शुक्रवार, 2 जून 2017

एक अशिष्ठता का अवसान

***************सच है भारत बदल रहा है।आदत के विपरीत सडकों पर बदला -बदला सा माहौल व यातायात की थोड़ी बढ़ी सुगमता अच्छी लगने के साथ अजीब लग रही है। ऐसा लगता है कि साहबों और सरकारों का रेला कहीं बाहर गया है।फिर याद आता है कि कर्मयोगी एवं योगी के सरकारों ने लाल ,नीली बत्ती और हूटरबाजी बन्द करा दिया है ;यह उसी का परिणाम है ! भला हो भारतीय जनता पार्टी के  सरकारों की , कि वे जनता द्वारा सत्ता सौंपे जाने पर जनता सी व्यवहार करते दीख रही हैं।सरकारें व उनके लोग लाल- नीली बत्ती व हूटर का त्याग कर जनता के सीने पर कोदो दरना बन्द कर दिए हैं ,यह मोदी सरकार के तीन वर्ष की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। इसके लिए वह शत प्रतिशत अंक पाने की हक़दार है।सिवा निर्णय के सरकार को कुछ खर्च करना नहीं पड़ा ,परन्तु इस निर्णय ने जनता के दिल को छू लिया। इसे कहते हैं हर्रे लगी न फिटकिरी ,रंग चोखा।
 *************** जिस लाल बत्ती को  नेता ,नौकरशाह या ओहदेदार अपनी हनक मानते रहे हैं और आम भारतवासी उनकी अशिष्ठता ;अंततः उनके अवसान की पटकथा लिख दी गई।हमारे देश में स्वार्थ सिध्यार्थी नेता और नौकरशाह जो हर अच्छे - बुरे हथकंडे अपना कर विशिष्ठ  होने का परम सुख पाते रहे हैं,वे जल के अभाव में मछली वाली तड़प की पास आती आहट सुनने लगे हैं। ये लोग आम आदमी सा होने की कल्पना मात्र से घबरा रहे हैं। इन्हें कौन समझाए कि इनकी  जीविका एवँ प्रत्यक्ष और परोक्ष  सुविधाएँ जनता से प्राप्त विभिन्न राजस्व से प्राप्त  होती हैं।अतः जनता उनसे सेवक सी भूमिका की अपेक्षा करती है न कि स्वामी सी।इससे बड़ी राष्ट्रीय विडम्बना क्या हो सकती है कि  स्वतंत्रता प्राप्ति से  आज तक ये अंग्रेजों के देशी संस्करण वाले लोग स्वामित्व का सिकंजा कसते हुए वीआईपी वाली रौब तले देश को लूटते गए जब कि आम जनता इनसे बेहद घृणा करते हुए भी इनकी चरणपादुका ढोने को मजबूर होती रही। इस उलट आचरण और मानसिकता वाले मिथक को तोड़ने में सात दसाब्दी बीत गए ,तब  कहीं जा कर यह अति  विशिष्ठ या स्वामी भाव वाली अहंकारी दीवाल दरकी है।याद रखना होगा कि यह मात्र शुभारंभ है न कि शुभांत।  इसे पूर्ण रूप से ध्वस्त होने में सुधार वाले ढेर सारे हथौड़ों की आवश्यकता होगी जब कि वीआईपी होने का सुख लूटने वाले इसे आसानी से ढहने नहीं देंगे।
***************यह सर्व विदित है कि भारत में दुनियाँ के किसी भी देश से अधिक वीआईपी हैं जिनकी सुरक्षा एवँ सुविधाएँ राजाओं जैसी हैं। देश से राजशाही तो सरदार पटेल के सौजन्य से चली गई परन्तु अनुवादित अति विशिष्ठवाद  ने अपनी जड़ें और जमा लीं। संसाधन, सुरक्षा , सुविधाओं एवँ विकास पर पहला हक़ इनका बन गया और जो शेष बच गया वह जनता का।इस नवोदित राजशाही के चलते ही लोकतंत्र में लोक उपहास का भारत अप्रतिम उदहारण बना और इसके चलते ही देश का अपेक्षित विकास सदैव वाधित रहा।परन्तु हर आम भारतीय के लिए आदर्श सत्य यह है कि लोकमत से इतर यह संस्कृति हर रूप में अशिष्ठ एवँ भ्रष्ट है। एक उदहारण से इसे समझा जा सकता है कि जब आम आदमी के साथ कोई घटना घट जाती है तो पुलिस को मात्र  घटना स्थल तक  पहुँचने  में घंटों लग जाते हैं जब कि दर्जनों की संख्या में ये पुलिस वाले हर वीआईपी को सुरक्षा देने के लिए उन्हें चौबीस घण्टे घेरे रहते हैं।यह मान्यताप्राप्त भ्रष्टाचार और अशिष्ठता नहीं तो और क्या है। ऐसी ही अनगिनत सुविधाएँ हैं जो सरकारों ने इनके कदमों में बिछा रखी हैं और हर नई सरकार इनके लिए कुछ न कुछ नई सुविधा बढ़ा जाती है।
***************ज्यादा दिन बीते नहीं हैं ;नई सरकार के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद डीजीसीए ने प्राइवेट एयरलाइन्स द्वारा वीआईपी को विशेष आतिथ्य एवँ सुविधा देने का एक निर्देश निर्गत किया था। चूँकि निजी एयरलाइन्स सभी टिकट धारकों को सामान शिष्टाचार व सामान व्यवहार देती रही,इसलिए उन्हें अति विशिष्ठों के सामने एयर इंडिया के महाराजा की भाँति झुकना आवश्यक था।