शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

न्यायाधीश जी ,बातें कुछ और भी

***************हाल ही में न्यायाधीशों के सम्मलेन में भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर, प्रधान मन्त्री की उपस्थिति में, यह उल्लेख करते भाउक हो उठे कि वादों की तुलना में न्याय देने वालों की संख्या मानकों से बहुत कम है। स्पष्टतः उनकी वाणी से न्याय के प्रति हो रहे अन्याय की पीड़ा झलक उठी थी। केंद्र और राज्य सरकारों की, जनहित में,  यही संवेदनशीलता होगी कि तत्काल न्यायाधीशों की रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ सुनिश्चित करते हुए न्याय आयोग की संस्तुतियाँ लागू करने की कार्यवाही करें। लाख बुराइयों के होते हुए भी इस देश की न्याय व्यवस्था आम आदमी के लिए लाठी का सहारा है। यह बात दीगर है कि यह लाठी अब बोझ बनती जा रही है और धन तथा संसाधन के अभाव में या तो उल्टे उसी के पीठ पर पड़ने लगी है या उसकी अगली पीढ़ी को उत्तरदायित्व रूप में दी जा रही है।दूसरे देशों की आबादी एवँ  जजों के अनुपात का तर्क न देकर बेहतर होगा कि अपनी देशी परस्थितियों यथा वादों को बढ़ाने में पुलिस व वकीलों की भूमिका ,न्यायालयों में  पैठ बना चुकी दलाली ,प्रति वकील वादों की  संख्या ,नियुक्तियों में वंशवादी अधिपत्य तथा  न्याय  पर पैसे का प्रभुत्व इत्यादि की समग्र समीक्षा होनी चाहिए।क्या न्यायाधीश महोदय यह भरोसा देने की स्थिति में हैं कि यदि न्यायाधीशों की अपेक्षित संख्याबल पूरी हो जाती है तो न्याय व्यवस्था में व्याप्त खामियाँ दूर हो जायगीं ,शायद बिल्कुल नहीं।
भारतीय लोकतंत्र तो राजनीति में सशक्त घुसपैठ बना चुके वंशवाद से बुरी तरह पीड़ित है ही ;न्याय तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। जज के वंशज का जज होना हमारी न्यायपालिका में आम बात है। वैसे तो ये माननीय गैर राजनीतिक होते हैं परन्तु इनमें कुछ लोग ऐसे रहे हैं जिनका परिवार या वह स्वयं, किसी दल या नेता विशेष से उपकृत होकर, माननीय बना होता है।अतः जब भी प्रति उपकार का समय आता है ,ऐसे माननीय इंसाफ के तराजू को किनारे करने से नहीं चूकते।अपवादों को छोड़ दिया जाय तो मध्य व आधार स्तर के माननीयों से लेकर अधीनस्थों तक ,ब्रांडेड वकीलों से दलालीरत वकीलों तक सभी दिनोदिन मालामाल  होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि लाखों वकील व पुलिस वाले भी खूब फल फूल रहे हैं। बदले में भिखारी सा दिखते लाखों वादी वकीलों से कुटिल वादा व न्यायालयों से तारीख पर तारीख पा रहे हैं।भारतीय न्यायलय ही वे स्थान हैं जहाँ  शोषक एवं शोषित के बीच का अंतर हर कदम पर साफ दिखता है।
***************चूँकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रोजगार मिला हुआ है और सभी किसी न किसी रूप में न्याय नामक उत्पाद बेच रहे हैं ,अतः वे हर संभव प्रयास से उपभोक्ताओं की संख्या व उन तक पकड़ बढ़ायें गे ही।अद्यतन स्थिति यही है कि जब कोई स्नातक किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो पाता है तो कानून की पढाई कर वकील बन जाता है। वकालत में संख्या का कोई परिसीमन ही नहीं है।वकील नहीं हुए तो भी कोई बात नहीं ,न्याय की दलाली में लग जाइये।निःसन्देह देश में वादों की संख्या बहुत तीव्रता से बढ़ रही है परन्तु तथ्य यह है कि संख्या बढ़ाई जा रही है। जब भी किसी परिवार में या दो या दो से अधिक लोगों में विवाद पनपता  है ,न्याय रूपी उत्पाद बेचने वाले सक्रिय हो उठते हैं और जब वादी प्रतिवादी न्याय केलिए निकलते हैं ,कतिपय न्याय देने वाले चाहे ग्रामप्रधान हों या सरपंच ,स्थानीय पुलिस वाले हों या प्रशासन के लोग,आर्थिक दोहन के लिए विवाद को हवा पानी देकर चाँड़ने लगते हैं और आर्थिक सेवा करने वाले पक्ष के हित साधन में संलग्न हो जाते हैं। फिर मरता क्या न करता। पीड़ित न्यायलय पहुँचता है। वहाँ न्याय दिलाने के नाम पर किसी वकील के चंगुल में फँसता है और शुरू हो जाता है तारीख पर तारीख का अंत हीन क्रम। लम्बी लड़ाई तथा धन सम्मान सब कुछ गँवाने के बाद या तो कालातीत जय मिलता है या पैसा प्रेरित पराजय। पराजय की स्थिति में आगे तक लड़ाने वाले एक से बढ़ कर एक वकील सामने उपस्थित हो जाते हैं।यही है भारत में आम नागरिक के लिए अनन्त न्यायिक व्यवस्था।
***************हमारे देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून है ,मंत्रालय है ,विवाद सुलझाने वाले पीठ हैं परन्तु न्याय नामक उत्पाद के उपभोक्ताओं ,जिन्हे उनकी शब्दावली में वादी या प्रतिवादी कहते हैं ,के हित संरक्षण की कोई नहीं सोचता। न सरकार न उच्चतम न्यायलय में यह सुनिश्चित करने करने का साहस है कि किसी भी वाद का निस्तारण अधिकतम कितने समय में किसी अदालत  में होना अनिवार्य होगा ,एक वाद में अधिकतम कितनी तारीखें पड़ सकें गी या बीमारी आदि कारणों से अनुपस्थिति का लाभ कितनी बार दिया जाय गा। वादियों व प्रतिवादियों का वर्षोंवर्ष तक कोई केस लड़ने में जो मानसिक ,शारीरिक एवँ आर्थिक शोषण होता है उसके लिए देश में कोई क्षतिपूर्ति व्यवस्था नहीं है। इस देश में ऐसे भी लम्बित वाद हैं जो एक पीढ़ी के बाद दूसरी या तीसरी पीढ़ी के लोग लड़ रहे हैं। इससे बड़ी न्याय की निष्ठुरता और क्या हो सकती है। कुछ राहत होगी यदि वाद पंजीकरण के समय ही वाद संपत्ति मूल्यांकन के आधार पर वादियों ,प्रतिवादियों का न्यायिक बीमा कर दिया जाय और एक निश्चित अवधि में फैसला न मिलने या वाद के बीच मृत्यु होने पर बीमित राशि का भुगतान उनके उत्तरधिकारिओं को कर दिया जाय ताकि उन्हें अंतहीन प्रताणना से कुछ राहत मिल सके और वे वाद को आगे लड़ सकें।
***************हमारे प्रधान मंत्री जी प्रायः उल्लेख करते हैं कि जब भी कोई आपदा या चुनौती सामने हो हमें उसे खुशहाली और बेहतरी के अवसर में बदलने का प्रयास करना चाहिए। अतः संख्या संकट के बीच यदि न्याय पालिका अपने उपभोक्ताओं के शोषण को कम करने वाले कुछ कदम उठा कदम पाए ,वाद निस्तारण की कोई समय सीमा तय कर सके या वादियों, प्रति वादियों को कोई न्यायिक बीमा योजना दे पाए तो न्याय के प्रति आस्था पुनर्स्थापित हो सके गी। यह भी सोचना होगा कि जब न्यायाधीशों की कमी दूर हो जाय गी तो यह संस्था कैसे सुनिश्चित करेगी कि शोषण की गति कम और निस्तारण की गति तेज होगी।भगीरथ प्रयास की आवश्यकता है क्योकि भारतीय लोकतंत्र  आशाभरी चक्षुओं से अहर्निश न्याय व्यवस्था की ओर देख रहा है। सबकी अपेक्षा  यही है कि न्याय के तराजू की गरिमा बढे। ------------------------------------- मंगलवीणा

