआ होता तो मतदाताओं में यह जागृति अवश्य होती कि जाति और धर्म का अलग क्षेत्र है जिसमें हमें जीना चाहिए , गर्व करना चाहिए ;साथ ही दूसरे की जाति व धर्म का समादर करते हुए अपने जाति व धर्म की उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।ऐसा होने पर यह भी जागृति  होती कि विधायिका एवँ संसद का क्षेत्र विकासोन्मुखी एवँ व्यवस्थादायी क़ानून बनाना तथा विकास  एवँ कानून की व्यवस्था का सुनिश्चितीकरण है। फिर तो जनता यही क्षीर -नीर विवेक वाला सूत्र अपना लेती और विश्व में सबसे पहले जनतंत्र का प्रयोग करने वाला बिहार आज अपना खोया वैभव पुनः प्राप्त कर, अन्य राज्यों के लिए ,मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकता है। देखना होगा कि जाति ,धर्म से अलग हट कर विकास एवँ विकासोन्मुखी विधायिका के लिए चुनाव लड़ रहे दलों व प्रत्याशियों का क्या हश्र होता है।
***************एक विधायक कैसा हो ,इसका सीधा -साधा मानक हर मतदाता को पता है। फिर भी स्वार्थी दल व प्रत्याशी मिथ्या प्रचार से ऐसी मृग मरीचिका तैयार कर रहे हैं कि मानक या कसौटी के मापदंड ही दृश्यपटल से ओझल हो जाँय और मरीचिका में हिरन का शिकार हो जाय। जातिवाद ,धर्मवाद ,आरक्षण ,गो रक्षा या गो हत्या ,दलित उत्पीड़न ,बलात्कार ,पड़ोसी पाकिस्तान से संबंध और कालिख का पोता -पोती ,राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर तंजकसी और पूँजीवाद जैसे मुद्दे इस चुनाव के लिए गढ़े और उछाले जा रहे हैं जिनका उद्देश्य चुनाव को मूल उद्देश्य से भटकाना है।इसी कड़ी में तथाकथित साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर चुनावी संग्राम को एक नया मुद्दा दिया है।सैक्युलरिज्म के भ्रामक प्रचार से वैसे ही स्वार्थी नेता  इस राष्ट्र के विकास को बाधित किए हुए हैं।इन भूलभुलैयों से बाहर निकलना बिहार के मतदाताओं के लिए एक कठिन परीक्षा है।
***************चुनाव परिणाम के बाद बिहार का राजनीतिक स्वरुप देश की भावी दिशा एवँ गति को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करे गा।यदि भ्रामक मुद्दों की पराजय होती है तो विजय का मुकुट बिहार के नव युवतिओं और युवकों के सर पर होगा तथा प्रगति एवँ विकास वादी बिहार का उदय होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो मानना ही होगा कि चक्रव्यूह में अभिमन्यु अभी भी फँसा हुआ है। सत्ता ही नहीं विपक्ष में भी जो विधायक चुन कर आएं गे उनकी पृष्ठभूमि ,सोच व रुझान से लोकतान्त्रिक प्रणाली में त्रुटि ,संतुलन और सुधार की धनात्मक या ऋणात्मक लालसा का संकेत होगा। कोई भारत वासी नहीं चाहता कि कमाई ,दवाई और पढाई के लिए बिहार के लोग परप्रांतों पर निर्भर रहें। सराहनीय स्थिति वह होगी कि उलटी गंगा बहे। नई सोच के लोग यह भी देखने को उत्सुक हैं कि बिहार के नेताओं को मतदाता हमेशा केलिए उनके यथोचित स्थान पर पहुँचायें गे अथवा नौटंकी जारी रहे गी और थाप पर दर्शक जुटते रहें गे।---------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 24 अक्टूबर 2015
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

लोग हिन्दियाने लगे हैं

***************लोग हिन्दियाने लगे हैं और हिंदी की चाटुकारिता कर चाय पानी पीने लगे हैं। यह पक्का प्रमाण है कि हिंदुस्तान में हिंदी पखवारे का आगमन हो गया। इस पर्व को पन्द्रह दिनों तक मनाने के लिए सरकार प्रचुर धनराशि खर्च करती है। इस लिए पैसे की स्वीकृति पूर्व में ही करा ली जाती है। फिर क्या हर कार्यालय के प्रमुख ,हिंदी अधिकारी व कर्मचारी नेमी कार्यों से विरत हो नित एक नया कार्यक्रम आयोजित करते हैं और स्मृतिचिन्ह ,पुरस्कार व जलपान में पैसे समायोजित करते हुए हिंदी को भरपूर उपकृत करते हैं।इस पखवारे में ऐसे निठल्ले कहे जाने वाले कर्मचारियों की ,जिन्हें केवल हिंदी लिखना ,बोलना आता है, उनकी वैसे ही पूछ बढ़ जाती है जैसे शरद ऋतु में खञ्जन पक्ष की। गैर हिंदी भाषी  कर्मचारी जिन्हे थोड़ी बहुत हिंदी आती है वे तो इस पखवारे में साइबेरिया से आये प्रवासी पक्षियों की भाँति गोष्ठियों में दर्शनीय व शोभनीय हो जाते हैं।जहाँ चाह है वहाँ राह है। दो चार लोग वाद -विवाद ,टिप्पण , टंकन,लेखन ,आलेखन इत्यादि में भाग लेने केलिए जुटा लिए जाते हैं। निर्णायक की भूमिका के लिए हिंदी के लाभार्थी तथा व्याख्यान के लिए धनार्थी हर कार्यालय को बड़ी सुगमता से मिल जाते हैं। चूँकि पैसे से जुड़ा है अतः प्रिंट एवँ इलेक्ट्रानिक माध्यमों की भी सहभागिता हो जाती है। बड़े ही आनन्दमय वातावरण में"अगले बरस फिर अहियो साथ में ज्यादा बजट ले अहियो' की कामना के साथ विभागाध्यक्षों द्वारा पखवारे का समापन कर दिया जाता है। फिर वही यक्ष प्रश्न कि लेखा डेवढ़ा थाहे तो लड़के डूबे काहे ?