अतएव निर्देशित किया गया कि जब कोई सांसद यात्री रूप में आयें उन्हें द्रुत गति से सुरक्षा जाँच ,लाउन्ज पहुँच ,फ्रिल नहीं ,चाय -कॉफी और प्रोटोकॉल के अनुसार सौहार्द सुलभ कराया जाय ताकि वहाँ भी इन आधुनिक सामंतों के शान -शौकत एवँ रुतबे का प्रदर्शन शेष यात्रियों एवँ उपस्थित कर्मियों के बीच हो सके।वरन जब सभी यात्रियों के पास  यात्रा टिकट है ,निर्धारित  सीट संख्या है और सबको यात्रा में दी जाने वाली सुविधाएँ निर्धारित हैं फिर विशिष्ठता क्यों।बात नेताओं तक ही नहीं है। नौकरशाहों के लिए तो ये एयर लाइनें या अन्य जन सम्पत्तियाँ  उनकी निजी संपत्ति सी हैं। कभी किसी सम्बन्धित कर्मी से बात कर ये आतंरिक बातें जानी जा सकती हैं।
***************तीसरा उदहारण लें। गरमी का दिन और पानी की कमी है। लोग विधायक ,सांसद के पास उनके कोटे से एक  हैण्डपम्प पाने के लिए दौड़ रहे हैं। यह भिखारी बनाने वाली  बात ही तो है।ये नेता, नेता निधि और फरियाद क्यों ?केवल अति विशिष्ठवाद। इच्छा शक्ति हो तो  इन कार्यों के लिए एक विशिष्ठता और चाटुकारिता विहीन सुन्दर माँग व्यवस्था बनाई जा सकती है।कमाल है पैसा जनता का और निधि सांसदों एवँ विधायकों की।वस्तुतः यह विशिष्ठवाद से उपजी आम जन की व्यथा कहानी अन्तहीन है।राम चरित मानस में सीताहरण के बाद अशोक वाटिका में निरुद्ध जानकी की  मनोदशा का वर्णन ,सीता माता का पता लगा कर लौटे। हनुमान ने प्रभु राम से यह कह कर किया था "सीता कै अति बिपति विसाला। बिनहि कहे भलि दीनदयाला। "आज भी स्थिति हूबहू वैसी ही है।  हम जिसे आम जन कहते हैं उनके अंतहीन कष्ट का तथा जिन्हे हम वीआईपी कहते हैं उनकी अशिष्टता , भ्रष्टाचारिता  एवँ  विलासिता का वर्णन कठिन है।यही कारण है कि मोदी सरकार द्वारा वीआईपी संस्कृति के विरुद्ध उठाये पहले कदम की जनता भूरि -भूरि प्रसंशा कर रही है और इस संस्कृति के समूल नाश की आशा बाँध रही है।
***************आशाएं नहीं मरीं। हमारी न्यायपालिका को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है।समय समय पर वह सरकारों व अति विशिष्ठ जनों को लोकतंत्र का आईना दिखाती रही है और अन्यायपूर्ण कृत्यों के विरुद्ध निर्णय तथा लताड़ देती रही है।इसके विपरीत दूसरी ओर सरकारों व विशिष्ठ जनों के घालमेल से अति विशिष्ठता के नए नए आयाम और रास्ते भी बनते रहे हैं।समय अनुकूलता का शुभ संकेत दे रहा है कि जनता और सरकारों का घालमेल बढ़ रहा है। जो जनता है वही सरकार है। फिर अति विशिष्ठ कौन ,क्यों और किस लिए ?एक झटके में अति विशिष्ठता रूपी सामाजिक अशिष्ठता एवं भ्रष्टाचारिता का अवसान करना होगा। चाहे राष्ट्रपति हों या प्रधान मंत्री ,सांसद हों या विधायक ,भारतीय प्रशासनिक सेवा के हों या राज्य सेवा के ,इतर कर्मी हों या चतुर्थश्रेणी के ,सबको जनता और देश सेवा में उनके योगदान के सापेक्ष सुवधाएँ ,सुरक्षा व सम्मान मिलना चाहिए।  जब कर्तव्यनिष्ठ सेवकों द्वारा  देश और जन की हो रही सेवा का पारदर्शी समानुपातिक संबन्ध उन्हें दी जाने वाली सुविधाओं से बना दिया जाय गा,तब एक भारत एवं विश्वश्रेष्ठ भारत दुनियाँ के सामने होगा। जनता मालिक होगी और उसे अपने सेवकों पर गर्व होगा।अपसंस्कृति से मोहभंग करते हुए जनहितकारी कठोर निर्णय का समय है ताकि एक सभ्य समाज का उदय हो। सही समय पर सही निर्णय न लेने पर संदर्भित समय त्रुटियों वाले  काल खण्ड की सूची में चला जाता है।इतिहास का यही चक्र है। -------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 7 जून 2017------------------------mangal-veena.blogspot.com
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अंततः
उफ़ गर्मी।
 इस ग्रीष्म ऋतु में प्रलयंकरी गर्मी ने सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास  कैसे बुझे ?बिन पानी सब सून। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं।अब आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -

यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा 

अगले मौसम की----- 
बहार की-------
***************तब तक हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासे पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।---------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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सोमवार, 8 मई 2017

शादी समारोह


 *************** हाल मे दो एक संबंधियो के यहाँ आयोजित विवाहोत्सव मे निमंत्रण के कारण सम्मिलित होना पड़ा । समझ मे नही आया कि अब लोग निमंत्रण देते क्यों हैं?यदि किसी आयोजन मे  परंपरा,व्यवस्था ,संचालन एवं समयबद्धता संभव न हो तो ऐसे आयोजन मे  इन मान्यताओं के पथिकों  को आमंत्रित करना क्या उन्हे पीड़ा पहुंचाना नहीं है ?शुभ कामनाएं  एवं आशीर्वाद बटोरने के तो अब बहुत सारे सस्ते माध्यम सुलभ हैं और वे प्रयोग में लाये जा सकते हैं।
***************अपनी परंपरा जब विक्रित हो रही हो , अन्य  समाजों की कुछ अच्छी बाते लोग क्यो नही आचरित करते ? ध्यान देना चाहिए कि हर कृत्य किसी को आकर्षित तो किसी को विकर्षित करता है ।अतः खुशियो केलिए आकर्षण को ही चुनना चाहिए ।विकर्षण की अनुपस्थिति अप्रिय टिपण्णी की संभावना से बचाती भी है।बीते दिनों की मान्यता थी -अतिथि देवो भव।लगता है कि  आज की मान्यता है अतिथि दासो भव,तदकर्मं कुरु ।  ----------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनांक 09 . 05 . 2017 