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अंततः
उफ़ गर्मी। इस बार अप्रैल में ही दुसह गर्मी से सर्वत्र हाहाकार मच गया है। नदी ,बाँध ,तालाब ,कुँए सभी पानी के लिए तरस रहे हैं ,फिर आदमी ,जीव -जन्तु व पंछियों की प्यास कैसे बूझे ?समाचार पत्रों और  इलेक्ट्रानिक मिडिया के माध्यम से मौसम विज्ञानी ग्रीष्म की निष्ठुरता व उसके कारणों की नित्य जानकारी दे रहे हैं। आइए कुछ हिंदी कवियों की दृष्टि से इस ताप को देखा जाय। यथा -
जाने क्या हुआ कि सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती फिर -फिर पानी खोज रही
सूखे कण्ठ कोकिला ,मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का छाया खोजे, पीपल गाछ तलाशें
नदी खोजती धार, कूल कब से बैठे हैं प्यासे
पानी पानी रटे रात -दिन, ऐसा ताल हुआ। जाने क्या हुआ ----डा.जगदीश ब्योम
ग्रीष्म की लय में बढ़ते हुए अब बदलाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए। अश्विन गाँधी के शब्दों में -यह सब कुछ याद रहे
मौसम का साथ रहे
ग्रीष्म ऋतु भी जाएगी
फिर रहे गी प्रतीक्षा /अगले मौसम की /बहार की।
***************तब तक  हम सबका सर्वोच्च कर्तव्य है कि पानी बचाएँ और प्यासों को पानी उपलब्ध कराएँ।एक प्यासी पँछी को भी यदि हम पानी पिला पाए तो यह सृष्टि की बड़ी सेवा होगी।------------------------------------------- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 29 . अप्रैल 2016
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

पथभ्रष्ट शिक्षा -दुर्भाग्य देश का

****************देखते ही देखते हमारे कतिपय लब्धप्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे कुछ युवक  कुशिक्षित होने का प्रमाण देने लगे।कोई अफजल की शहादत मनाने लगा ,कोई महिषासुर दिवस मनाने लगा तो कोई श्रीनगर स्थित भारतीय प्रद्यौकिकी संस्थान में भारत  माता की जय बोलने वाले क्षात्रों की पिटाई करने लगा ।शिक्षा केन्दों में घट रही ये घटनाएँ सन्त कबीर की उलट बानी "बरसे कम्बल भींगे पानी " की याद दिला रही हैं।  नेताओं की तो माँगी मुरादें पूरी होने की बारी आई। कोई छात्र मरे तो क्या ,जनता के पैसों से शिक्षित हो रहे युवक राष्ट्र विरोधी बनें तो क्या ,मुट्ठी भर राष्ट्र विरोधी कश्मीरी देश को परेशान कर के रख दें तो क्या ,इन नेताओं को तो मुद्दे चाहिए जिसपर प्रलाप कर सत्ता पक्ष  के विरुद्ध भोली -भाली जनता को बहका कर अपने पक्ष में वोट बढ़ा सकें और फिर वोट से लूट और सत्ता सुख।परन्तु यह गहरी चिंता का विषय है कि ये बच्चे दुःसोच के हद तक कैसे पहुँचे।साथ ही भारतीय समाज एवँ सरकार को तत्काल सक्रिय होने का समय  है ताकि ऐसे संस्थानों, शिक्षकों , गैरशिक्षकों ,शिक्षण सामग्रियों ,विचारकों ,लेखकों ,प्रचारकों ,छद्म नायकों ,नेताओं , सफेदपोशों इत्यादि की पहचान हो सके जिसने ऐसी अपसंस्कृति एवँ राष्ट्द्रोही विद्यार्थी तैयार किये। फिर  दृढ इच्छाशक्ति से कारकों को समूल नष्ट करना होगा वरन ये लोग हमारे देश व संस्कृति को किसी गम्भीर अनहोनी में झोंक सकते हैं।विद्यार्थी तो पौध हैं,दोष तो जमीन और माली में है जिन्होंने ऐसे  कुपौधों को पनपाने की भूमिका निभाई।
***************चूँकि कारण की पूर्ण विवेचना बिना निवारण संभव नहीं है ,हमें भारत की स्वतंत्रता से अब तक नव निर्माण व प्रगति के लिए हुए सामाजिक और शैक्षिक परिवर्तनों को स्मरण करना होगा। महात्मा गाँधी की  कौशलोन्मुखी ,संस्कार स्निग्ध एवँ सर्वसुलभ शिक्षा ,जो भारत के नव निर्माण की आकांछा थी , स्वतंत्रता प्राप्ति तक आँधी की भाँति बहती रही परन्तु आजादी एवँ बँटवारे के बाद धीमी पड़ने लगी क्योंकि समकालीन अन्य शासकीय विचार धाराएँ जैसे राजशाही , प्रजातंत्र ,समाजवाद,मार्क्सवाद (कम्युनिज्म  ), व्यक्तिवाद ,धर्मसापेक्षवाद ,धर्मनिरपेक्षवाद ,उदारवाद ,कट्टरवाद ,अलगाववाद  इत्यादि  गाँधी के रामराज्य की परिकल्पना पर प्रतिघात करने लगीं।जिनके हाथ सत्ता आई वे गाँधीवादी कहलाना चाहते थे  परन्तु अपने लिए महारानी विक्टोरिया और लार्ड माउन्ट बेटन जैसी प्रभुता चाहते थे। फिर क्या था ?चतुर कांग्रेसी गाँधी के स्वयम्भू उत्तराधिकारी एवँ अपने हित केलिए देशी अंग्रेज बन गए। मैकाले की शिक्षा प्रणाली  परवान चढ़ने लगी। धीरे -धीरे व्यवस्थाविहीन व्यवस्थित भारत में  शिक्षा संस्कार विहीन होती गई।इस उदेश्य के लिए देश की अहित चाहने वाली विचारधाराओं को भी सरकारी प्रश्रय दिए गए ताकि राष्ट्रवादियों को उनके साथ उलझाया जा सके।देश के इतिहास को गौरवहीन बनाने का कुत्सित प्रयास हुआ ताकि तुलनात्मक दृष्टि से नेहरु परिवार को भारत के नव जागरण प्रतीक रूप में स्थापित किया जा सके और उनकी छाया में लाखों स्वार्थी काँग्रेसी वर्षोंवर्ष तक  इस विशाल देश का सत्ता सुःख भोगते रहें।इनकी सुविधा केलिए बनाए गए तंत्र के कारण ही इतिहास के साथ भूगोल भी बदला जिनको याद करते ही हर भारतीय का क्रोध आसमान पर चढ़ जाता है। अनुकूलता मिलती गई और विघटन केलिए लालायित  अति उग्रवादी संगठन  भी अपनी जड़ें ज़माते गए।कश्मीर एवँ पूर्वोत्तर राज्यों में विभीषिका फैलाने वाला आतँकवाद या पश्चिमी बँगाल से आँध्रप्रदेश तक फैला नक्सलवाद आँख मूंदने से ही आज ऐसे भष्मासुरी पैमाने पर पहुँचा है कि शिक्षण संस्थानों में भी इनके समर्थक अध्ययन -अद्ध्यापन कर रहे हैं और उनके हित को आगे बढ़ा रहे हैं।