***************स्वाधीन भारत में हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने एवँ,इसके प्रचार प्रसार हेतु दशकों से हर वर्ष यह सरकारी पर्व मनाया जा रहा है परन्तु हिंदी देश की राजनीतिक देहरी पर, अपने हक़ के लिए, सात दशकों से अनवरत खड़ी है।हमारे नेता इसे राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की बात करते हैं परन्तु राष्ट्र भाषा बनाने की चर्चा से कन्नी काट जाते हैं। प्रारंभिक दिनों में बाबुओं द्वारा सरकार के ज्ञाप ,परिपत्र  या पत्र अंग्रेजी में जारी हो जाते थे और नीचे लिख दिया जाता था -हिंदी वर्जन फलोज। आश्चर्य है आज भी वैसा ही हो रहा है। इस प्रक्रिया को हिंदी की नियमित मासिक प्रगति रिपोर्ट बनानेवाले बाबू इतने वर्षों में उलट तक नहीं सके कि कोई अभिलेख हिंदी में पहले जारी हो और उस पर लिखा हो कि अंग्रेजी अनुवाद साथ -साथ।हमारे लोकतंत्र में विश्वसनीयता  के पैमाने पर सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है परन्तु आज तक उसे भी चिन्ता नहीं हुई कि वह जो फैसले अंग्रेजी में देती है उसका सीधा सम्वन्ध जनता से है जिसकी मातृ भाषा हिंदी है या हिंदी की सहोदरी भाषाएँ। ऐसे में फैसले भी वकील या उन जैसे दुभाषिये पढ़ कर न्याययाची को बताते हैं।ये न्याय देने वाले भारतीयता का कौन सा आदर्श उच्च या निचले न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जनहित की सोचने वाले जनहित का मरम जानने में विफल हैं।अब वे तर्क बेमानी लगते हैं कि हिंदी में तकनीकी शब्दावली क़ी कमी है या विज्ञानं,अभियांत्रिकी ,अंतरिक्ष ,कानून जैसे विषय हिंदी में ब्यक्त नहीं हो पाते। भाषाओँ की दूरियाँ मिट रही हैं। अंग्रेजी का ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष प्रति संस्करण अनेकों हिंदी के शब्द आत्मसात कर रहा है। वैसे ही हिंदी में अन्य भाषाओँ के अनेकानेक शब्द घुल मिल रहे हैं।जिन शब्दों के अन्य भाषाओँ में समानार्थी नहीं होते वे शब्द हर भाषा के लिए सर्वमान्य रूप में लिए जाते हैं। भाषा पर महात्मा गाँधी के यही विचार थे जब वे हिंदुस्तानी भाषा पर बल देते थे। अतः इस बहकाने वाले कुतर्क से हट कर उस मन्तब्य को सामने लाना चाहिए जो हिंदी से भेद भाव का मूल कारण है।
***************इस भेद भाव की नींव भारत की पराधीनता के दिनों में पड़ी जब अंग्रेज शासन करते थे। उनकी अपनी शासन शैली थी जिसमें वे अपनी अँग्रेजी भाषा ,अपनी सभ्यता ,अपनी जाति एवँ अपनी शिक्षा को पूरी दुनियाँ में सर्व श्रेष्ठ मानते थे।वे लोग लम्बे शासन काल में देशी साधन संपन्न लोगों को अपने साँचे में ढाल कर कर देशी अंग्रेज बनाते गए। स्वतंत्रता मिलने तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की जड़ें बहुत सुद्दृढ की जा चुकी थीं और देशी अंग्रेज़ या इंडियन, अंग्रेजियत के साथ, सत्ता सँभालने के लिए तैयार हो चुके थे। फिर क्या था ये देशी इंडियन सत्ता सँभाल लिए और देशी भाषाओँ को भारतीयों की भाषा तक सीमित कर आज तक भारत पर नियंत्रण किये हुए हैं।ये इंडियन ही भारती एवँ भारतीयता के अहित साधक है जो हिन्दी पखवारा का आयोजन कर करा कर हिन्दी भाषियों को तुष्ट करने का उपक्रम करते हैं।परन्तु साठ करोड़ से भी अधिक देशी हिंदी भाषी एवँ दुनियाँ में फैले भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा के साथ हो रहे दुर्भाव को सहन करते हुए आज भी उसकी सेवा तथा प्रचार -प्रसार में अनवरत लगे हुए हैं।ये असंख्य हिंदीभाषी अपनी इस मातृ भाषा को विश्व की सम्पन्नतम व सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में पहचान दिला चुके हैं और उसे वह हर प्रतिष्ठा भी दिलायें गे जो साहित्य ,कला ,लालित्य से ओतप्रोत एक जीवंत लोकप्रिय भाषा को मिलनी चाहिए।हिंदी का गंतब्य राजभाषा ,संपर्कभाषा से आगे राष्ट्र भाषा के रास्ते विश्व भाषा बन कर अन्तरिक्ष के अनंत रहस्यों तक है।
***************हिंदी पखवारा जैसे आयोजनों के औचित्य पर भी हिंदी साधकों के दो परस्पर विरोधी धड़े हैं।एक निःस्वार्थ साधकों का वर्ग है जो पूर्व ऐतिहासिक काल से अर्थात संस्कृत वांग्मय से उद्गमित होने से अब तक इस भारती की सेवा तल्लीन है। दूसरे वर्ग में  हिन्दी के लाभार्थी साधक हैं जिनकी परम्परा बीर गाथा काल के चारण अथवा भाटों से आरम्भ हो भक्ति एवँ रीति काल के दरबारी साहित्यकारों से होते हुए आधुनिक काल के सरकारी सजावटी साहित्यकारों तक है।