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

कर्मयोगी से योगी तक

***************युवा भारत की नई सोच की बलिहारी कि देश को पहले प्रधान मंत्री के रूप में एक कर्मयोगी मिला फिर विश्व को योग दिवस मिला और अब राम कृष्ण की धरती को एक योगी। निःसंदेह ये सारी उपलब्धियाँ देश के नव जागृति क्रम में हो रही हैं। सन दो हजार चौदह में भारत में संपन्न हुए लोकसभा से अभी तक संपन्न हुए विधान सभा के चुनावों का  यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो ये युगान्तक घटनायें ही स्थापित नहीं होती हैं ,वरन आर्यावर्त में आगामी संभाव्य दृश्यावली भी लगती हैं। सोच बदलाव का ऐसा दौर चला है कि धर्मनिरपेक्षता ,अल्पसंख्यक ,पिछड़ा ,मुस्लिम आदि जैसे नारे, जो सत्ता पाने के लिए ब्रह्मास्त्र माने जाते थे,सब भोथरे हो गए। तुष्टीकरण रसातल में मिल गया।सच है, भारत नए युग में प्रवेश को मचल रहा है वरन मुस्लिम मतदाता जो भारतीय जनता पार्टी एवं इसके विचारधारा का पारंपरिक धुर विरोधी रहा है ,इसे विजय के लिए मतदान न करता।जनमत ने सीधा संकेत दिया है कि प्रगति और विकास के लिए आतुर भारतवासी को सरकार के रूप में उसे पोषक शासन चाहिये न कि शोषक।ऐसा लगने लगा है कि जो शोषक तथा विकास के बाधक बनें गे उन्हें नाकारा ही नहीं जाय गा बल्कि जनता के पैसे के दुरुपयोग के लिए कठघरे में भी खड़ा होते देखा जाय गा।भारत की बढ़ती आर्थिकशक्ति,राजनीतिक दक्षता व जनता को प्रदत्त बेहतरी से पडोसी देश भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे।ऐसे में आगे चल कर आर्यावर्त या वृहद् भारत विश्व पटल पर उभर सकता है।
***************आज के पड़ाव पर पहुंचने से पहले भारतीय लोक तंत्र की यात्रा कुछ यूँ हुई। आजाद भारत के तत्कालीन स्वप्न द्रष्टा नेताओं ने अपने सपने के भारत अभ्युदय के लिए उस समय गाँधी विचार तले दो सर्वोच्च संवैधानिक व्यवस्था समाज को दिया। उनमें पहली थी धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था व् दूसरी थी सामाजिक रूप से दलितों एवं पिछड़ों को आरक्षण की व्यवस्था।समय के साथ जैसे -जैसे हमारा लोकतंत्र आगे बढ़ा ,नेताओं ने इन ब्यवस्था की बहुमत के लिए ऐसी कुब्यवस्था कर डाली कि पूरा देश वर्गवाद ,धर्मवाद ,संख्यावाद,क्षेत्रवाद  व् जातिवाद में बँटता गया और इन गोलबन्दी के बाहर बचे देशप्रेमी हिन्दू उपेक्षा के शिकार होने लगे। अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जातियों की बात कर कुलीन कांग्रेसी लंबे समय तक नेहरू परिवार को सत्ता पर बैठाये रहे। इस बीच हर उभरते वाद में नए स्वयं स्थापित नेतृत्व पैदा हुए और बंदरबाँट की सरकारें बनने लगीं। नेताओं का परम धर्म सरकार बनाना  और अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सरकार बनाये रखना हो गया।वंशवाद ,भ्रष्टाचार और सामाजिक विघटन विशाल बट बृक्ष होते गए। यह गौण हो गया कि सरकारें बनाई क्यों जाती हैं। साधन को साध्य बनते देख आम लोग भौंचक थे। सब कुछ ऐसा था जैसे आदमी अपनी आवश्यकता एवं इच्छा पूर्ति के लिए पैसे न कमा कर मात्र पैसा संचय के लिए पैसा कमाये । थक हार कर जनता  ने मन बना लिया कि मृग मरीचिका का छलावा देने वालों को बता दिया जाय कि यह जनता है जो सब जानती है।
***************बढ़ती शिक्षा ,वैश्वीकरण ,सोशल व् इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़ाव तथा विदेशों के साथ बढ़ते आवागमन से देश में नव जागरण की हवा प्रबल हुई। लोग जान पाए कि क्षमता के बावजूद  देश विकसित क्यों नहीं हो पा रहा है।लोग जान पाए कि देश से बाहर एक भारतीय; चाहे हिन्दू हो ,चाहे मुसलमान हो या कोई अन्य  धर्मावलंबी; की पहचान कैसे होती है और उसी भारतीय की  देश के अन्दर कैसी पहचान बताई जाती है।इन प्रश्नों के मंथन से ही सारे जन मन विरोधी दल नकारे जा रहे हैं और कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद तथा  हिन्दू गौरव के लिए हाशिये पर रखी गई पार्टी आज नव जागरण की जन वाणी बन गई।भारत के हर नागरिक की बिना लाग लपेट यह अपेक्षा है कि उसे बेहतर से बेहतर शिक्षा ,स्वास्थ्य सेवा ,सड़क ,सुरक्षा ,शिष्टाचार तथा साथियाना अवसर मिले।साथ ही साथ सरकारें विश्व पटल  पर भारतवासियों को  भारतीयता और भारतीय संस्कृति अर्थात हिन्दू संस्कृति पर गौरवान्वित कराने वाली हों जैसे कि पूरे विश्व में प्रति वर्ष योगदिवस आयोजन से हमारी भारतीय संस्कृति गरिमामयी हुई है।हमारी हिन्दू संस्कृति ही हमारी विशिष्ठता  है जो वसुधैव कुटुम्बकं की बात करती है। अतः सबका साथ लेते हुए सबका आर्थिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक विकास सुनिश्चित करना होगा।आज की सरकारों को यह हर पल याद रखना होगा कि जनता ने उन्हें जनता की सेवा करने के लिए सत्ता सौंपी है न कि जनता से सेवा कराने और अति विशिष्ठ बनने के लिए।वादों पर मुहर लग चुकी हैं ,अब परिणाम देने की बारी है।
***************नए नेतृत्व के सामने दो काम हैं। पहला है दिए गए दायित्व या मिशन को अक्षरशः बिना किसी किन्तु - परन्तु के पूरा करना तथा दूसरा है जनता की स्नायु को पकड़ना कि आगे वह सरकारों के लिए क्या लक्ष्य देने वाली है।मिशन और विज़न में कोई भी लोच हुआ नहीं कि  आगे का अवसर छिना। इतना इशारा काफी है कि अति विशिष्ठ संस्कृति ,काले धन  ,भ्रष्ट नौकरशाही ,नेताओं के अपार धन स्वामित्व ,माफियागिरी तथा कानून के गिरगिटिया रूप से जनता की घृणा अहर्निश बढ़ती जा रही है।शुभ संकेत यह है कि नव  जागरण का नेतृत्व योगियों के हाथ है जिनकी  कर्मयोग निष्ठा निर्विवाद है। नेतृत्व की अनुकूलता एवं प्रतिबद्धता से जनता की उम्मीदें अँगड़ाइयाँ लेने लगी हैं। अपेक्षा रहे गी कि उम्मीदें फलीभूत हों । ------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४
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अंततः
सभी स्नेही पाठकों ,साथियों ,आलोचकों व् देशवासियों को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जन्मोत्सव राम नवमी की मधुमासी शुभ कामनाएं।
चूँकि मधुमास में ही लोग गर्मी से झुलसने लगे हैं ;आइये , त्रेता युग में रामजन्म के समय  अवध के जलवायु का तनिक सानिद्ध्य लिया जाय -
*****नौमी तिथि  मधुमास  पुनीता।सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।
*****मध्य  दिवस अति  सीत न घामा। पावन  काल  लोक  विश्रामा।
*****सीतल  मन्द  सुरभि  बह  बाऊ । हरषित  सुर संतन  मन चाऊ।
***** बन कुसुमित गिरिगन मनियारा।स्रवहिं सकल सरितामृतधारा।-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------गोस्वामीतुलसीदास
अब मिल बैठ सब सोंचे कि वैसा मधुमास और वैसी परिस्थितियाँ कैसे अवतरित हों ?जलवायु और पर्यावरण को हमने ही तो वर्वाद किया।----------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 4.4 . 2017
चैत्र शुक्ल अष्टमी मंगलवार संवत २०७४ ------------mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 19 मार्च 2017

