मंगलवार, 30 जून 2015

मैगी को वापस लाओ

************मैगी को वापस लाओ। मॉड्यूलर किचेन सूने पड़े हैं। आधुनिक माताएँ अपने बच्चों पर मैगी रूपी ममता नहीं उड़ेल पा रही हैं। नेस्ले वालों ने भारत से मैगी को बाहर कर लिया किन्तु आधुनिकाओं के साथ -साथ अकेले घर से दूर रहकर पढने -पढाने  और  नौकरी करने वाले  नवयुवकों एवँ युवतियों के भी बुरे हाल हो रहे हैं। बाजार में उपलब्ध  स्थानापन्न द्रुत भोज्य जैसे नोर ,टॉप रमेन,  मैक्रोनी,आईटीसी की यिप्पी या अन्य ब्राण्ड नूडल्स में वह दम -ख़म व लोकप्रियता कहाँ जो मैगी को भुलवा सकें।वैसे ये भी एक के बाद एक बाजार से निष्कासित हो रहे हैं।मैगी से प्राप्त बाकी सुविधाओं या फ्लेवर को छोड़ भी दें तो बतरस का आनन्द कहाँ से आये।मैगी नहीं; तो  चर्चा में प्रीती जिंटा ,माधुरी दीक्षित और अमिताभ बच्चन को कैसे लायें।मामला एक रस का नहीं  कई रसों का है अन्यथा शीघ्रता एवँ पौष्टिकता में तो पारम्परिक खिचड़ी भी किसी से कम नहीं। कुल मिला कर इस नूडल्स के बाजार से बाहर होने पर आधुनिक स्मार्टनेस को एक करारा झटका लगा है।
************सारे फसाद की जड़ में कोई चाणक्य प्रण वाला बाराबंकी का खाद्य निरीक्षक लगता है जिसने मैगी की जड़ में मंठा डाल दिया वरन कौन साधारण मनुज जनता था कि दूषित आबोहवा , मिलावटी दूध ,जहर घुले फल -सब्जी ,कंकड़ -पत्थर मिले खाद्यान्न या नकली दवाओं से भारतीयों को बचाने के लिए कुछ तंत्र ,नियमित विभाग या मंत्रालय भी हैं जो यदा -कदा समाचारों में आ जाते हैं।ऐसा ही एक विभाग है -भारतीय खाद्य संरक्षा एवँ मानक प्राधिकरण जो इस प्रकरण में नाम धन्य हो गया। यह भी पता चला कि इनकी अपनी प्रयोगशालाएँ हैं और राज्यों में इनके खाद्य आयुक्त एवँ अन्य खाद्य अधिकारी भी तैनात हैं जो हमें शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों की गारण्टी देते हैं।परन्तु जनता की सेहत की क्या बात की जाय ,इस विभाग के पूर्व अधिकारी कह रहे हैं कि  विभाग की स्वयँ की ही सेहत बहुत ख़राब है। अपनी चिन्ता छोड़ अब सबलोग यह जानने को उत्सुक हैं कि विभाग के अधिकारिओं का माली स्वास्थ्य कैसा है। बिना किसी प्रयोजन के हानिकारक मिलावट एवँ ऐसे सरकारी विभाग, दूध और पानी की भाँति, वर्षों से मित्रवत सामंजस्य में नहीँ बने रहते।लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं कि मैगी में मानक स्तर से ज्यादा पाये गए लेड व एमएसजी क्या हमारे हाजमे के लिए अन्य नित्य झेले जा रहे मिलावटों से ज्यादा घातक हैं।पहरेदारों से कौन पूछे कि ये हानिकारक नूडल्स भारतीय बाजार में कैसे घुसे।
************लोगों को यह बात और हैरान -परेशान कर रही है कि जिन खाद्य पदार्थों की शान में हमारे फ़िल्मी सितारे रात दिन विज्ञापनों द्वारा टीवी पर कसीदे काढ़ते हैं क्या वे भी स्वास्थ्य नाशक हो सकते हैं। ये वे लोग हैं जो हमारी आधुनिकता के मानक हैं और नई पीढ़ी की युवक एवँ युवतियों की चर्या में हर पल अनुकरणीय हैं।ये ब्रांड अम्बेसडर हैं जो  नैतिकता की परिभाषा भी स्वयँ गढ़ते हैं अन्यथा ब्राण्डिंग द्वारा करोड़ों कमाने से पहले वे अपने स्तर से यह सुनिश्चित अवश्य करते कि, जिसने उन्हें सितारा बनाया ,अपार संपत्ति स्वामी बनाया और अगाध स्नेह दिया ,उस जनता को विज्ञापन द्वारा परोसी जा रही वस्तु वास्तव में हानिकारक नहीं है।रही बात गलती मानने और क्षमा माँगने की तो ये चीजें बड़े लोगों के धर्माचरण में आती ही कहाँ हैं।