***************शिक्षा को पथ भ्रष्ट होने का सबसे बड़ा कारण बना पैसा। पूरे विश्व में औद्योगीकरण के बाद संस्कृति, सदाचार ,संस्कार इत्यादि पर पैसा हावी होने लगा।सुख ,सुविधा ,शिक्षा ,सम्मान ,सत्ता ,यहाँ तक की धर्म भी पैसे के अनुचर बन गए। पैसा , सदाचार से अर्जित हो या कदाचार से , केवल पैसा माना जाने लगा और यह पैसा सर्वोपरि पैसा बन गया।जब भ्रष्ट कार्यों से पैसा बहुत कम समय में बहुत ज्यादा अर्जित होने लगा तो भ्रष्ट होने में लोगों की झिझक जाती  रही। गाँधी  काल की आम जन की वह पीढ़ी जो संस्कारों में जीती थी अगली पीढ़ी  को भी भरसक संस्कारित बनाए रखी  परन्तु तीसरी नई पीढ़ी  के सामने अनुत्तरित हो गई। युवक जब अभिभावकों के समक्ष आज के नायकों जैसे नेता ,माफिया ,अभिनेता ,सरकारी बाबू ,अभियन्ता ,वकील ,ठेकेदार ,शिक्षक इत्यादि का उदहारण रख देते हैं तो देश प्रेम  ,सदाचार एवँ संस्कार की बातें अप्रासंगिक लगने लगती हैं। धनोपार्जन की अनुगामी बन चुकी शिक्षण संस्थाएं भी इस नवाचार से अछूती नहीं रहीं ।  चाहे सत्ता पक्ष में रहें या विपक्ष में ,चाहे देश प्रेम की राजनीति करें या देश द्रोह की ;  नेता बनना तो धनोपार्जन का इतना सटीक ब्रह्मास्त्र बन गया है कि इससे अल्पकाल में सर्वाधिक संपत्ति और सम्मान की गारन्टी हो गई है।जवाहर लाल नेहरु  या जाधव पुर विश्वविद्यालय में कन्हैया जैसे छात्रनेताओं के प्रादुर्भाव की  यही तो प्रमुख पृष्ठभूमि है।
***************पिछले सात दशकों में हमारे देश में सामाजिक समरसता एवँ पुनर्निर्माण के लिए जो मील के पत्थर  सरीखे कार्य हुए वे भी पार्श्व प्रभाव के रूप में शिक्षा को संस्कार विहीन किये। रियासतों के विलय ,जमींदारी उन्मूलन ,अधिवासी कानून ,अथवा भूदान यज्ञ से जहाँ लोकतंत्र  की अच्छाइयाँ सामने आईं वहीं लाभान्वित वर्ग को लगा कि मनुवादी संस्कृति के बूते सदियों तक उन्हें उनके अधिकार से वंचित रखा गया। हद तो तब हुई जब  सामाजिक समरसता के नाम  पर जाति विशेषके लोगों को हर क्षेत्र में सरकारी आरक्षण दिया गया और आरक्षण पाने वाली जातियों की सूची उत्तरोत्तर बड़ी होती गई। भारतीय संस्कृति तथा इसके ताने बाने को आरक्षण ने इतनी छति पहुंचाई कि सामाजिक समरसता चूर -चूर होने लगी। मेधाओं के अवसर छीने और अयोग्य हाथों में जिम्मेदारियाँ आईं।सुअवसर कौन छोड़ता है ;अब जाट ,गूजर ,पटेल ,ब्राह्मण ,ठाकुर सभी  आरक्षण माँग रहे हैं और शिक्षण संस्थायें इन सारी विषमताओं के दर्पण बनते जा रहे हैं।उसी दर्पण में दुर्गा के आराधकों के सामने महिषासुर को महिमा मण्डित करने वाले भी दिखने लगे हैं।अतीत के गलत निर्णयों व् गन्दी नेतागिरी ने सामाजिक विषमता को चरम पर  पहुँचा दिया है जहाँ से इसे सही स्थान पर न लाने से देश को भयावह परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
***************विश्वपटल पर आर्थिक शक्ति के रूप में उभरते भारत को ऐसे गतिरोधकों से तत्काल छुटकारा  पाने का समय आ गया है। समय की पुकार से प्रेरित जनता ने एक देश प्रेमी सरकार को बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है। अपना दायित्व निभाते हुए जनता सरकार को याद दिला रही है कि ढुलमुल रवैया एवँ तुष्टिकरण से शासन को स्वतन्त्र किया जाय। संविधान देश के लिए है न कि देश संविधान के लिए। यदि अस्पष्टता के बहाने कोई गैरभारतीय सा व्यवहार करता है तो बोलने की स्वतंत्रता की तत्काल लिखित व्याख्या होनी चाहिए। देशप्रेम अभिव्यक्ति के जितने भी ढँग हों ,उनको संवैधानिक रूप से इस निर्देश के साथ सम्मान मिलना चाहिए कि जिस भी अभिव्यक्ति से भारत का जयकारा हो ,सभी वर्ग व धर्म के लोग समवेत स्वर से उसमें सहभागी बनें।भारत में रह कर पाकिस्तान जिंदाबाद कहने वालों को न पाकिस्तान मिले न विशेष दर्जा परन्तु उनके लिए सख्त  क़ानूनी परिणाम अवश्य सुनिश्चित हो ।यदि वर्तमान के साथ इतिहास  ठीक कर लिया जाय और संस्कार को समाज में पुनर्स्थापित कर दिया जाय तो कल हमारा है।देश को इन चुनौतियों पर विजय पाना ही होगा क्योंकि पूरी दुनियाँ की आशा भरी दृष्टि भारत पर है। ------मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 10 . 04 . 2016
------------चैत्र शुक्ल ३ सम्वत २०७३                           mangal-veena .bloger.com
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अंततः
चैत्र माह की नवरात्रि व् श्री रामनवमी के पावन पर्व पर यह स्मरण करना प्रासंगिक
होगा  कि गाँधीकल्पित रामराज्य के अतुल्य नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपनी जन्मभूमि  को कैसी श्रद्धा अर्पित करते थे।''लंका विजयोपरांत वनवास की अवधि पूर्ण होते ही प्रभु श्रीराम अपनी अर्धांगिनी जानकी ,भ्राता लक्ष्मण ,लंकापति विभीषण ,वानर राज सुग्रीव तथा अंगद आदि के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या वापस आ रहे थे। ज्यों ही विमान अयोध्या के आकाश पर पहुँचा ,मातृभूमि के दर्शन पाते ही प्रभु विह्वल हो उठे और सहयात्रिओं से बोल उठे कि -
*****जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
*****अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
*****जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तरदिसि बह सरजू पावनि।।
*****अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।श्रीरामचरितमानस।'
अस्तु ,बैकुण्ठ से भी अधिक प्रिय भारत के देशप्रेमियों को नवरात्रि एवँ श्री रामनवमी की
शुभ कामनाएँ।-------------------------------------------------------- मंगलवीणा   