योगी को उत्तर प्रदेश की सत्ता

योगी आदित्य नाथ ने आज तक सार्वजनिक जीवन में जितना कार्य किया उसका फल उन्हे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप मे मिला ।इसके लिए उन्हे हार्दिक बधाई ।अब उन्हे प्रदेश वासियों की अपेक्षा पर खरा उतरना होगा ।प्रदेश के अमन चैन, विकास और भाजपा के लिए जनाधार बढ़ाने की अब उनकी सीधी जिम्मेदारी होगी ।योगी पर योगेश्वर की कृपा हो।पूर्वाग्रह से टिप्पणी करना उचित नहीं है ।
सदियों से गुलामी के कारण हिन्दू बहुत दब्बू हो गये थे ।उन्हे उस मानसिकता से उबारने के लिए नव जागरण की नितांत आवश्यकता थी ।नई पीढ़ी के आते आते यह मिशन पूरा हुआ ।अब विकास की दरिया बहानी है और मोदी जी के नेतृत्व मे भारत को बहुत आगे बढाना है ।योगी जी के मूल्यांकन का समय शुरू होता है अब ।शुभ कामनायें ।----मंगलवीणा

शनिवार, 11 मार्च 2017

विनयी भव

प्रधान मंत्री जी एवं अग्रणी कार्यकर्ताओं के साथ - साथ भारतीय जनता पार्टी की अन्तिम पंक्ति में खड़े हम जैसे कार्यकर्ताओं के गिलहरी प्रयास ,भावना एवं शुभ कामनाओं को भी उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में मनोबल बढ़ाने वाला सहकार मिला जिसके लिए हम सभी राष्टवादी विचार धारा वाले ईस्ट मित्रों को हार्दिक बधाई एवं शुभ होली सन्देश प्रेषित करते हैं। सबको गुझिया रूपी ख़ुशी की स्निग्ध मिठास मिले।--मंगला सिंह 