काना -फूसी होती रहे ,करोड़ों की कमाई कर शांत बैठने में क्या बुराई है। अभी लू से देश में हजारों लोग मरे हैं  तो ताप की क्या जवाबदेही ?यही तो ताप का प्रताप है।
************हमारे जनतंत्र की धारिता है कि जवाबदेही तो बनती है। फिर इस प्रकरण में ज्वार आने पर खाद्य एवँ उपभोक्ता , रसायन एवँ उर्वरक तथा आयुष विभाग के मंत्री भी सामने आये हैं और उपभोक्ता हित एवँ अधिनियमों की बात कर रहे हैं परन्तु ब्राण्ड अम्बेसडरों की जबाबदेही विषय पर ये लोग भाटे की प्रतीक्षा करते दीख रहे हैं।नेताओं ,अभिनेताओं और बाबुओं को तो दृढ विश्वास है कि हर समस्या या विवाद की एक जिंदगी होती है और वह इस समय सीमा बाद स्वतः समाप्त हो जाती है।परन्तु विश्वास के विपरीत मैगी विवाद की जिन्दगी तो बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य संगठन द्वारा गठित एक समिति ने रिपोर्ट दिया है कि मोनो सोडियम ग्लूटामेट मात्र एक चोखा फ्लेवर है और यह स्वास्थ्य केलिए बिलकुल हानिकारक नहीं है। अब किसकी मानें किसकी न मानें। कहीं नई पीढ़ी के प्रिय मैगी को उनसे छीनने एवँ उनपर खिचड़ी थोपने का कोई दुष्चक्र तो नहीं। दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए सीबीआई जाँच तो बनती है।------- सीबीआई से इस लिए कि अन्य किसी जाँच संस्था पर कोई भरोसा ही नहीं करता।
************दूसरी ओर हर संकट या समस्या अपने साथ नए अवसर भी लाती हैं ,यह खिचड़ी के लिए सर्वथा उपयुक्त समय है कि आधुनिक पीढ़ी में यह अपनी पैठ बढ़ाए और दुनियाँ का सबसे चोखा फटाफट भोज्य बने। इसके लिए यदि इसे मुँह बिदका देने वाला खिचड़ी नाम बदलना पड़े तो बदले ,जिन लोगों के नाम माँ -बाप ने खिचड़ू या खिचड़ी रख दिए है और वे, शर्मिंदगी के कारण, हमेशा अपना नाम अंग्रेजी के शार्ट रूप में लेते हैं,उनको नए जमाने के धाँसू नाम दिए जाँय।साथ ही दुनियाँ में फैले भारतीय दूतावासों में इस भोज्य को अनिवार्य कर दिया जाय।यह भी सुखद संयोग है कि भोजन में खिचड़ी हमारे प्रधान मंत्री जी की पहली पसंद है और  विश्व पटल पर भारत के लिए यह अनुकूल समय है।अतः योग दिवस की भाँति चौदह जनवरी को, संयुक्त राष्ट्र संघ से, अंतर्राष्ट्रीय खिचड़ी दिवस घोषित कराने का प्रयास हो। यदि सफलता मिली तो सरकार की यह दूसरी बड़ी उपलब्धि होगी और चौदह जनवरी को हमारा उत्साह बुलंदिओं पर।
******************************आश्चर्य !देखते ही देखते रोटी ,कपड़ा,मकान और स्वास्थ्य ,शिक्षा      ,सड़क, बिजली,भ्रष्टाचार वाली समस्याएँ नेपथ्य में जा रही हैं और सरकार जनता से झाड़ू लगवाती ,बैंक खाते खुलवाती ,योग कराती, बेटी के साथ सेल्फ़ी खिंचवाती,देशी मिलावटों पर कान बहरा करती और मैगीको भगाती रंगमंच पर पर अवतरित हो रही है ।इसे कहते हैं पैराडाइम शिफ्ट (Paradigm Shift) । जो हो रहा है होने दो ;फटाफट भूख मिटाने को मैगी वापस लाओ।नेस्ले वालोँ को तो भारतीय बाज़ारमें घुसने का पूर्व अनुभव है ही। पावस आ चुकी है ,स्कूल खुल गए हैं और सबको जल्दी पड़ी है। ज्यादा क्या लिखूँ।----------------------------------------------- मंगलवीणा
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वाराणसी :दिनाँक 30 जून 2015
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गुरुवार, 4 जून 2015

दस में कितने नम्बर