निःसंदेह दोनों वर्ग के साधक आज की आधुनिक हिन्दी के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं परन्तु हिंदी को श्रेष्ठता की धार देने वाले निःस्वार्थ साधक रहे हैं जिन्होनें हिंदी की सेवा स्वान्तःसुखाय की है या कर रहे हैं। यह वही परम्परा है जिसका श्रीगणेश गोस्वामी तुलसी ने यह लिख कर किया कि भाषाबद्ध करब हम सोई ,मोरे मन भरोस जेहि होई।कारण बताया कि कीरति ,भनति ,भूति भल सोई,सुरसरि सम सबकर हित होई।अतः हिंदी के निःस्वार्थ सेवक,हिन्दी के कामिल बुल्के सरीखे विदेशी विद्वान व विदेशी शैक्षिक संस्थान सभी भूरि -भूरि प्रसस्ति के पात्र हैं।
***************इन वर्गद्वय के आलावा हिन्दी को बुलन्दियों पर पहुँचाने वालों में हिन्दी के चलचित्रों,हिंदी टीवी के समाचार व मनोरंजन के कार्यक्रमों ,हिन्दी के समाचार पत्रों तथा विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों का भी प्रथम पंक्ति में गणनीय योगदान रहा है। हिंदी में जीने वाले राजनेताओं ने भी कभी -कभी विश्व मंच से हिन्दी के लिए भारत देश को गौरवान्वित किया है। हिंदी फ़िल्मी गानों ,चलचित्रों ,भारतीय संगीत ,योग ,जय हो ,नमस्ते या सबका साथ सबका विकास का तो कहना क्या?ये पूरी दुनियाँ में हिन्दी की दुंदुभी बजा रहे हैं।देश के शिक्षा संस्थानों के लिए भी, संकोच से बाहर होकर, नेतृत्व करते हुए हिंदी के प्रति अपने दियित्व निर्वहन का यह स्वर्णिम समय है। मंच कोई भी हो, पखवारा हो या न हो , यदि हम भारतीय हिन्दी भाषी होने पर गर्व करें और आत्मविश्वास से हिन्दीमय ब्यवहार करें तो सबसे आगे होगी हिंदुस्तानी (हिंदी )। जो आनन्द हिन्दुस्तानिओं को आपस में हिन्दियाने में है वह और कहाँ।    ------------------------------ मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 18 . 09. 2015 -------------------mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 7 सितंबर 2015

पावसनामा

***************रीतिकालीन "बरसा ऋतु सुखदानि जग ,तुम सम कोऊ नहीं" के विपरीत विदाई की ओर अग्रसर बरसात ने जनता की उलझने और उलझाई।ग्रीष्म के महीनों में मौसम विज्ञानियों ने यह कह कर कृषकों की उलझन बढ़ा दी कि इस वर्ष बरसात औसत से कम होगी। अर्थ व्यवस्था पर इसके कुप्रभाव एवं सरकार की तैयारियों पर चर्चा भी चल पड़ी। परन्तु जब वर्षा होने लगी तो ऎसी हुई कि तीन चौथाई देश जलमग्न हो  गया। बादल ऐसे फटे कि गाँव के गाँव अस्तित्व खो बैठे।समाचारों के अनुसार बाढ़ और बरसात से पूर्व की भाँति काफी जन धन की हानि हुई है जब कि कथनी के अनुसार सरकारें भी अति सक्रिय रहीं।पता नहीं ये मिथ्या पूर्वानुमान लगाने वाले सूखे का लाभ उठाने वालों को सही समय का संकेत दे रहे थे या देश के एक युवा नेता की तरह अपनी विशेषज्ञता की ढफली बजा रहे थे।इस पावस ने यह भी देखा कि गुण्डे ,लुटेरे ,हैवान खुलेआम आम आदमी एवँ उनकी बहन ,बेटियों की मर्यादा तार -तार करते रहे और चोर लुटेरे जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ साफ करने का रिकार्ड बनाते रहे। राज्य सरकारें जिनके हाथ कानून व्यवस्था है वे सुरक्षा सुनिश्चित करने से ज्यादा यह प्रचारित करने में लगे रहे कि अन्य राज्यों की तुलना में उनके यहाँ कम अपराध है।घटना घटने के बाद अपनी रीति के अनुसार हमेशा देर से पहुँचने वाली पुलिस और प्रशासन के लोग खानापूर्ति करते हुए जनता की जले पर नमक छिड़कते रहे। थोड़े और समय बाद जब विभिन्न दलों के नेता  पहुँच कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए घड़ियाली आँसू बहाना नहीं भूले तो शासन और सरकार से जनता को अत्याधिक घृणा हुई।  भुक्तभोगियों की हर प्रतिक्रिया नक्कारखाने में तूती सिद्ध होती रही है।लोकतंत्र से जनता अपने हक़ और सरकार के कर्तव्यों की अपेक्षा करती है पर सरकारें उन्हें अपनी कुटिल कृपावृष्टि से उपकृत कर रही हैं।ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं जो देश को बहुत हानि पहुँचा रही हैं।नई केंद्र सरकार द्वारा इस ऋतु में भी कुछ ऐसा होते नहीं दिखा कि इंडिया भारत बनने या भारत इंडिया बनने की ओर अग्रसर हों।ऐसे में पूर्व की भाँति जनता को न्याय पालिका एवँ मिडिया का वही सहारा रहा जो डूबते को तिनके से मिलता है परंतु कर्तव्य एवँ सुविधा के बीच स्वयं इनकी उलझन चिन्ता की लकीरें खींच रही हैं।
***************दूसरी ओर वर्षा ऋतु में हमारे देश की सड़कें ,रेल व बिजली व्यवस्था भी पानी -पानी हो गईं और लोगों की जान से जी भर के खेलीं ।जिन्हे लोगों के जान माल की चिंता होनी चाहिए वे सोचते हैं कि यह तो सामान्य बात है क्योंकि व्यवस्था  जनता के लिए है तो जनता ही भुगते गी भी।