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

दवा का दर्द

***************भारत जैसे देश में शिक्षा ,स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा को सकारात्मक और जनहितसाधी बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए परन्तु दुर्भाग्य से ये तीनों क्षेत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में सरकार को कम से कम ऐसे निर्णयों से बचना चाहिए जो इन क्षेत्रों में नकारात्मकता बढ़ाएँ।हाल ही में भारत सरकार ने गम्भीर रोगों में दी जाने वाली , विदेशों से आयातित, चौहत्तर दवाओं से आयत शुल्क छूट वापस लेकर एक ऐसा ही विपरीत कदम उठाया है जिसका औचित्य समझ से परे है। आयातित दवाएँ अपनी उत्तमता के कारण बाजार में हैं। अतः आर्थिक दबाव बढ़ा कर उन्हें बाजार से बाहर करना उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ अन्याय है।
***************प्रदूषित जलवायु ,आधुनिक जीवन शैली एवँ बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने अनेकानेक गम्भीर बीमारियों का सौगात भी आज के समाज को सौंपा है। इन  फैलती  बीमारियों व बढ़ती चिकित्सकीय सुविधाओं के कारण  हर  घर -परिवार में आय का एक बड़ा हिस्सा दवा पर ब्यय हो रहा है। उन परिवारों की तो आर्थिक रीढ़ ही टूट जाती है जिनका  कोई सदस्य किसी गम्भीर एवँ लम्बी बीमारी की चपेट में आ जाता है ।ऐसे में किसी भी तर्क से  दवाओं की कीमते बढ़ा कर रोगियों के लिए दवा का दर्द बढ़ाना किसी भी दवा निर्माता या सरकार के लिए सराहनीय नहीं हो सकता है।हाल ही में कुछ गम्भीर बीमारिओं में प्रयोज्य आयातित दवाओं के दाम बढ़ने से वे रोगी तो कराह ही उठे हैं जो इन दवाओं से स्वास्थ्यलाभ पा रहे हैं। यह सभी जानते ,मानते और समझते हैं कि दक्षता के साथ-साथ चिकित्सक ,चित्कित्सालय व्,चिकित्सा  रोगी के विश्वास के विषय हैं। फिर विश्वास को आर्थिक दबाव से प्रभावित करना सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिन्ह जड़ता है। अतः जिस सरकार के सर पर जनता के उम्मीदों की भारी गठरी है उसे देशी दवाओं के प्रोत्साहन के लिए, शुल्क छूट वापस लेकर आयतित दवाओं की कीमतें बढ़ा कर उनकी उम्मीदों पर पानी नहीं फेरना चाहिए।
*************** दवाओं के विषय में कोई निर्णय रोगियों के हित में होना चाहिए जिसे हमारे देश के अधिकार प्राप्त लोग समझने को तैयार नहीं हैं। वे अधिकांशतः अपने कर्तब्यों के प्रति असंवेदनशील हैं और ऐसा निर्णय ले रहे हैं कि लगता ही नहीं कि वे जनता  के लिए अधिकार संपन्न बनाये गए हैं। गाँधी के देश में नियन्ताओं को इतना भी यथेष्ठ क्यों नहीं लगता कि थोड़े समय केलिए स्वयं आम जन बन कर अनुभव करें कि उनका निर्णय उन्हें कैसा लग रहा है? स्वास्थ्य व्यवस्था को चुस्त -दुरुस्त, पारदर्शी एवँ आम आदमी केलिए सुलभ बनाने वाला प्रयास छोड़  उसे और दुसह बनाना सम्वेदना की किस कसौटी पर उचित माना जा रहा है?क्या किसी एच आई वी ,किडनी ,कैंसर ,दिल ,यकृत ,मधुमेह जैसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित ब्यक्ति ,जो इन दवाओं के सहारे जिंदगी की जंग लड़ रहा है ,के प्रति सरकार का यही कर्तव्य बोध है? शायद ही ऐसे निर्णयों से भारत स्वस्थ भारत बने।
***************आयत शुल्क की छूट वापसी केलिए सरकार ने देशी दवा की कम्पनियों को बढ़ावा देने का तर्क दिया है जिससे प्रमाणित होता है कि देशी दवा उत्पादकों का सरकार पर दबाव है। परन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि क्या सरकार का भी इन देशी  निर्माताओं पर कोई नियंत्रण है ?देश में निर्मित  दवाओं की गुणवत्ता से मूल्य तक ,जाँचशुल्क से डाक्टरों की फ़ीस तक सब कुछ अपारदर्शिता से आच्छादित हैं जिससे उपभोक्ता ,सरकारें व् अखिल भारतीय मेडिकल एसोसिएशन सभी विज्ञ हैं। फिर भी कुछ अदृश्य कारण हैं जिससे उबरने की इच्छाशक्ति न सरकार बना पा रही है न संगठन।
***************विसंगतियों को समाप्त करने के नाम  पर लोग अपनी लोक प्रियता बटोर लेते हैं और अपना हित भी साध लेते हैं पर उपभोक्ता ठगे से जहाँ के तहाँ रह जाते हैं। आज भी आमिर खान साहब की सत्यमेव जयते वाली धारावाहिक याद है जिसमें दवा क्षेत्र वाली कड़ी ने खूब वाहवाही बटोरी थी।सस्ती जेनरिक दवाओं की भी खूब ढोल पीटी गई। आस पास के किसी मेडिकल स्टोर पर जाइए,नहीं मिलती हैं। स्वच्छ भारत -स्वस्थ भारत वाले देश में यदि कहीं सबसे अस्वच्छ भारत दिखता है तो सरकारी अस्पतालों में जिनके कन्धों पर स्वस्थ भारत का दायित्व है।हो हल्ला सुनते रहिए परन्तु परिणाम- ढाक के तीन पात।सजग सरकार से अपेक्षा है कि उपभोक्ता हित में इस क्षेत्र के सभी खिलाडियों को समान सतह पर स्वस्थ एवँ पारदर्शी प्रतिद्वंदिता का अवसर प्रदान करे ताकि भारत स्वस्थ एवँ स्वच्छ रहे। तभी तो देवगण भी भारत भूमि में जन्म लेकर अपने को धन्यभागी मानें गे।---------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 14.02 .2016                                 mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
आज के त्योहार पर संत वेलेंटाइन यदि इस धरा पर होते तो ख़ुशी से झूम उठते कि उनको मानने वाले पूरी दुनियाँ में फ़ैल चुके हैं;यहाँ तक कि भारतीय सुसंस्कृति का भी चीर हरण करने लगे हैं।वेलेन्टाइन महोदय को शायद पता था कि लगभग इसी समय भारत में बसंत आगमन के साथ मदन महीप जी  का स्वागत होता है। अतः यहाँ भी हैप्पी  वेलेंटाइन डे लोगों के सर चढ़ कर बोले गा।भारतीय संस्कृति के हितैषी इस युवा भारत को क्या समझाएँ।अच्छा है कि लहरों को अपनी मस्ती में लहराने दिया जाय। संत वेलेंटाइन की जय हो। सभी सुधी पाठकों को  हैप्पी  वेलेंटाइन डे।------मंगलवीणा
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