रविवार, 18 दिसंबर 2016

विकास कि बकवास

  ***********[नोटबंदी एवं संसद गतिरोध पर एक प्रतिक्रियात्मक लेख ]**********
*************** निश्चय ही हमारे देश का हर क्षेत्र में त्वरित विकास हो रहा है परन्तु  बकवास भी  बहुत अधिक एवं सर्वत्र हो रहा है। कहीं बकवास की विषयवस्तु के लिए राई जैसे विकास का पहाड़ सरीखा हो-हल्ला हो रहा है तो कहीं सराहनीय विकास पर भी बकवास हो रहा है। जहाँ हमारा सराहनीय विकास युवा संसाधन आधारित है वहीं इस युवा पीढ़ी को  यह भी अनुभूति होने लगी है कि अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अधिकांश नेताओं  के बकवास  भी विकास में गतिरोधक बने हुए हैं।आज के भारतीय लोकतंत्र में बकवास के कोहरे से दूसरों द्वारा किये गए विकास की दृश्यता को धुंधला करना सरकारों व विरोधियों का परम ध्येय बन गया है। नेता तो मान कर चलते हैं कि जनता उनके स्वार्थीपन व छुद्रता को उतना नहीं जानती जितना वे हैं ,वही जनता है कि वह उनके रवा  -रत्ती जानने लगी है और उनसे उतनी ही घृणा करने लगी है।आम जन को यह पच नहीं रहा है कि देखते ही देखते बिना योग्यता एवं जिम्मेदारी के दौलत एवं दाम बटोरू इस नेतागीरी विभाग में इतने पद सृजित हो गये हैं कि जहाँ देखो वहाँ नेता।आज देश में कृषि के बाद नेतागीरी सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसमें रोजगार की मनचाही संभावनायें हैं। चूँकि कमाई के बदले बकवास का उत्पादन इनका मुख्य काम है ,अतः बकवास का उत्पादन भी बुलंदियों पर है।
***************स्वतंत्र भारत के अभिलेखों में प्रमुखता से उद्धरणीय एक निर्णय,वर्तमान सरकार द्वारा लिया गया , नोटबन्दी का निर्णय है जिसके फल प्रतिफल पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। ऐसे दूरगामी परिणाम देने वाले निर्णय ,जिनका व्यापक प्रभाव राजा से रंक तक सब पर पड़ता है,  किसी राष्ट्र में कभी -कभार होते हैं ।एक ईमानदार प्रधान मंत्री पर विश्वास कर राष्ट्र बेहतरी के लिए जनता मुद्रा संकट से जूझ रही है परन्तु इसके इतर स्वार्थी तत्व एवं विरोधी नेता इस पहल को निष्प्रभावी ही नहीं दुष्प्रभावी करने के लिए बकवास पर बकवास की झड़ी लगाए हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि जनता नोटबन्दी के आसन्न परिणाम पर सशंकित नहीं है या वह जानना नहीं चाहती है कि वस्तुतः इस अग्नि परीक्षा के परिणाम क्या मिलें गे। सबकी  अपेक्षा थी कि देश की शीर्ष सभा" भारतीय संसद" के अभी बीते सत्र में माननीय बन चुके नेतागण इस विषय पर व्यापक बहस करेंगे और जनता के शंकाओं का समाधान हो जाय गा। परंतु हुआ क्या -जनता के करोड़ों रुपये की छति के बदले मिला सिर्फ बकवास ,बकवास और बकवास। संसद में विरोधी दल के सांसदों ने जो गैर जिम्मेदार आचरण किया उससे प्रधान मंत्री में जनता का विश्वास और दृढ हो गया ।यदि ये माननीय लोग निर्लज्ज न होते तो जितने दिन सदननहीं चला उतने दिन का वे वेतन ,भत्ता नहीं लेते  और शेष बचे क्षति की भरपाई  आपसी अंशदान से कर देते। परन्तु ऐसा होगा नहीं क्योंकि आज के अधिकांश नेता निर्लज्ज हैं और उनका नैतिकता से कोई मतलब नहीं।
***************इतना ही नहीं इस बकवास की माया यहाँ वहाँ सर्वत्र है। व्यवस्था ,जिसके कन्धे पर नोटों के बदलने की जिम्मेदारी थी ,ने भी इस क्रियान्वयन को चोट पहुँचाया।पिछले दरवाजे से  काले धन वालों के पास नए नोटों के खेप पहुंचने लगे और उनके पुराने नोट बैंकों में भरने लगे। जनता बैंक के द्वारों पर भिखारी की तरह खड़ी रही और बैंकरों की ओर देखती रही।  काले धन के पोषक नेता लोग उनके धैर्य पर नमक छिडकने और उन्हें भड़काने का प्रयास करते रहे।जब बैंकों की सत्यनिष्ठा के बिपरीत आचरण की गतिविधियाँ सरकार के संज्ञान में आईं और मीडिया तथा समाचारपत्रों ने उजागर करना शुरू किया तो फिर सिद्ध हुआ कि हमारी ब्यवस्था भी बकवास हो चुकी है।