परन्तु आम आदमी क्या चाहता है ,यह कोई इतनी गूढ़ पहेली नहीं है। जहाँ जनता को चाहिए सुरक्षित ससमय रेलयात्रा वहाँ बार -बार हो रही रेल दुर्घटनाएँ उन्हें मौत का भय दे रही हैं और सरकार तीब्र द्रुतगामी रेल के सपने दिखा रही है। जहाँ उन्हें चाहिए टिकाऊ ,समतल, पक्की सड़कें वहाँ उन्हें दी जा रही है - अल्पावधि में गिट्टियाँ उधड़ी ऊबड़ -खाबड़ जानलेवा सड़कें जिन पर प्रतिवर्ष लाखों लोग दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।सरकार को तो दिखता ही नहीं कि बरसात में कुछ सडकों ने ताल -तलैया का रूप ले लिया और आस -पास बिखरी गिट्टियाँ उन पर चलने वालों के हाथ -पैर तोड़ रही हैं। आम लोग हैरान -परेशान हैं कि ये सड़कें क्यों बनाई जाती हैं। यदि सरकार के पास कोई दक्ष ,ईमानदार और सक्षम व्यवस्था नहीं है तो पहाड़ों को तोड़ कर पर्यावरण को हानि पहुँचाने ,पत्थर की गिट्टियों को समतल भूमि पर छींटने या यही क्रम बार -बार दुहराने और जनता के पैसे बर्बाद करने का सरकार को कोई हक़ नहीं है। लोग अपने को सत्ताधारी ,सरकारी एवँ गैरसरकारी लुटेरों के हाथ लुटते पा रहे हैं और अपनी नियति को कोस रहे हैं।कुछ साल पहले तक कच्ची सड़कें थीं या कम रेल सेवाएँ थीं तो क्या आज जैसी जानमारू तो नहीं थी।नई सड़कें बनती जा रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें लाखों किलोमीटर सड़क व पुलों के निर्माण होड़ में लगी हैं परन्तु पुरानी सडकों की दयनीयता को कोई देखने वाला नहीं। बिजली की आँख मिचौनी ने जीना दूभर कर रखा है ऊपर से पुराने जर्जर तार बरसात में सडकों एवँ गलिओं में टूट कर गिर रहे हैं और लोगों के जान ले रहे हैं। इसकी चिंता छोड़ नए तार बिछाए जा रहे हैं।जनता क्यों न सोचे कि विशेष अभिरुचि के कारण भी विशेष होते हैं।
**************इस पावस में बच्चों की शिक्षा एवँ सरकारी स्कूलों की दुर्दशा  ने आम लोगों को खूब झकझोरा ;यहाँ तक कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहबाद को सख्त निर्णय सुनाना पड़ा कि नेता एवँ अधिकारियों के बच्चे अनिवार्यतः सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जाँय तभी सरकारी विद्यालयों की दशा सुधरे गी। जरा उस मनोदशा को सोचें जब कृषक या श्रमिक खेतों में जूझ कर घर आते हैं और बैठक में सुस्ताते जब घर का कोई सदस्य कहता है कि रीता और रितेश को फिर सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही भेजना होगा, क्योंकि बाजार में चल रहे अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूल बहुत ज्यादा दाखिला फ़ीस माँग रहे हैं। घर का बूढ़ा मुखिया धुँधली नज़रों से आसमान की ओर देखता है। न उसे तारे दिखते हैं न ही सुनहरी चाँदनी। मानो देसी सरकार रूपी बादलों ने उनके भविष्य को अंधकार से ढँक लिया हो।फिर थका हारा  चिंतित परिवार अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य पर इस चर्चा में लग जाता है कि देश में दो प्रकार के स्कूल क्यों। ये नेता कौन सी आजादी की बात करते हैं ? यदि सरकारी स्कूल ही ठीक से चलाते तो हम प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में बच्चे पढ़ाने को क्यों तरसते। वाह रे, स्वराज के अरसठ साल बाद वाले सरकारी स्कूल --जर्जर भवन ,इक्के -दुक्के मास्टर ,न कापी न किताब।शिक्षा का कोई माहौल नहीं परन्तु मध्यान्ह भोजन की चिंता अवश्य हो रही है। ये सरकारी स्कूल क्या हैं - साक्षात शिशु शरणार्थी गृह। अंततः मुखिया निर्णय लेता है कि उसका बेटा अपने बच्चों व पत्नी के साथ शहर जाय। वहीँ अपनी रोजी तलाशे और किसी अच्छे स्कूल में बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करे।बूढ़ों के बुढ़ापे की चिंता छोड़ लोग बच्चों की पढाई हेतु शहर की ओर भाग रहे हैं।उस विकास को क्या कहा जाय जहाँ अच्छी शिक्षा अमीरों के लिए आरक्षित हो गई, नौकरियाँ सामाजिक पिछङों को आरक्षित हो गईं और गरीबों को परवश हो कराहने व वोट देने के लिए छोड़ दिया गया।उस बरसात को भी क्या कहा जाय जिसमें लोगों को घर छोड़ शहर की राह पकड़नी पड़े जबकि हमारी परंपरा चतुर्मासा में प्रवास पर जाना वर्जित करती है। शिक्षक दिवस को राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने मुखर्जी सर बन कर विद्यार्थियों को पढ़ाया ;वहीँ प्रधान मंत्री जी ने सीधे विद्यार्थियों से संवाद किया।यह शिक्षा सुधार की दिशा में एक नव युगारम्भकारी पहल हो सकता है परन्तु तभी जब अंतिम पंक्ति में बैठे साधनहीन विद्यर्थियों को पब्लिक स्कूलों की सुविधा देते हुए उनकी कक्षा में ऐसे दिवस मनाये जाँय गे।भारत और इंडिया अलग -अलग शब्द  होना छोड़ एक शब्दार्थ बनाने का प्रयास करते भी नहीं दीख रहे हैं।    