इति श्री असहिष्णुता कथा

***************वर्ष दो हजार पंद्रह अवसान की ओर अग्रसर है। साथ ही भारत में असहिष्णुता पर चर्चा- परिचर्चा भी समाप्त हो रही है। टीवी पटल से इस विषय का गायब होना और दूसरे विषयों का अवतरित होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके कई उदाहरणों में प्रथम भारत द्वारा पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना या दूसरा सोनिया जी व राहुल का दल -बल के साथ न्यायलय में उपस्थित होना है। किसी न किसी रूप में  यह असहिष्णुता सदियों से समाज के ताने -बाने में विद्यमान रही है। इतिहास साक्षी है कि पूर्व मध्य काल से आज तक,विदेशी आक्रान्ताओं और देशी दमनकारी शासकों  के लिए सहिष्णु भारत एवँ सहिष्णु भारतीय प्रशंसनीय रहे हैं क्योंकि हमारी सहिष्णुता पर ही उनकी असहिष्णुता फूलती - फलती रही है। बारहवीं सदी वाले उस काल -खण्ड को लोग आज भी याद करते हैं जिसमें सहिष्णु पृथ्वीराज चौहान बार - बार विजयी होने पर असहिष्णु एवँ आक्रान्ता मुहम्मद गोरी को छोड़ते गए और सन  ग्यारह सौ बानवे में आक्रमण कर जब उसने चौहान को पराजित किया तो उन्हें बन्दी बना कर अफगानिस्तान ले गया और यातनापूर्ण मृत्युदण्ड दिया।भारतीय इतिहास के हर नए पृष्ठ पर कुछ ऐसे ही घटनाक्रम झाँकते हैं। देशी राज्यों में आपसी असहयोग एवँ स्वभावगत सहिष्णुता के कारण लगातार बाहरी आक्रमण होते रहे और हमारे देश का इतिहास, भूगोल एवँ समाज  बदलता रहा। वर्तमान भारत में उसी समाज की नई         पीढ़ियाँ  बसती हैं जिसमें ढेर सारे अयोग्य एवँ असहिष्णु लोग भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के सहारे समाज में स्थान बना लिए हैं। आज की भारतीय जलवायु में जब शुद्ध धर्मनिरपेक्षता,प्रखर राष्ट्रवाद एवँ सबके विकास की बात होने लगी है तो ऐसे लोगों में घबराहट हुई है और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए वे सरकार और उनके समर्थन वाली जनता को असहिष्णु बनाने लगे हैं।यदि इस दबाव को निष्प्रभावी नहीं किया गया तो सरकार अपने मुद्दों से भटके गी और कुचक्र चलनेवाले अपने मंतव्य में सफल हो जाँयगे।
***************कोई घटनाक्रम नहीं अपितु दो घटनाएँ थीं जिनकी पृष्ठभूमि में वर्तमान असहिष्णुता का वितान रचा गया। ये थीं -कन्नड़ भाषा के साहित्यकार श्री कुल्बर्गी की हत्या एवँ दादरी में बीफ खाने की अफवाह पर अखलाक नामक एक व्यक्ति की पिटाई से मौत।दोनों ही घटनाएँ कानून व्यवस्था से जुड़ीं हैं और राज्य सरकारों का प्रथम दायित्व है कि हर नागरिक के जान -माल उसके संवैधानिक अधिकारों को चुस्त दुरुस्त सुरक्षा प्रदान करें।यदि ऐसा करने में राज्य सरकारें विफल होती  हैं तो उन्हें सत्ता में रहने का कोई औचित्य नहीं है। अतः अतीत के पुरस्कार विजेताओं में यदि कुछ लोगों को विरोध जताने की बात सूझी तो उन्हें कर्नाटक की काँग्रेस एवँ उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकारों के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए था न कि केंद्र की गठबन्धन सरकार के बिरुद्ध। पूरे देश ने देखा कि दोषी कौन और कठघरे में खड़ा किसको किया गया।उद्देश्य एक ही था कि मारो कहीं लगे वहीँ।
***************यह सर्व विदित है कि किसी व्यक्ति को पुरस्कृत होने के लिए उत्कृष्टता के साथ एक अहं मापदण्ड पुरस्कार देने वाली सरकार या संस्था का ,विचारधारा आधारित, पसन्द भी होता है। पुरस्कृत होने पर  प्राप्त कर्ता को अल्पकालिक एवँ दीर्घकालिक दो प्रकार के लाभ होते हैं यथा एकाएक व्यक्ति को ख्याति मिलती है ,अपने क्षेत्र में उसकी पूछ बढ़ती है और भविष्य में सरकारी एवँ गैर सरकारी सुविधाओँ के लिए उसकी पात्रता बढ़ती है।यही कारण है कि गैर राष्ट्रवादी सरकारों के दौर में वामपंथी ,काँग्रेसी ,क्षद्म धर्मनिरपेक्षी और गैर हिंदूवादी विचारों वाले साहित्यकार ,समाजसेवी  वैज्ञानिक ,सिनेधर्मी ,संगीतज्ञ इत्यादि खूब पुरस्कृत होते रहे और दीर्घकालिक लाभ उठाते रहे।इन आदरणीयों में कुछ लोग  ऐसे भी हैं जो राष्ट्रवाद , वहुसंख्यकवाद एवँ मूल धर्मनिरपेक्षता को अपने एवँ देश के लिए अस्पृश्य मानते हैं। फलतः बेमेल विचार की व्यवस्था में ऐसे लोगों के सर्वकालिक लाभ भी बाधित  हुए । फिर क्या कुल्बर्गी या दादरी के बहाने , घटती आदरणीयता वाले  ये लोग सरकार के ऊपर असहिष्णु होने का आरोप लगा दिए। साहित्य अकादमी के सदस्य ,पैंतीस पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकार ,समाजसेवी,रंगकर्मी ,नेता. पुरस्कारों से जुडी संस्थायें इत्यादि मैदान में कूद पड़े। मीडिया के मैदान में भयंकर वाकयुद्ध हुआ कि सरकार असहिष्णु हो गई या नहीं।  अंततः मिथ्या बादल छँटने लगे और देशवासी समझ पाये कि असहिष्णु कौन हैं। वस्तुतः एक बहुमत से चुनी सरकार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी असहिष्णुता है।
***************************** पूरी दुनियाँ में अपनी श्रेष्ठता एवँ स्वार्थपूर्ति के लिए विभिन्न समुदाय  के लोगों में दूसरों के प्रति  असहिष्णुता रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह बढ़ती ही जा रही है। संभवतः यही असहिष्णुता भविष्य में  विनाश का कारण बने क्योंकि हम एक दूसरे के लिए ही नहीं बल्कि अपनी धरती पहाड़  ,पर्यावरण  ,जल ,वायु ,जीव -जन्तु सबके प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं।असहिष्णुता के एक से बढ़ कर एक गम्भीर विषय दुनियाँ के सामने हैं। अतः असहिष्णुता -असहिष्णुता का खेल खेलने वालों को सोचना होगा कि कौन सी असहिष्णुता की बात कर रहे हैं। दादरी एवँ बंगलुरू वाली लकीरों के सापेक्ष तो जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार व लाखों हिन्दुओं का घाटी से पलायन या सन चौरासी में  श्रीमती  इन्दिरा ग़ांधी की हत्या के बाद सिक्खों के नरसंहार की लकीरें बहुत बड़ी थीं। लगता है कि उस समय उन्हें असहिष्णुता की याद नहीं आई।बांग्ला देश की लेखिका तस्लीमा नसरीन  ने ऐसा कुछ कह कर,  कि भारत में जो मुसलमानों की बात करे वह धर्मनिरपेक्ष (सहिष्णु ) और जो हिन्दुओं की बात करे वह हिंदूवादी ( असहिष्णु ) ,ऐसा आईना दिखाया है कि तथाकथित आदरणीयों को अपनी कुरूपता के लिए पूरे राष्ट्र से क्षमा माँगनी चाहिए।
***************परन्तु केंद्र सरकार को भी विरोधिओं के मिथ्या आचरण व उनके उद्देश्य से सतर्क हो जाना चाहिए। असहिष्णुता ठण्डी पड़ेगी तो भ्रष्टाचार को गरमा जाय गा ,एक मंत्री का कोई वक्तव्य ठण्डा पड़ेगा तो किसी दूसरे मंत्री या भाजपाई का वक्तव्य उछाल दिया जाय गा। अर्थ व्यवस्था को गति देने के लिए जीएसटी जैसे कानून चाहिए तो राज्य सभा में बहुमत के बल पर वे ऐसा होने नहीं देंगे ,मुद्दों की कमी होगी तो प्रधान मंत्री को प्रवासी भारतीय बनायेंगे अथवा उनके पहनावे पर कटाक्ष करें गे और देश विदेश में ऐसा वातावरण बनायें गे कि मेक इन इंडिया की ऐसी तैसी हो जाय। संसद तो इस लिए चलने नहीं देंगे क्योंकि उनके शासनकाल में भाजपा वाले भी गतिरोध पैदा किये थे। ये लोग  सौहार्द ,आर्थिक विकास एवँ रोजगार के अवसरों को बाधित करने का पुरजोर प्रयास करेंगे।इनके षड्यन्त्रों  को निष्फल करने ,अपने चुनावी वादों को पूरा करने एवँ जनता से सक्रिय संवाद बनाये रखने में ही वर्तमान सरकार एवँ देश की प्रगति का मंगलकारी भविष्य छिपा है।
***************सारी दुनियाँ सहमत है कि गाँधी की अहिँसा सहिष्णुता की आदर्श अवस्था है और समाज में इसी की स्थापना के लिए असहिष्णुता के विरुद्ध हिंसात्मक संघर्ष होते हैं। यह प्रवृत्ति बहुदा दबती हुई तो पाई गई है परन्तु किसी भी संस्कृति में कभी भी समूल नष्ट होते नहीं पाई गई है। इसका कारण शायद  इसी तथ्य में छिपा है कि सामाजिक होने के साथ ही मनुष्य एक जानवर है। फिर भी सामाजिकता के नाते मनुष्य यदि मनुष्य से मनुष्यता का व्यवहार करे तो असहिष्णुता न्यूनतर होती जायगी और मानवता गाँधी के सपनो वाले राम राज्य को प्राप्त कर लेगी।मानव जाति में भी जिन्हें समाज आदरणीय कहता है उन्हें आदरणीयता के मापदण्ड पर सदैव खरा उतरना होगा वरन रँगा सियार की कहानी सत्यार्थ होगी।इति श्री असहिष्णुता कथा।----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,तिथि :२४ दिसम्बर 2015                    mangal-veena.blogspot.com
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शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