***************इन दिनों देश के विभिन्न शैक्षिक बोर्ड धड़ाधड़ दसवीं एवँ बारहवीं के परिणाम घोषित कर रहे हैं । बोर्ड चलाने वाले और परीक्षा देने वाले --दोनों ही नये -नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। आँकड़ों की मानी जाय तो शिक्षा में युगान्तकारी सुधार हो रहा है और हम सौ प्रति सौ प्राप्ति के सन्निकट हैं। इसी दिन के लिए हमने अध्ययन -अध्यापन को बदला ,प्रश्नपत्रों को लम्बा कर उत्तर पुस्तिकाओं का आकर घटाया और हम उस आयाम को समाप्त कर रहे हैं कि किसी विषय पर कितना भी लिख़ दिया जाय ;उससे अधिक एवँ  बेहतर लेखन की संभावना सदैव बनी रहती है अतः पूर्णांक मिलना दुष्कर है। इन्हीं प्रयासों से शिक्षा के नए दिन आये हैं और शिक्षा की नई कालिदास-प्रणाली लागू हुई है। फलस्वरूप सफल छात्रों एवँ कीर्तिमान स्थापित करनेवालों की सर्वत्र प्रसंशा हो रही है। साथ ही परीक्षा उत्तीर्ण हुए लाखों  छात्र एवँ उनके अभिभावक जहाँ उत्साहित एवँ भविष्य के प्रति आशान्वित हैं वहीँ अनुत्तीर्ण छात्र और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग शिक्षकों ,परीक्षकों व शिक्षा की वर्तमान दशा को कोस रहे हैं।असफल परीक्षार्थियों को यहीं नहीं रुकना चाहिये बल्कि बीती परीक्षा से निराश न होते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए और अगले अवसर को बड़ी सफलता में बदलने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
***************ऐसे समय इसे सुयोग ही कहा जायगा कि बीते छब्बीस मई को केंद्र में सत्तासीन मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर लिया और नई प्रथा के अनुरूप उसने भी टीवी ,मिडिया ,समाचारपत्र व जन संपर्क माध्यमों से अपनी एक वर्ष की उपलब्धि  का लेखा -जोखा जनता के समक्ष रखना प्रारंभ कर दिया।फिर क्या ;वाच्य हो ,दृश्य हो या श्रव्य -अहर्निश यही चर्चा कि मोदी सरकार को दस में कितने नम्बर ?सत्ताच्युत विरोधी नेता तो जैसे मूर्छा से जाग उठे हैं। उनके हाई कमान और कार्यकर्ता सरकार को दस में शून्य देने पर उतर आये हैं।उन्हें एक साथ कई लाभ जैसे टीवी चैनलों पर पुनः अवतरण ,भविष्य में सत्तासुख की आस ,हाई कमान की कृपा इत्यादि दिखने लगे हैं। यह तो भला हो आज  के ट्रेंड -सेटर (प्रथा -स्थापक )टीवी चैनलों का जो ऋणात्मक नंबरिंग नहीं करा रहे हैं वरन सरकार के प्राप्तांक को अपनी पूर्ववर्ती सरकार से पीछे धकेल देते। वैसे सभी भारतीय जानें या न जानें ,टीवी चैनल वाले मौलिक रूप से जानते हैं कि सरकार सबकी है। अतः वे सरकार के काम-काज का मूल्यांकन किसी से भी करा सकते हैं। वे चैनल का हित साधते हुए किसी को परीक्षक बनने का सुअवसर दे रहे हैं और उनसे पूछ रहे हैं कि आप मोदी सरकार को कितने नम्बर देंगे। इक्के -दुक्के धर्मगुरुओं ,अध्यापकों ,विश्लेषकों ,नौकरशाहों ,व्यवसायिओं , वकीलों ,डाक्टरों ,किसानों ,टॅक्सीचालकों, मजदूरों इत्यादि की तो बन आई है। टीवी के पैनलिस्टों की तो बात ही और है। मिडिया सौजन्य से इन सबके  अच्छे दिन चल रहे हैं।आम के आम ,गुठलियों के दाम - वे परीक्षक बनने के कल्पनातीत अवसर के साथ टीवी पर सुशोभित हो समाज में विशिष्ठ होने का रौब भी पा रहे हैं। जहाँ तक नम्बर की बात है वह तो चैनल वाले जो चाहते हैं दिला ही देते हैं। चूँकि चैनल दर्शकों से दर्शकों के लिए चलाये जा रहे हैं ,अतः पक्ष -प्रतिपक्ष की खिंचाई कराते समय वे दर्शकों का पूरा ख्याल भी रख रहे हैँ।इस नम्बर के खेल में मिडिया ने, सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से राज्य सरकारों तक तथा विभिन्न राष्ट्रीय से स्थानीय प्रतिपक्षी दलों तक, सबको ऊपर -नीचे वाले ढेकुल झूले पर चढ़ा दिया है जिससे ये कभी आसमान में हुलस रहे हैं तो कभी धरती पर धूल फाँकते दिख रहे हैं।