*************** बीते पावस से जनताको सुखद आस थी कि सरकार जीएसटी विधेयक पारित कर देगी  जिससे उपयोग की जिंस सस्ते दामों पर मिलने लगेंगी। कर के नाम पर ठगहारी व लूट बन्द हो जाय गी। परन्तु ऐसा हो न सका। जो सत्ता खो कर विपक्ष में बैठे हैं ,ऐसा भष्मासुरी नाच संसद और संसद के बाहर नाचे कि जनता ठगी कि ठगी रह गई।जनता के कई सौ करोड़ रुपये इनके इस नौटंकी आयोजन पर खर्च हो गए।ऊपर से इन शर्मविहीन सांसदों ने लोकलाज को किनारे रख अपने बेतन ,भत्ता व छूट वाले भोजन का पावस में खूब आनंद उठाया। आजकल अपने -अपने क्षेत्र में जनता के सामने अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि कैसे उन्होंने सरकार को घुटने टेका दिया। हो सकता है आगामी किसी सत्र में ये सभी पक्ष विपक्ष के नेता ,जीएसटी या कोई अन्य विधेयक पारित करते हुए, एक मत से अपना बेतन ,भत्ता दुगुना या तिगुना करा लें व अपनी विशेष दर्जा व सुविधा की और बड़ी सूची जनता को पकड़ा दें।सातवें बेतन आयोग की सिफारिशें आनेवाली हैं तो बाबू से पीछे सांसद ,विधायक क्यों।जागीर उनकी है ,जो कुछ  उनके उपभोग से बच जाय वह कमीशनखोरी के बाद देश एवँ देश के विकास के लिए ही तो है।                    
***************पावस बीतने वाला है पर उलझन सुलझे ना। स्वतंत्रता पाने के अति उत्साह में तत्कालीन नेताओं ने देश के लिए आरक्षण ,जम्मू -कश्मीर ,देश विभाजन ,राष्ट्रभाषा  जैसे राजरोग पैदा कर दिए जो देश की प्रगति को घुन की नाईं चाट रहे हैं।जहाँ जनता की अपनी असह्य उलझनें हैं वहाँ ये पैदा की हुई राष्ट्रीय अनुवाँशिक समस्याएँ, जैसे आरक्षण के लिए चल रहे आन्दोलन ,पश्चिमी सीमा पर आए दिन आम नागरिक एवँ सुरक्षा बल के जवानों का मारा जाना,  उन्हें और उलझन में डाल रही हैं।क्या प्याज की बात हो ,क्या दाल के दर्द पर रोया जाय ;जब सरकार सीमा पर पाकिस्तान को जवाब देने ,जम्मू -कश्मीर में आतंकियों को नष्ट करने और देश के विभिन्न भागों में आरक्षण के लिए चल रहे आंदोलनों को निबटने में ही अहर्निश उलझी हुई है।काश !ये समस्याएँ न होती,हम मन ,वाणी और कर्म से ईमानदार होते और देश तथा सरकार की ऊर्जा जन कल्याण कार्यों व विकास में लगी होतीं तो उलझन का नाम- ओ- निशान ही कहाँ होता। यदि लोकतंत्र में समान अवसर का सपना सचमुच में साकार हो पाता तो भारत द्वारा  मंगल पर मंगल यान भेजना या शक्तिशाली क्रायोजनिक इंजनों से उपग्रहों  का लगातार सफल प्रक्षेपण करना विश्व को कुछ अलग सन्देश दिया होता।फिर भी जनता आशान्वित है कि शरद ऋतु पावस से बेहतर होगी।जिन भारतीयों ने बीते मौसम में अपनीं  दाल विहीन थाली से एकाएक प्याज को महँगाई के साथ उड़न छू होते पाया है,उनके दिन जल्द बहुरें गे। सस्ती प्याज थाली में लौट कर फिर उनके आँसू निकाले गी और आँसू पोछे गी।____मंगलवीणा 
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वाराणसी ;दिनाँक :08 सितम्बर 2015                         mangal-veena.blogspot.com
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मंगलवार, 30 जून 2015

मैगी को वापस लाओ

************मैगी को वापस लाओ। मॉड्यूलर किचेन सूने पड़े हैं। आधुनिक माताएँ अपने बच्चों पर मैगी रूपी ममता नहीं उड़ेल पा रही हैं। नेस्ले वालों ने भारत से मैगी को बाहर कर लिया किन्तु आधुनिकाओं के साथ -साथ अकेले घर से दूर रहकर पढने -पढाने  और  नौकरी करने वाले  नवयुवकों एवँ युवतियों के भी बुरे हाल हो रहे हैं। बाजार में उपलब्ध  स्थानापन्न द्रुत भोज्य जैसे नोर ,टॉप रमेन,  मैक्रोनी,आईटीसी की यिप्पी या अन्य ब्राण्ड नूडल्स में वह दम -ख़म व लोकप्रियता कहाँ जो मैगी को भुलवा सकें।वैसे ये भी एक के बाद एक बाजार से निष्कासित हो रहे हैं।मैगी से प्राप्त बाकी सुविधाओं या फ्लेवर को छोड़ भी दें तो बतरस का आनन्द कहाँ से आये।मैगी नहीं; तो  चर्चा में प्रीती जिंटा ,माधुरी दीक्षित और अमिताभ बच्चन को कैसे लायें।मामला एक रस का नहीं  कई रसों का है अन्यथा शीघ्रता एवँ पौष्टिकता में तो पारम्परिक खिचड़ी भी किसी से कम नहीं। कुल मिला कर इस नूडल्स के बाजार से बाहर होने पर आधुनिक स्मार्टनेस को एक करारा झटका लगा है।
************सारे फसाद की जड़ में कोई चाणक्य प्रण वाला बाराबंकी का खाद्य निरीक्षक लगता है जिसने मैगी की जड़ में मंठा डाल दिया वरन कौन साधारण मनुज जनता था कि दूषित आबोहवा , मिलावटी दूध ,जहर घुले फल -सब्जी ,कंकड़ -पत्थर मिले खाद्यान्न या नकली दवाओं से भारतीयों को बचाने के लिए कुछ तंत्र ,नियमित विभाग या मंत्रालय भी हैं जो यदा -कदा समाचारों में आ जाते हैं।