क्या होगा बिहार का

***************बिहार में नई सरकार बनाने हेतु चुनाव प्रक्रिया जारी है।परिणाम बतायें गे कि वहाँ के मतदाता अपने पूर्वाग्रह पर  पूर्ववत  डटे हुए हैं या रूढ़ियों को तोड़कर विकास व प्रगति की धारा में अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा का विचार बनाते हैं। यह चुनाव सरकार के बदलाव के साथ वहाँ के मतदाता की अपेक्षाओं को नए ढंग से परिभाषित करने एवँ पाने का सुअवसर भी है।हम सभी जानते हैं कि स्वतन्त्र भारत में समान अवसर की उपलब्धता व बिहार वासियों की बेहतर बौद्धिक सम्पन्नता के बाद भी बिहार से राजनीतिक गांभीर्य गायब हो गया ,शिक्षा अशिक्षित शिक्षा हो गई और सामाजिक पिछडापन वहाँ का ट्रेड मार्क बन गया। न बिहारियों का दूसरे राज्यों में तीब्रतम पलायन बन्द हुआ ,न दूसरे राज्य के लोगों का बिहारियों के प्रति दृष्टिकोण बदला। सामाजिक पिछड़ापन दूर करने केलिए जो आरक्षण की व्यवस्था हुई उससे कुछ वर्गों के पिछड़ेपन को दूर होने की क्या बात हो ,उल्टे पूरा बिहार ही पिछड़ गया। फिर क्या इसके साथ  हीनभावना पैदा करने वाला बीमारू राज्य जैसा नाम नत्थी कर दिया गया। अब बीमारू राज्य को स्वास्थ्यलाभ के लिए विशेष पैकेज की माँग हो रही है और यह इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा है।
***************वैसे तो बिहार में किसी भी जाति का प्रतिशत घनत्व इतना नहीं है कि अकेले अपने दम पर किसी प्रत्याशी को विधायक या सांसद का चुनाव जिता दे परन्तु जातिवादी नेताओं के गठजोड़ के कारण जब दो या दो से अधिक जातियों के ध्रुवीकरण का मायाजाल फैलता है तो अयोग्य एवँ जातिवादी लोग विधान सभा और संसद में पहुँचने में सफल हो जाते हैं और प्रदेश एवँ देश की बर्बादी के कर्ता और कारण बनते हैं। शिक्षा को पटरी से उतार देने से बिहार की आम जनता में जाति ,धर्म ,आम जनोपयोगी कानून  व विकास का घाल मेल हो गया। यदि इस प्रदेश में समृद्ध शिक्षा का समुचित विकास हुआ होता तो मतदाताओं में यह जागृति अवश्य होती कि जाति और धर्म का अलग क्षेत्र है जिसमें हमें जीना चाहिए , गर्व करना चाहिए ;साथ ही दूसरे की जाति व धर्म का समादर करते हुए अपने जाति व धर्म की उन्नति के लिए प्रयास करना चाहिए।ऐसा होने पर यह भी जागृति  होती कि विधायिका एवँ संसद का क्षेत्र विकासोन्मुखी एवँ व्यवस्थादायी क़ानून बनाना तथा विकास  एवँ कानून की व्यवस्था का सुनिश्चितीकरण है। फिर तो जनता यही क्षीर -नीर विवेक वाला सूत्र अपना लेती और विश्व में सबसे पहले जनतंत्र का प्रयोग करने वाला बिहार आज अपना खोया वैभव पुनः प्राप्त कर, अन्य राज्यों के लिए ,मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकता है। देखना होगा कि जाति ,धर्म से अलग हट कर विकास एवँ विकासोन्मुखी विधायिका के लिए चुनाव लड़ रहे दलों व प्रत्याशियों का क्या हश्र होता है।
***************एक विधायक कैसा हो ,इसका सीधा -साधा मानक हर मतदाता को पता है। फिर भी स्वार्थी दल व प्रत्याशी मिथ्या प्रचार से ऐसी मृग मरीचिका तैयार कर रहे हैं कि मानक या कसौटी के मापदंड ही दृश्यपटल से ओझल हो जाँय और मरीचिका में हिरन का शिकार हो जाय। जातिवाद ,धर्मवाद ,आरक्षण ,गो रक्षा या गो हत्या ,दलित उत्पीड़न ,बलात्कार ,पड़ोसी पाकिस्तान से संबंध और कालिख का पोता -पोती ,राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ पर तंजकसी और पूँजीवाद जैसे मुद्दे इस चुनाव के लिए गढ़े और उछाले जा रहे हैं जिनका उद्देश्य चुनाव को मूल उद्देश्य से भटकाना है।इसी कड़ी में तथाकथित साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर चुनावी संग्राम को एक नया मुद्दा दिया है।सैक्युलरिज्म के भ्रामक प्रचार से वैसे ही स्वार्थी नेता  इस राष्ट्र के विकास को बाधित किए हुए हैं।इन भूलभुलैयों से बाहर निकलना बिहार के मतदाताओं के लिए एक कठिन परीक्षा है।
***************चुनाव परिणाम के बाद बिहार का राजनीतिक स्वरुप देश की भावी दिशा एवँ गति को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करे गा।यदि भ्रामक मुद्दों की पराजय होती है तो विजय का मुकुट बिहार के नव युवतिओं और युवकों के सर पर होगा तथा प्रगति एवँ विकास वादी बिहार का उदय होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो मानना ही होगा कि चक्रव्यूह में अभिमन्यु अभी भी फँसा हुआ है। सत्ता ही नहीं विपक्ष में भी जो विधायक चुन कर आएं गे उनकी पृष्ठभूमि ,सोच व रुझान से लोकतान्त्रिक प्रणाली में त्रुटि ,संतुलन और सुधार की धनात्मक या ऋणात्मक लालसा का संकेत होगा। कोई भारत वासी नहीं चाहता कि कमाई ,दवाई और पढाई के लिए बिहार के लोग परप्रांतों पर निर्भर रहें। सराहनीय स्थिति वह होगी कि उलटी गंगा बहे। नई सोच के लोग यह भी देखने को उत्सुक हैं कि बिहार के नेताओं को मतदाता हमेशा केलिए उनके यथोचित स्थान पर पहुँचायें गे अथवा नौटंकी जारी रहे गी और थाप पर दर्शक जुटते रहें गे।---------------- मंगलवीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 24 अक्टूबर 2015
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शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