इतना ही नहीं विभिन्न चैनलों पर माँगी मुराद पाए अनेक स्वयं भ्रमित विशेषज्ञ तो बकवास की ताताथैया करने लगे हैं।जनता मीडिया को बहुत पसन्द करती है ,अतः उन्हें बकवास परोसने वालों से दूर रहना चाहिए।परिवर्तन के वर्तमान दौर में तंत्र के इस चौथे स्तम्भ मीडिया से जनता को बहुत अपेक्षा है। आशा कि जानी चाहिए कि जनता के धैर्य और मीडिया के आईना से व्यवस्था को सन्देश मिले गा और वे जनाकांछा के अनुरूप व्यवहार करें गे ताकि भविष्य में उनके विरोध में उठनेवाली हर चर्चा को बकवास कहा जा सके।
***************रही बात विकास की। तो विकास वही जो जनता के द्वार तक पहुंचे न कि वह जिसे जनता के मन ,मस्तिष्क में विज्ञापनों व शोरगुल द्वारा बैठाया जाय। यदि कोई विकास का कार्य होता है तो वह दिखता है, जनता को उसे मिलने की सुखद अनुभूति होती है ,उसके जीवन में बेहतरी आती है और देश प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है।अतः प्रचार -प्रसार के बल पर जनता को विकास जताना भी बकवास है।अभी उत्तर प्रदेश ,पंजाब आदि राज्यों में चुनाव निकट हैं। जो दल सत्ता में हैं वे अपने द्वारा किये गए झूठ -सच विकास कार्यों की ढफली बजाने लगे हैं और उनके विरोधी दल उसे  झूठ तथा धोखा बताने लगे हैं।  सरकारें ऐसे भी विकास कार्यों की गिनती करा रही हैं जिनको ढूंढना होगा कि कहाँ हुआ ,कितना हुआ ,कब हुआ और किसका लाभ हुआ। मेनिफेस्टो की तो बात करना भी बकवास है।फिर भी विभिन्न नेता संगठनों का प्रयास होगा कि किसी तरह उनका सम्मोहन जनता पर चल जाय और सरकार बन जाय। फिर तो पाँच वर्ष के लिए वे ही माननीय ,उन्ही की दौलत उन्ही की सोहरत और वोट देने वाली जनता उनके लिए बकवास।उलझन तो यह रही है कि बकवासी जनता के बीच से उपजते हैं और वे विधायिका ,कार्यपालिका ,न्यायपालिका को भी अपने लायक बनाने का प्रयास करते रहते हैं इसीलिए उन्हें घेरने के सामान्य फंदे कमजोर पड़ते हैं और देश का विकास वाधित होता है।जो हुआ सो हुआ ;उलझन सुलझाने का समय आ गया है कि विकास विरोधी नेताओं एवं दलों को नैपथ्य में भेजा जाय। मोदी सरकार को जनता ने इसी लिए सत्ता सौंपी है कि तीनों तंत्रों में जितने भी छिद्र हैं उन्हें सख्ती से बंद कर दिया जाय ताकि लुटेरे कहीं से भाग न सकें।
***************हमारा देश बदल रहा है ।अब न तो जनता बकवास कहलाने को ,न सुनने को और न ही देश द्रोहियोँ को केवल बकवास कह कर छोड़ने को तैयार  है।इक्कीसवीं सदी भारत की है।सुयोग से प्रधान मंत्री श्री मोदी के सारथीत्व में  देश के करोड़ों युवाओं की  ऊर्जा  विकास रथ को आगे बढ़ाने में लग गई है।बकवास रूपी प्रतिरोध से गति धीमी करने का प्रयास हो रहा है और होगा परंतु इस चुनौती का अवसर में बदल जाना तय है।बैंकों और एटीएम के बाहर पंक्तियों में खड़े लोगों ने मोदी -मोदी का उद्घोष कर  विरोधी  नेताओं ,भ्रष्टाचारियों ,काले धन स्वामियों तथा देशद्रोहियों को स्पष्ट संदेश  दे दिया है कि वे राष्ट्र हित के लिए मोदी जी के साथ हैं और इससे भी बड़ी चुनौतियाँ लेने को तैयार हैं।उन्होंने बकवासियों को यह भी पूर्वाभास कराया है कि वे या तो विकास के साथ होलें या मिटने का मन बना लें।मोदी जी भारतीय जनाकांछा  की उपज हैं। मोदी मिशन में ही जन -जन की खुशहाली ,एवं देश के सर्वांग  विकास  की प्रबल संभावनाएँ हैं। सभी को स्वच्छ मन ,वाणी और कर्म से इस हवन में आहुति देना होगा।परिणाम में विकास और खुशहाली की ऐसी घटाटोप वर्षा होगी कि देशवासियों का मनमयूर नाच उठेगा और सबसे आगे होंगे भारतवासी। आइए हम भारत वासी मोदी जी के सारथीत्व में देश को विश्व के  पाँचवीं आर्थिक शक्ति से प्रथम आर्थिक शक्ति बनाने का तथैव संकल्प लें।
वाराणसी ;दिनाँक 20 दिसम्बर 2016                                                         मंगलवीणा
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गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक कि बोरोप्लस