ऐसा ही एक विभाग है -भारतीय खाद्य संरक्षा एवँ मानक प्राधिकरण जो इस प्रकरण में नाम धन्य हो गया। यह भी पता चला कि इनकी अपनी प्रयोगशालाएँ हैं और राज्यों में इनके खाद्य आयुक्त एवँ अन्य खाद्य अधिकारी भी तैनात हैं जो हमें शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों की गारण्टी देते हैं।परन्तु जनता की सेहत की क्या बात की जाय ,इस विभाग के पूर्व अधिकारी कह रहे हैं कि  विभाग की स्वयँ की ही सेहत बहुत ख़राब है। अपनी चिन्ता छोड़ अब सबलोग यह जानने को उत्सुक हैं कि विभाग के अधिकारिओं का माली स्वास्थ्य कैसा है। बिना किसी प्रयोजन के हानिकारक मिलावट एवँ ऐसे सरकारी विभाग, दूध और पानी की भाँति, वर्षों से मित्रवत सामंजस्य में नहीँ बने रहते।लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं कि मैगी में मानक स्तर से ज्यादा पाये गए लेड व एमएसजी क्या हमारे हाजमे के लिए अन्य नित्य झेले जा रहे मिलावटों से ज्यादा घातक हैं।पहरेदारों से कौन पूछे कि ये हानिकारक नूडल्स भारतीय बाजार में कैसे घुसे।
************लोगों को यह बात और हैरान -परेशान कर रही है कि जिन खाद्य पदार्थों की शान में हमारे फ़िल्मी सितारे रात दिन विज्ञापनों द्वारा टीवी पर कसीदे काढ़ते हैं क्या वे भी स्वास्थ्य नाशक हो सकते हैं। ये वे लोग हैं जो हमारी आधुनिकता के मानक हैं और नई पीढ़ी की युवक एवँ युवतियों की चर्या में हर पल अनुकरणीय हैं।ये ब्रांड अम्बेसडर हैं जो  नैतिकता की परिभाषा भी स्वयँ गढ़ते हैं अन्यथा ब्राण्डिंग द्वारा करोड़ों कमाने से पहले वे अपने स्तर से यह सुनिश्चित अवश्य करते कि, जिसने उन्हें सितारा बनाया ,अपार संपत्ति स्वामी बनाया और अगाध स्नेह दिया ,उस जनता को विज्ञापन द्वारा परोसी जा रही वस्तु वास्तव में हानिकारक नहीं है।रही बात गलती मानने और क्षमा माँगने की तो ये चीजें बड़े लोगों के धर्माचरण में आती ही कहाँ हैं।काना -फूसी होती रहे ,करोड़ों की कमाई कर शांत बैठने में क्या बुराई है। अभी लू से देश में हजारों लोग मरे हैं  तो ताप की क्या जवाबदेही ?यही तो ताप का प्रताप है।
************हमारे जनतंत्र की धारिता है कि जवाबदेही तो बनती है। फिर इस प्रकरण में ज्वार आने पर खाद्य एवँ उपभोक्ता , रसायन एवँ उर्वरक तथा आयुष विभाग के मंत्री भी सामने आये हैं और उपभोक्ता हित एवँ अधिनियमों की बात कर रहे हैं परन्तु ब्राण्ड अम्बेसडरों की जबाबदेही विषय पर ये लोग भाटे की प्रतीक्षा करते दीख रहे हैं।नेताओं ,अभिनेताओं और बाबुओं को तो दृढ विश्वास है कि हर समस्या या विवाद की एक जिंदगी होती है और वह इस समय सीमा बाद स्वतः समाप्त हो जाती है।परन्तु विश्वास के विपरीत मैगी विवाद की जिन्दगी तो बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य संगठन द्वारा गठित एक समिति ने रिपोर्ट दिया है कि मोनो सोडियम ग्लूटामेट मात्र एक चोखा फ्लेवर है और यह स्वास्थ्य केलिए बिलकुल हानिकारक नहीं है। अब किसकी मानें किसकी न मानें। कहीं नई पीढ़ी के प्रिय मैगी को उनसे छीनने एवँ उनपर खिचड़ी थोपने का कोई दुष्चक्र तो नहीं। दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए सीबीआई जाँच तो बनती है।------- सीबीआई से इस लिए कि अन्य किसी जाँच संस्था पर कोई भरोसा ही नहीं करता।
************दूसरी ओर हर संकट या समस्या अपने साथ नए अवसर भी लाती हैं ,यह खिचड़ी के लिए सर्वथा उपयुक्त समय है कि आधुनिक पीढ़ी में यह अपनी पैठ बढ़ाए और दुनियाँ का सबसे चोखा फटाफट भोज्य बने। इसके लिए यदि इसे मुँह बिदका देने वाला खिचड़ी नाम बदलना पड़े तो बदले ,जिन लोगों के नाम माँ -बाप ने खिचड़ू या खिचड़ी रख दिए है और वे, शर्मिंदगी के कारण, हमेशा अपना नाम अंग्रेजी के शार्ट रूप में लेते हैं,उनको नए जमाने के धाँसू नाम दिए जाँय।साथ ही दुनियाँ में फैले भारतीय दूतावासों में इस भोज्य को अनिवार्य कर दिया जाय।यह भी सुखद संयोग है कि भोजन में खिचड़ी हमारे प्रधान मंत्री जी की पहली पसंद है और  विश्व पटल पर भारत के लिए यह अनुकूल समय है।अतः योग दिवस की भाँति चौदह जनवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ से, अंतर्राष्ट्रीय खिचड़ी दिवस घोषित कराने का प्रयास हो। यदि सफलता मिली तो सरकार की यह दूसरी बड़ी उपलब्धि होगी और चौदह जनवरी को हमारा उत्साह बुलंदिओं पर।
******************************आश्चर्य !देखते ही देखते रोटी ,कपड़ा,मकान और स्वास्थ्य ,शिक्षा      ,सड़क, बिजली,भ्रष्टाचार वाली समस्याएँ नेपथ्य में जा रही हैं और सरकार जनता से झाड़ू लगवाती ,बैंक खाते खुलवाती ,योग कराती, बेटी के साथ सेल्फ़ी खिंचवाती,देशी मिलावटों पर कान बहरा करती और मैगीको भगाती रंगमंच पर पर अवतरित हो रही है ।इसे कहते हैं पैराडाइम शिफ्ट (Paradigm Shift) । जो हो रहा है होने दो ;फटाफट भूख मिटाने को मैगी वापस लाओ।नेस्ले वालोँ को तो भारतीय बाज़ारमें घुसने का पूर्व अनुभव है ही। पावस आ चुकी है ,स्कूल खुल गए हैं और सबको जल्दी पड़ी है। ज्यादा क्या लिखूँ।----------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी :दिनाँक 30 जून 2015
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गुरुवार, 4 जून 2015