लोग हिन्दियाने लगे हैं

***************लोग हिन्दियाने लगे हैं और हिंदी की चाटुकारिता कर चाय पानी पीने लगे हैं। यह पक्का प्रमाण है कि हिंदुस्तान में हिंदी पखवारे का आगमन हो गया। इस पर्व को पन्द्रह दिनों तक मनाने के लिए सरकार प्रचुर धनराशि खर्च करती है। इस लिए पैसे की स्वीकृति पूर्व में ही करा ली जाती है। फिर क्या हर कार्यालय के प्रमुख ,हिंदी अधिकारी व कर्मचारी नेमी कार्यों से विरत हो नित एक नया कार्यक्रम आयोजित करते हैं और स्मृतिचिन्ह ,पुरस्कार व जलपान में पैसे समायोजित करते हुए हिंदी को भरपूर उपकृत करते हैं।इस पखवारे में ऐसे निठल्ले कहे जाने वाले कर्मचारियों की ,जिन्हें केवल हिंदी लिखना ,बोलना आता है, उनकी वैसे ही पूछ बढ़ जाती है जैसे शरद ऋतु में खञ्जन पक्ष की। गैर हिंदी भाषी  कर्मचारी जिन्हे थोड़ी बहुत हिंदी आती है वे तो इस पखवारे में साइबेरिया से आये प्रवासी पक्षियों की भाँति गोष्ठियों में दर्शनीय व शोभनीय हो जाते हैं।जहाँ चाह है वहाँ राह है। दो चार लोग वाद -विवाद ,टिप्पण , टंकन,लेखन ,आलेखन इत्यादि में भाग लेने केलिए जुटा लिए जाते हैं। निर्णायक की भूमिका के लिए हिंदी के लाभार्थी तथा व्याख्यान के लिए धनार्थी हर कार्यालय को बड़ी सुगमता से मिल जाते हैं। चूँकि पैसे से जुड़ा है अतः प्रिंट एवँ इलेक्ट्रानिक माध्यमों की भी सहभागिता हो जाती है। बड़े ही आनन्दमय वातावरण में"अगले बरस फिर अहियो साथ में ज्यादा बजट ले अहियो' की कामना के साथ विभागाध्यक्षों द्वारा पखवारे का समापन कर दिया जाता है। फिर वही यक्ष प्रश्न कि लेखा डेवढ़ा थाहे तो लड़के डूबे काहे ?
***************स्वाधीन भारत में हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने एवँ,इसके प्रचार प्रसार हेतु दशकों से हर वर्ष यह सरकारी पर्व मनाया जा रहा है परन्तु हिंदी देश की राजनीतिक देहरी पर, अपने हक़ के लिए, सात दशकों से अनवरत खड़ी है।हमारे नेता इसे राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की बात करते हैं परन्तु राष्ट्र भाषा बनाने की चर्चा से कन्नी काट जाते हैं। प्रारंभिक दिनों में बाबुओं द्वारा सरकार के ज्ञाप ,परिपत्र  या पत्र अंग्रेजी में जारी हो जाते थे और नीचे लिख दिया जाता था -हिंदी वर्जन फलोज। आश्चर्य है आज भी वैसा ही हो रहा है। इस प्रक्रिया को हिंदी की नियमित मासिक प्रगति रिपोर्ट बनानेवाले बाबू इतने वर्षों में उलट तक नहीं सके कि कोई अभिलेख हिंदी में पहले जारी हो और उस पर लिखा हो कि अंग्रेजी अनुवाद साथ -साथ।हमारे लोकतंत्र में विश्वसनीयता  के पैमाने पर सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है परन्तु आज तक उसे भी चिन्ता नहीं हुई कि वह जो फैसले अंग्रेजी में देती है उसका सीधा सम्वन्ध जनता से है जिसकी मातृ भाषा हिंदी है या हिंदी की सहोदरी भाषाएँ। ऐसे में फैसले भी वकील या उन जैसे दुभाषिये पढ़ कर न्याययाची को बताते हैं।ये न्याय देने वाले भारतीयता का कौन सा आदर्श उच्च या निचले न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जनहित की सोचने वाले जनहित का मरम जानने में विफल हैं।अब वे तर्क बेमानी लगते हैं कि हिंदी में तकनीकी शब्दावली क़ी कमी है या विज्ञानं,अभियांत्रिकी ,अंतरिक्ष ,कानून जैसे विषय हिंदी में ब्यक्त नहीं हो पाते। भाषाओँ की दूरियाँ मिट रही हैं। अंग्रेजी का ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष प्रति संस्करण अनेकों हिंदी के शब्द आत्मसात कर रहा है। वैसे ही हिंदी में अन्य भाषाओँ के अनेकानेक शब्द घुल मिल रहे हैं।जिन शब्दों के अन्य भाषाओँ में समानार्थी नहीं होते वे शब्द हर भाषा के लिए सर्वमान्य रूप में लिए जाते हैं। भाषा पर महात्मा गाँधी के यही विचार थे जब वे हिंदुस्तानी भाषा पर बल देते थे। अतः इस बहकाने वाले कुतर्क से हट कर उस मन्तब्य को सामने लाना चाहिए जो हिंदी से भेद भाव का मूल कारण है।
***************इस भेद भाव की नींव भारत की पराधीनता के दिनों में पड़ी जब अंग्रेज शासन करते थे। उनकी अपनी शासन शैली थी जिसमें वे अपनी अँग्रेजी भाषा ,अपनी सभ्यता ,अपनी जाति एवँ अपनी शिक्षा को पूरी दुनियाँ में सर्व श्रेष्ठ मानते थे।वे लोग लम्बे शासन काल में देशी साधन संपन्न लोगों को अपने साँचे में ढाल कर कर देशी अंग्रेज बनाते गए। स्वतंत्रता मिलने तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति की जड़ें बहुत सुद्दृढ की जा चुकी थीं और देशी अंग्रेज़ या इंडियन, अंग्रेजियत के साथ, सत्ता सँभालने के लिए तैयार हो चुके थे। फिर क्या था ये देशी इंडियन सत्ता सँभाल लिए और देशी भाषाओँ को भारतीयों की भाषा तक सीमित कर आज तक भारत पर नियंत्रण किये हुए हैं।ये इंडियन ही भारती एवँ भारतीयता के अहित साधक है जो हिन्दी पखवारा का आयोजन कर करा कर हिन्दी भाषियों को तुष्ट करने का उपक्रम करते हैं।परन्तु साठ करोड़ से भी अधिक देशी हिंदी भाषी एवँ दुनियाँ में फैले भारतीय मूल के लोग अपनी भाषा के साथ हो रहे दुर्भाव को सहन करते हुए आज भी उसकी सेवा तथा प्रचार -प्रसार में अनवरत लगे हुए हैं।ये असंख्य हिंदीभाषी अपनी इस मातृ भाषा को विश्व की सम्पन्नतम व सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में पहचान दिला चुके हैं और उसे वह हर प्रतिष्ठा भी दिलायें गे जो साहित्य ,कला ,लालित्य से ओतप्रोत एक जीवंत लोकप्रिय भाषा को मिलनी चाहिए।हिंदी का गंतब्य राजभाषा ,संपर्कभाषा से आगे राष्ट्र भाषा के रास्ते विश्व भाषा बन कर अन्तरिक्ष के अनंत रहस्यों तक है।
***************हिंदी पखवारा जैसे आयोजनों के औचित्य पर भी हिंदी साधकों के दो परस्पर विरोधी धड़े हैं।एक निःस्वार्थ साधकों का वर्ग है जो पूर्व ऐतिहासिक काल से अर्थात संस्कृत वांग्मय से उद्गमित होने से अब तक इस भारती की सेवा तल्लीन है। दूसरे वर्ग में  हिन्दी के लाभार्थी साधक हैं जिनकी परम्परा बीर गाथा काल के चारण अथवा भाटों से आरम्भ हो भक्ति एवँ रीति काल के दरबारी साहित्यकारों से होते हुए आधुनिक काल के सरकारी सजावटी साहित्यकारों तक है।निःसंदेह दोनों वर्ग के साधक आज की आधुनिक हिन्दी के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं परन्तु हिंदी को श्रेष्ठता की धार देने वाले निःस्वार्थ साधक रहे हैं जिन्होनें हिंदी की सेवा स्वान्तःसुखाय की है या कर रहे हैं। यह वही परम्परा है जिसका श्रीगणेश गोस्वामी तुलसी ने यह लिख कर किया कि भाषाबद्ध करब हम सोई ,मोरे मन भरोस जेहि होई।कारण बताया कि कीरति ,भनति ,भूति भल सोई,सुरसरि सम सबकर हित होई।अतः हिंदी के निःस्वार्थ सेवक,हिन्दी के कामिल बुल्के सरीखे विदेशी विद्वान व विदेशी शैक्षिक संस्थान सभी भूरि -भूरि प्रसस्ति के पात्र हैं।
***************इन वर्गद्वय के आलावा हिन्दी को बुलन्दियों पर पहुँचाने वालों में हिन्दी के चलचित्रों,हिंदी टीवी के समाचार व मनोरंजन के कार्यक्रमों ,हिन्दी के समाचार पत्रों तथा विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों का भी प्रथम पंक्ति में गणनीय योगदान रहा है। हिंदी में जीने वाले राजनेताओं ने भी कभी -कभी विश्व मंच से हिन्दी के लिए भारत देश को गौरवान्वित किया है। हिंदी फ़िल्मी गानों ,चलचित्रों ,भारतीय संगीत ,योग ,जय हो ,नमस्ते या सबका साथ सबका विकास का तो कहना क्या?ये पूरी दुनियाँ में हिन्दी की दुंदुभी बजा रहे हैं।देश के शिक्षा संस्थानों के लिए भी, संकोच से बाहर होकर, नेतृत्व करते हुए हिंदी के प्रति अपने दियित्व निर्वहन का यह स्वर्णिम समय है। मंच कोई भी हो, पखवारा हो या न हो , यदि हम भारतीय हिन्दी भाषी होने पर गर्व करें और आत्मविश्वास से हिन्दीमय ब्यवहार करें तो सबसे आगे होगी हिंदुस्तानी (हिंदी )। जो आनन्द हिन्दुस्तानिओं को आपस में हिन्दियाने में है वह और कहाँ।    ------------------------------ मंगलवीणा
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वाराणसी ;दिनाँक 18 . 09. 2015 -------------------mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 7 सितंबर 2015