***************इतिहास का यही क्रम है कि वर्ष के बाद वर्ष अपने विशिष्ठ पहचान के साथ इसके पृष्ठों  में जुड़ते जाते हैं और उसी विशिष्ठिता से वे याद किये जाते हैं। कुछ ऐसे ही,भारत के इतिहास में वर्ष दो हजार सोलह ईयर ऑव सर्जिकल स्ट्राइक के नाम से जाना जाय गा। इस अस्त्र का पहला प्रत्यक्ष प्रयोग भारतीय सेना के रणबाँकुरों ने, पिछले वर्ष दस मई को,सीमा से सटे म्यांमार में किया जब वे मणिपुर में सक्रिय रहे डेढ़ सौ से अधिक आतंकियों को रात के चंद घण्टों में मौत की नींद देकर सकुशल वापस आ गए। इस सर्जिकल स्ट्राइक की देश में बड़ी वाहवाही भी हुई परंतु वर्तमान वर्ष में तो हमारे देश में सर्जिकल स्ट्राइक ने धूम मचा दिया ।पूरे विश्व का ध्यान उभरते भारत की ओर तब खिंचा जब उन्तीस सितम्बर को  वर्तमान दृढ़निश्चयी सरकार क़ी अपेक्षा के अनुरूप उच्च मनोबल वाली पेशेवर भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर घुस कर आतंकियों एवं पाकिस्तानी सैनिकों पर आशातीत सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। भारतवासियों ने झूम कर दीपावली सा उत्सव मनाया।पाकिस्तान की हेकड़ी चूर हुई तो भारत के नेतृत्व व सैन्य दक्षता को पूरे विश्व में सराहा गया। विपक्षी दलों को सरकार के लिए जनता द्वारा की गई सराहना रास नहीं आई। काँग्रेसियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि उनके शासन काल में सेना ने ऐसे बहुत सारे सर्जिकल स्ट्राइक किये थे लेकिन उन्होंने कभी इन्हें सार्वजानिक नहीं किया।पुनः दीपावली बीतते ही आठ अक्टूबर की सांझ को भारत में आर्थिक मोर्चे  पर  एक  दूसरी ऐसी सर्जिकल  स्ट्राइक  हुई  कि  काले   धन  वाले, नेता,ठेकेदार, अभियंता,अधिवक्ता, चिकित्सक , व्यापारी ,नौकर शाह ,नक्सली ,आतंकी ,रियल इस्टेट,इत्यादि के कारोबारी एक साथ धराशायी हो गए। दूसरे दिन प्रातः देशवासियों ने क्षितिज से नए भारत को उगते देखा।
***************तब से जनता बैंकों व एटीएम मशीनों के सामने पैसे के लिए घण्टों कतार में खड़ी हो रही है।परन्तु इस स्ट्राइक से जनता इतनी प्रसन्न है कि कतार में लगने से कोई थकान ही नहीं। कतार में खड़े -खड़े वे कभी मोदी जी की सराहना करते हैं तो कभी मोदी -मोदी के नारे लगाते हैं। कभी कोई नेता दिखने पर घृणापूरित व्यंग करते हैं तो कभी रियल इस्टेट व लाकर वालों पर भी सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मोदी जी से अपील करते हैं।देश के हर कोने तथा हर वर्ग से यही आवाज उठ रही है कि ये भारत माँगे मोर।जनता कोई भी कठिनाई झेलने को तैयार है परंतु काले धन वालों को अब समूल नष्ट होते देखना चाहती है। यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लोग भी मोदी जी के इस साहसिक प्रयोग की सराहना कर रहे हैं ओर अच्छे परिणाम की अपेक्षा कर रहे हैं।
*************** दूसरी ओर आतंरिक मोर्चे पर काले धन का केंद्र बने हुए विभिन्न विरोधी दलों के नेताओं में खलबली मची हुई है। उन्हें नोटबन्दी के विरोध का कोई नैतिक कारण नहीं मिल रहा है तो जनता के कतार में घण्टों खड़ा होने की दुहाई दे रहे हैं या बिना तैयारी के क्रियान्वयन की बात कर रहे हैं।निःसंदेह ये नेता ही हैं जो काले धन का नेतृत्व कर रहे हैं ,संसद की कार्यवाही ठप कर रहे हैं तथा भारतबन्द करने का प्रयास कर रहे हैं।उनकी इस मुद्दे पर दंगा फसाद कराने की हर कोशिश बेकार जा रही है क्योंकि यह जो भारत की पब्लिक है ; सब जानती है।नोटबन्दी तो टूटने वाली नहीं है परन्तु सत्ता पक्ष व बिहार के देशप्रेमी मुख्यमंत्री को छोड़ अन्य सभी नेताओं ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि वे काले धन के समान पक्षधर हैं।सराहनीय हैं प्रधान मंत्री जी एवं धन्य है सर्जिकल स्ट्राइक कि जनाकांछा को  परवान चढ़ने का अवसर मिला।
***************अब तो आम लोगों की समझ में मोदी जी ,सुचिता,राष्ट्रभक्ति और सर्जिकल स्ट्राइक एकरूप हो चुके हैं।मोदी विरोध का सीधा अर्थ है कालाधनी,बेईमान व राष्ट्रद्रोही होना।इस धारणा को पुष्ट करने में अनैतिक एवम लुटेरे विपक्षियों का बहुत बड़ा योगदान है।  नए सपनों के भारत का हर नागरिक चाहता है कि मोदी जी अपने उद्देश्य में सफल हों तथा  भविष्य में उनके द्वारा की जाने वाली हर सर्जिकल स्ट्राइक सफल हो।साधारण सोच है कि पश्चिमी सीमा ,रियल इस्टेट और बेनामी संपत्ति पर और सर्जिकल  स्ट्राइक की आवश्यकता है। भारत के सुनहरे भविष्य का पदार्पण इन स्ट्राइक की सफलता पर ही निर्भर है और जनता के मूड को मोदी जी से बेहतर समझने वाला कोई दूसरा नेता नहीं है। इतना ही नहीं जब तक भारत में वीआईपी संस्कृति पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं होती,यह क्रम जारी रहना चाहिए। जिस दिन ऐसा होगा ,इन नेताओं को पता लगे गा एक ईमानदार साधारण नागरिक क्या होता है और उसकी अपेक्षा क्या होती है।
***************फिर हाल सर्जिकल स्ट्राइक्स का स्वागत है और निकट भविष्य में ऐसी ढेर सारी स्ट्राइक्स के लिए शुभ कामनाएं।इस एक ब्रह्मास्त्र में बहुत कुछ साधने एवं भारत को महाशक्ति बनाने की क्षमता है।यद्यपि काला होने के आधार पर हाथी के साथ काली हांड़ी की तुलना नहीं हो सकती फिर भी यह कहने को दिल करता है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक है कि बोरोप्लस।इस प्रसंग में गोस्वामी तुलसी दास कि निम्न लिखित पंक्तियाँ भी विचार योग्य हैं -
---------------ग्रह भेषज जल पवन पट ,पाइ कुजोग सुजोग।
---------------होइँ कुवस्तु सुवस्तु जग ,लखइ बिलच्छन लोग।
अस्तु सुयोग बना रहे ;सब ठीक ही होगा।बस कर्मयोगी की कर्मसाधना अनवरत चलनी चाहिए। ----------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक:01 दिसम्बर 2016                  mangal-veena.blogspot.com
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