दस में कितने नम्बर

***************इन दिनों देश के विभिन्न शैक्षिक बोर्ड धड़ाधड़ दसवीं एवँ बारहवीं के परिणाम घोषित कर रहे हैं । बोर्ड चलाने वाले और परीक्षा देने वाले --दोनों ही नये -नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। आँकड़ों की मानी जाय तो शिक्षा में युगान्तकारी सुधार हो रहा है और हम सौ प्रति सौ प्राप्ति के सन्निकट हैं। इसी दिन के लिए हमने अध्ययन -अध्यापन को बदला ,प्रश्नपत्रों को लम्बा कर उत्तर पुस्तिकाओं का आकर घटाया और हम उस आयाम को समाप्त कर रहे हैं कि किसी विषय पर कितना भी लिख़ दिया जाय ;उससे अधिक एवँ  बेहतर लेखन की संभावना सदैव बनी रहती है अतः पूर्णांक मिलना दुष्कर है। इन्हीं प्रयासों से शिक्षा के नए दिन आये हैं और शिक्षा की नई कालिदास-प्रणाली लागू हुई है। फलस्वरूप सफल छात्रों एवँ कीर्तिमान स्थापित करनेवालों की सर्वत्र प्रसंशा हो रही है। साथ ही परीक्षा उत्तीर्ण हुए लाखों  छात्र एवँ उनके अभिभावक जहाँ उत्साहित एवँ भविष्य के प्रति आशान्वित हैं वहीँ अनुत्तीर्ण छात्र और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग शिक्षकों ,परीक्षकों व शिक्षा की वर्तमान दशा को कोस रहे हैं।असफल परीक्षार्थियों को यहीं नहीं रुकना चाहिये बल्कि बीती परीक्षा से निराश न होते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए और अगले अवसर को बड़ी सफलता में बदलने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
***************ऐसे समय इसे सुयोग ही कहा जायगा कि बीते छब्बीस मई को केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर लिया और नई प्रथा के अनुरूप उसने भी टीवी ,मिडिया ,समाचारपत्र व जन संपर्क माध्यमों से अपनी एक वर्ष की उपलब्धि  का लेखा -जोखा जनता के समक्ष रखना प्रारंभ कर दिया।फिर क्या ;वाच्य हो ,दृश्य हो या श्रव्य -अहर्निश यही चर्चा कि मोदी सरकार को दस में कितने नम्बर ?सत्ताच्युत विरोधी नेता तो जैसे मूर्छा से जाग उठे हैं। उनके हाई कमान और कार्यकर्ता सरकार को दस में शून्य देने पर उतर आये हैं।उन्हें एक साथ कई लाभ जैसे टीवी चैनलों पर पुनः अवतरण ,भविष्य में सत्तासुख की आस ,हाई कमान की कृपा इत्यादि दिखने लगे हैं। यह तो भला हो आज  के ट्रेंड -सेटर (प्रथा -स्थापक )टीवी चैनलों का जो ऋणात्मक नंबरिंग नहीं करा रहे हैं वरन सरकार के प्राप्तांक को अपनी पूर्ववर्ती सरकार से पीछे धकेल देते। वैसे सभी भारतीय जानें या न जानें ,टीवी चैनल वाले मौलिक रूप से जानते हैं कि सरकार सबकी है। अतः वे सरकार के काम-काज का मूल्यांकन किसी से भी करा सकते हैं। वे चैनल का हित साधते हुए किसी को परीक्षक बनने का सुअवसर दे रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं कि आप मोदी सरकार को कितने नम्बर देंगे। इक्के -दुक्के धर्मगुरुओं ,अध्यापकों ,विश्लेषकों ,नौकरशाहों ,व्यवसायिओं , वकीलों ,डाक्टरों ,किसानों ,टॅक्सीचालकों, मजदूरों इत्यादि की तो बन आई है। टीवी के पैनलिस्टों की तो बात ही और है। मिडिया सौजन्य से इन सबके  अच्छे दिन चल रहे हैं।आम के आम ,गुठलियों के दाम - वे परीक्षक बनने के कल्पनातीत अवसर के साथ टीवी पर सुशोभित हो समाज में विशिष्ठ होने का रौब भी पा रहे हैं। जहाँ तक नम्बर की बात है वह तो चैनल वाले जो चाहते हैं दिला ही देते हैं। चूँकि चैनल दर्शकों से दर्शकों के लिए चलाये जा रहे हैं ,अतः पक्ष -प्रतिपक्ष की खिंचाई कराते समय वे दर्शकों का पूरा ख्याल भी रख रहे हैँ।इस नम्बर के खेल में मिडिया ने, सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से राज्य सरकारों तक तथा विभिन्न राष्ट्रीय से स्थानीय प्रतिपक्षी दलों तक, सबको ऊपर -नीचे वाले ढेकुल झूले पर चढ़ा दिया है जिससे ये कभी आसमान में हुलस रहे हैं तो कभी धरती पर धूल फाँकते दिख रहे हैं।निःसंदेह चौथा स्तंभ अपने उत्कर्ष पर है।
***************सावन से भादों दूबर ?