पावसनामा

***************रीतिकालीन "बरसा ऋतु सुखदानि जग ,तुम सम कोऊ नहीं" के विपरीत विदाई की ओर अग्रसर बरसात ने जनता की उलझने और उलझाई।ग्रीष्म के महीनों में मौसम विज्ञानियों ने यह कह कर कृषकों की उलझन बढ़ा दी कि इस वर्ष बरसात औसत से कम होगी। अर्थ व्यवस्था पर इसके कुप्रभाव एवं सरकार की तैयारियों पर चर्चा भी चल पड़ी। परन्तु जब वर्षा होने लगी तो ऎसी हुई कि तीन चौथाई देश जलमग्न हो  गया। बादल ऐसे फटे कि गाँव के गाँव अस्तित्व खो बैठे।समाचारों के अनुसार बाढ़ और बरसात से पूर्व की भाँति काफी जन धन की हानि हुई है जब कि कथनी के अनुसार सरकारें भी अति सक्रिय रहीं।पता नहीं ये मिथ्या पूर्वानुमान लगाने वाले सूखे का लाभ उठाने वालों को सही समय का संकेत दे रहे थे या देश के एक युवा नेता की तरह अपनी विशेषज्ञता की ढफली बजा रहे थे।इस पावस ने यह भी देखा कि गुण्डे ,लुटेरे ,हैवान खुलेआम आम आदमी एवँ उनकी बहन ,बेटियों की मर्यादा तार -तार करते रहे और चोर लुटेरे जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ साफ करने का रिकार्ड बनाते रहे। राज्य सरकारें जिनके हाथ कानून व्यवस्था है वे सुरक्षा सुनिश्चित करने से ज्यादा यह प्रचारित करने में लगे रहे कि अन्य राज्यों की तुलना में उनके यहाँ कम अपराध है।घटना घटने के बाद अपनी रीति के अनुसार हमेशा देर से पहुँचने वाली पुलिस और प्रशासन के लोग खानापूर्ति करते हुए जनता की जले पर नमक छिड़कते रहे। थोड़े और समय बाद जब विभिन्न दलों के नेता  पहुँच कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए घड़ियाली आँसू बहाना नहीं भूले तो शासन और सरकार से जनता को अत्याधिक घृणा हुई।  भुक्तभोगियों की हर प्रतिक्रिया नक्कारखाने में तूती सिद्ध होती रही है।लोकतंत्र से जनता अपने हक़ और सरकार के कर्तव्यों की अपेक्षा करती है पर सरकारें उन्हें अपनी कुटिल कृपावृष्टि से उपकृत कर रही हैं।ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं जो देश को बहुत हानि पहुँचा रही हैं।नई केंद्र सरकार द्वारा इस ऋतु में भी कुछ ऐसा होते नहीं दिखा कि इंडिया भारत बनने या भारत इंडिया बनने की ओर अग्रसर हों।ऐसे में पूर्व की भाँति जनता को न्याय पालिका एवँ मिडिया का वही सहारा रहा जो डूबते को तिनके से मिलता है परंतु कर्तव्य एवँ सुविधा के बीच स्वयं इनकी उलझन चिन्ता की लकीरें खींच रही हैं।
***************दूसरी ओर वर्षा ऋतु में हमारे देश की सड़कें ,रेल व बिजली व्यवस्था भी पानी -पानी हो गईं और लोगों की जान से जी भर के खेलीं ।जिन्हे लोगों के जान माल की चिंता होनी चाहिए वे सोचते हैं कि यह तो सामान्य बात है क्योंकि व्यवस्था  जनता के लिए है तो जनता ही भुगते गी भी।परन्तु आम आदमी क्या चाहता है ,यह कोई इतनी गूढ़ पहेली नहीं है। जहाँ जनता को चाहिए सुरक्षित ससमय रेलयात्रा वहाँ बार -बार हो रही रेल दुर्घटनाएँ उन्हें मौत का भय दे रही हैं और सरकार तीब्र द्रुतगामी रेल के सपने दिखा रही है। जहाँ उन्हें चाहिए टिकाऊ ,समतल, पक्की सड़कें वहाँ उन्हें दी जा रही है - अल्पावधि में गिट्टियाँ उधड़ी ऊबड़ -खाबड़ जानलेवा सड़कें जिन पर प्रतिवर्ष लाखों लोग दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं।सरकार को तो दिखता ही नहीं कि बरसात में कुछ सडकों ने ताल -तलैया का रूप ले लिया और आस -पास बिखरी गिट्टियाँ उन पर चलने वालों के हाथ -पैर तोड़ रही हैं। आम लोग हैरान -परेशान हैं कि ये सड़कें क्यों बनाई जाती हैं। यदि सरकार के पास कोई दक्ष ,ईमानदार और सक्षम व्यवस्था नहीं है तो पहाड़ों को तोड़ कर पर्यावरण को हानि पहुँचाने ,पत्थर की गिट्टियों को समतल भूमि पर छींटने या यही क्रम बार -बार दुहराने और जनता के पैसे बर्बाद करने का सरकार को कोई हक़ नहीं है। लोग अपने को सत्ताधारी ,सरकारी एवँ गैरसरकारी लुटेरों के हाथ लुटते पा रहे हैं और अपनी नियति को कोस रहे हैं।कुछ साल पहले तक कच्ची सड़कें थीं या कम रेल सेवाएँ थीं तो क्या आज जैसी जानमारू तो नहीं थी।नई सड़कें बनती जा रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें लाखों किलोमीटर सड़क व पुलों के निर्माण होड़ में लगी हैं परन्तु पुरानी सडकों की दयनीयता को कोई देखने वाला नहीं। बिजली की आँख मिचौनी ने जीना दूभर कर रखा है ऊपर से पुराने जर्जर तार बरसात में सडकों एवँ गलिओं में टूट कर गिर रहे हैं और लोगों के जान ले रहे हैं। इसकी चिंता छोड़ नए तार बिछाए जा रहे हैं।जनता क्यों न सोचे कि विशेष अभिरुचि के कारण भी विशेष होते हैं।
**************इस पावस में बच्चों की शिक्षा एवँ सरकारी स्कूलों की दुर्दशा  ने आम लोगों को खूब झकझोरा ;यहाँ तक कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहबाद को सख्त निर्णय सुनाना पड़ा कि नेता एवँ अधिकारियों के बच्चे अनिवार्यतः सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जाँय तभी सरकारी विद्यालयों की दशा सुधरे गी। जरा उस मनोदशा को सोचें जब कृषक या श्रमिक खेतों में जूझ कर घर आते हैं और बैठक में सुस्ताते जब घर का कोई सदस्य कहता है कि रीता और रितेश को फिर सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही भेजना होगा, क्योंकि बाजार में चल रहे अंग्रेजी माध्यम वाले प्राइवेट स्कूल बहुत ज्यादा दाखिला फ़ीस माँग रहे हैं। घर का बूढ़ा मुखिया धुँधली नज़रों से आसमान की ओर देखता है। न उसे तारे दिखते हैं न ही सुनहरी चाँदनी। मानो देसी सरकार रूपी बादलों ने उनके भविष्य को अंधकार से ढँक लिया हो।फिर थका हारा  चिंतित परिवार अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य पर इस चर्चा में लग जाता है कि देश में दो प्रकार के स्कूल क्यों। ये नेता कौन सी आजादी की बात करते हैं ? यदि सरकारी स्कूल ही ठीक से चलाते तो हम प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में बच्चे पढ़ाने को क्यों तरसते। वाह रे, स्वराज के अरसठ साल बाद वाले सरकारी स्कूल --जर्जर भवन ,इक्के -दुक्के मास्टर ,न कापी न किताब।शिक्षा का कोई माहौल नहीं परन्तु मध्यान्ह भोजन की चिंता अवश्य हो रही है। ये सरकारी स्कूल क्या हैं - साक्षात शिशु शरणार्थी गृह। अंततः मुखिया निर्णय लेता है कि उसका बेटा अपने बच्चों व पत्नी के साथ शहर जाय। वहीँ अपनी रोजी तलाशे और किसी अच्छे स्कूल में बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करे।बूढ़ों के बुढ़ापे की चिंता छोड़ लोग बच्चों की पढाई हेतु शहर की ओर भाग रहे हैं।उस विकास को क्या कहा जाय जहाँ अच्छी शिक्षा अमीरों के लिए आरक्षित हो गई, नौकरियाँ सामाजिक पिछङों को आरक्षित हो गईं और गरीबों को परवश हो कराहने व वोट देने के लिए छोड़ दिया गया।उस बरसात को भी क्या कहा जाय जिसमें लोगों को घर छोड़ शहर की राह पकड़नी पड़े जबकि हमारी परंपरा चतुर्मासा में प्रवास पर जाना वर्जित करती है। शिक्षक दिवस को राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने मुखर्जी सर बन कर विद्यार्थियों को पढ़ाया ;वहीँ प्रधान मंत्री जी ने सीधे विद्यार्थियों से संवाद किया।यह शिक्षा सुधार की दिशा में एक नव युगारम्भकारी पहल हो सकता है परन्तु तभी जब अंतिम पंक्ति में बैठे साधनहीन विद्यर्थियों को पब्लिक स्कूलों की सुविधा देते हुए उनकी कक्षा में ऐसे दिवस मनाये जाँय गे।भारत और इंडिया अलग -अलग शब्द  होना छोड़ एक शब्दार्थ बनाने का प्रयास करते भी नहीं दीख रहे हैं।    
*************** बीते पावस से जनताको सुखद आस थी कि सरकार जीएसटी विधेयक पारित कर देगी  जिससे उपयोग की जिंस सस्ते दामों पर मिलने लगेंगी। कर के नाम पर ठगहारी व लूट बन्द हो जाय गी। परन्तु ऐसा हो न सका। जो सत्ता खो कर विपक्ष में बैठे हैं ,ऐसा भष्मासुरी नाच संसद और संसद के बाहर नाचे कि जनता ठगी कि ठगी रह गई।जनता के कई सौ करोड़ रुपये इनके इस नौटंकी आयोजन पर खर्च हो गए।ऊपर से इन शर्मविहीन सांसदों ने लोकलाज को किनारे रख अपने बेतन ,भत्ता व छूट वाले भोजन का पावस में खूब आनंद उठाया। आजकल अपने -अपने क्षेत्र में जनता के सामने अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि कैसे उन्होंने सरकार को घुटने टेका दिया। हो सकता है आगामी किसी सत्र में ये सभी पक्ष विपक्ष के नेता ,जीएसटी या कोई अन्य विधेयक पारित करते हुए, एक मत से अपना बेतन ,भत्ता दुगुना या तिगुना करा लें व अपनी विशेष दर्जा व सुविधा की और बड़ी सूची जनता को पकड़ा दें।सातवें बेतन आयोग की सिफारिशें आनेवाली हैं तो बाबू से पीछे सांसद ,विधायक क्यों।जागीर उनकी है ,जो कुछ  उनके उपभोग से बच जाय वह कमीशनखोरी के बाद देश एवँ देश के विकास के लिए ही तो है।                    
***************पावस बीतने वाला है पर उलझन सुलझे ना। स्वतंत्रता पाने के अति उत्साह में तत्कालीन नेताओं ने देश के लिए आरक्षण ,जम्मू -कश्मीर ,देश विभाजन ,राष्ट्रभाषा  जैसे राजरोग पैदा कर दिए जो देश की प्रगति को घुन की नाईं चाट रहे हैं।जहाँ जनता की अपनी असह्य उलझनें हैं वहाँ ये पैदा की हुई राष्ट्रीय अनुवाँशिक समस्याएँ, जैसे आरक्षण के लिए चल रहे आन्दोलन ,पश्चिमी सीमा पर आए दिन आम नागरिक एवँ सुरक्षा बल के जवानों का मारा जाना,  उन्हें और उलझन में डाल रही हैं।क्या प्याज की बात हो ,क्या दाल के दर्द पर रोया जाय ;जब सरकार सीमा पर पाकिस्तान को जवाब देने ,जम्मू -कश्मीर में आतंकियों को नष्ट करने और देश के विभिन्न भागों में आरक्षण के लिए चल रहे आंदोलनों को निबटने में ही अहर्निश उलझी हुई है।काश !ये समस्याएँ न होती,हम मन ,वाणी और कर्म से ईमानदार होते और देश तथा सरकार की ऊर्जा जन कल्याण कार्यों व विकास में लगी होतीं तो उलझन का नाम- ओ- निशान ही कहाँ होता। यदि लोकतंत्र में समान अवसर का सपना सचमुच में साकार हो पाता तो भारत द्वारा  मंगल पर मंगल यान भेजना या शक्तिशाली क्रायोजनिक इंजनों से उपग्रहों  का लगातार सफल प्रक्षेपण करना विश्व को कुछ अलग सन्देश दिया होता।फिर भी जनता आशान्वित है कि शरद ऋतु पावस से बेहतर होगी।जिन भारतीयों ने बीते मौसम में अपनीं  दाल विहीन थाली से एकाएक प्याज को महँगाई के साथ उड़न छू होते पाया है,उनके दिन जल्द बहुरें गे। सस्ती प्याज थाली में लौट कर फिर उनके आँसू निकाले गी और आँसू पोछे गी।____मंगलवीणा 
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वाराणसी ;दिनाँक :08 सितम्बर 2015                         mangal-veena.blogspot.com
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