मोदी सरकार मिडिया पर छायेंऔर केजरीवाल राष्ट्रीय रंगमंच से ओझल हों ;यह आज के भारत में हो ही नहीं सकता।अतः वे भी अपनी सौ दिन में हल की गई उत्तरपुस्तिका ले कर मिडिया पर चढ़ गए और शंख नाद करने लगे कि उनके लिए दस में दस क्या ,हजार -लाख भी कम। लोग उन्हें ऐसे उछालते हैं मानो मोदी सरकार के बाद देश में कोई सत्ता है तो वह केजरीवाल ही हैं। केजरीवाल को लेकर मिडिया की आतुरता  एवँ उनके समाचार चयन के मापदण्ड पर आम जनता सशंकित हो रही है। यह तो नकारा नहीं जा सकता कि दिल्ली जैसे  कई महानगर इस देश में हैं जिनको वहाँ की महानगर पलिकाएँ एवँ स्थानीय प्रशासन चला रहे हैं; वह भी बिना केंद्र शासित राज्य दिल्ली जैसी प्राप्त सुविधाओं के।ऐसे में दिल्ली का प्रदेश होना समझ में आए या न आए  परन्तु केजरीवाल का मुख्य मंत्री होना और लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब पर कीचड़ की फेंका -फेंकी खूब समझ में आ रही है।टीवी चैनल वालों के सामने टीआरपी की समस्या हैऔर ज्वलंत मुद्दों के पिछले पादान पर खिसकाने केँ उनके अपने तर्क भी हैं।  
***************परन्तु अपनी -अपनी ढफली अपना -अपना राग के बीच भी यह जो जनता है -सब जानती है। उसे पूरी बहस में ईमानदारी व निष्पक्षता बहुत ही रंच दिखाई दे रही है। जनता ने मोदी जी द्वारा सरकार बनाने के क्रम में उन्हें एक अनुमोदित प्रश्नपत्र या अपेक्षा  सूची सौंपी थी ,वह मूल्यांकन के समय लुप्त है। सत्ता ,विपक्ष और कुछ विश्लेषक  स्वयं को भाने वाले अपने -अपने गढंत प्रश्नपत्र व कल्पना सृजित उत्तरपुस्तिका या उपलब्धि लेकर धमा -चौकड़ी मचाए हुए हैं जैसे शूट -बूट वनाम शूट्केस की सरकार।    भाषा से ठेंठ न बना जाय ;समय आने पर जनता सत्ता ही नहीं विपक्ष का  भी यथेष्ट मूल्यांकन कर देगी। रही बात आज की तो दस में कितने नंबर वालों को सौ में कितने नंबर वालों से सीख लेनी चाहिए कि वहाँ लाखों परीक्षार्थी एक प्रश्न पत्र का उत्तर देते हैं।
***************सारांशतः दस में कितने नम्बर वाले परिवेश में सौ में कितने नम्बर वालों की प्रासंगिक वरीयता धूमिल होना भारत की सुनहरी यात्रा में एक गतिरोध सा होगा।ये लाखों की नई पीढ़ी कल देश को आगे बढ़ाने एवँ इसे सँवारने की जिम्मेदारी सँभालने वाली है। अतः उन्हें हर विशेषज्ञ परामर्श व मार्गदर्शन , व्यापक स्तर पर, मिलनी चाहिए।वर्तमान को भविष्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इस प्रसंग में प्रधान मंत्री ने अपनी पिछली मन की बात में  परीक्षार्थिओं को बधाई एवँ उत्साह वर्धन कर एक सराहनीय कार्य किया। इन बातों को टीवी ,मिडिया व अन्य सञ्चार माध्यमों को और आगे बढ़ाना होगा। यदि घुमक्कड़ी माने तो शिक्षा वही है जिससे व्यक्ति अपने जीवन के हर पहलू में शिक्षित लगे और सरकार की उपलब्धि वही जो बिना बताए ही जनता को दिखे।बिना तन्मय संघर्ष के परीक्षार्थी हों या  सरकारें मात्र नम्बर के सहारे अपने लक्ष्य को नहीं बेध पायें गे। --------------------------------------मंगलवीना
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अंततः
                                              विश्व - पर्यावरण -दिवस 
************आज पर्यावण दिवस पर हम पृथ्वीवासिओं को, पिछले तीन महीनों के, प्रकृति प्रदत्त संदेशों का
  स्मरण करना चाहिए। रबी कटाई के समय  तूफानी वरसात ,हिमालय की गोंद में एक से एक भूकम्प के झटके,पानी के लिए मचा हाहाकार एवँ आंध्र से पूरे उत्तर भारत में गर्मी का चल रहा  प्रलयंकरी ताण्डव जैसे प्राकृतिक उपहार पर्यावरण से छेड़ -छाड़ के रिटर्न -गिफ्ट हैं। यदि ऐसे रिटर्न -गिफ्ट नहीं चाहिए तो मानव जाति पचास वर्ष पहले का पर्यावरण धरती को लौटा दे वरन हम याचना करें गे -"हे प्रभु !अच्छे दिन तो बाद में देना ,ठण्डे दिन पहले दे दो। भूख तो मिटती रहेगी,प्यास तो पहले मिटा दो। "  -------------------मंगलवीना  
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पर्यावरण दिवस :दिनाँक 5 जून 2015 --वाराणसी।
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शुक्रवार, 15 मई 2015

A homage to late Dr Kesar Singh

Today is the 3rd Punya-tithi of Late Dr. Kesar Singh, who was my younger brother and served as a Professor at Rutgers University, New Jersey. All my family members remember him too much and pay homage to his simplicity and selflessness. His ideas and thoughts will motivate us for years to come.
Here is a still taken in his university chamber during my US visit in 2011