निःसंदेह चौथा स्तंभ अपने उत्कर्ष पर है।
***************सावन से भादों दूबर ?मोदी सरकार मिडिया पर छायेंऔर केजरीवाल राष्ट्रीय रंगमंच से ओझल हों ;यह आज के भारत में हो ही नहीं सकता।अतः वे भी अपनी सौ दिन में हल की गई उत्तरपुस्तिका ले कर मिडिया पर चढ़ गए और शंख नाद करने लगे कि उनके लिए दस में दस क्या ,हजार -लाख भी कम। लोग उन्हें ऐसे उछालते हैं मानो मोदी सरकार के बाद देश में कोई सत्ता है तो वह केजरीवाल ही हैं। केजरीवाल को लेकर मिडिया की आतुरता  एवँ उनके समाचार चयन के मापदण्ड पर आम जनता सशंकित हो रही है। यह तो नकारा नहीं जा सकता कि दिल्ली जैसे  कई महानगर इस देश में हैं जिनको वहाँ की महानगर पलिकाएँ एवँ स्थानीय प्रशासन चला रहे हैं; वह भी बिना केंद्र शासित राज्य दिल्ली जैसी प्राप्त सुविधाओं के।ऐसे में दिल्ली का प्रदेश होना समझ में आए या न आए  परन्तु केजरीवाल का मुख्य मंत्री होना और लेफ्टिनेंट गवर्नर साहब पर कीचड़ की फेंका -फेंकी खूब समझ में आ रही है।टीवी चैनल वालों के सामने टीआरपी की समस्या हैऔर ज्वलंत मुद्दों के पिछले पादान पर खिसकाने केँ उनके अपने तर्क भी हैं।  
***************परन्तु अपनी -अपनी ढफली अपना -अपना राग के बीच भी यह जो जनता है -सब जानती है। उसे पूरी बहस में ईमानदारी व निष्पक्षता बहुत ही रंच दिखाई दे रही है। जनता ने मोदी जी द्वारा सरकार बनाने के क्रम में उन्हें एक अनुमोदित प्रश्नपत्र या अपेक्षा  सूची सौंपी थी ,वह मूल्यांकन के समय लुप्त है। सत्ता ,विपक्ष और कुछ विश्लेषक  स्वयं को भाने वाले अपने -अपने गढंत प्रश्नपत्र व कल्पना सृजित उत्तरपुस्तिका या उपलब्धि लेकर धमा -चौकड़ी मचाए हुए हैं जैसे शूट -बूट वनाम शूट्केस की सरकार।    भाषा से ठेंठ न बना जाय ;समय आने पर जनता सत्ता ही नहीं विपक्ष का  भी यथेष्ट मूल्यांकन कर देगी। रही बात आज की तो दस में कितने नंबर वालों को सौ में कितने नंबर वालों से सीख लेनी चाहिए कि वहाँ लाखों परीक्षार्थी एक प्रश्न पत्र का उत्तर देते हैं।
***************सारांशतः दस में कितने नम्बर वाले परिवेश में सौ में कितने नम्बर वालों की प्रासंगिक वरीयता धूमिल होना भारत की सुनहरी यात्रा में एक गतिरोध सा होगा।ये लाखों की नई पीढ़ी कल देश को आगे बढ़ाने एवँ इसे सँवारने की जिम्मेदारी सँभालने वाली है। अतः उन्हें हर विशेषज्ञ परामर्श व मार्गदर्शन , व्यापक स्तर पर, मिलनी चाहिए।वर्तमान को भविष्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इस प्रसंग में प्रधान मंत्री ने अपनी पिछली मन की बात में  परीक्षार्थिओं को बधाई एवँ उत्साह वर्धन कर एक सराहनीय कार्य किया। इन बातों को टीवी ,मिडिया व अन्य सञ्चार माध्यमों को और आगे बढ़ाना होगा। यदि घुमक्कड़ी माने तो शिक्षा वही है जिससे व्यक्ति अपने जीवन के हर पहलू में शिक्षित लगे और सरकार की उपलब्धि वही जो बिना बताए ही जनता को दिखे।बिना तन्मय संघर्ष के परीक्षार्थी हों या  सरकारें मात्र नम्बर के सहारे अपने लक्ष्य को नहीं बेध पायें गे। --------------------------------------मंगलवीना
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अंततः
                                              विश्व - पर्यावरण -दिवस 
************आज पर्यावण दिवस पर हम पृथ्वीवासिओं को, पिछले तीन महीनों के, प्रकृति प्रदत्त संदेशों का
  स्मरण करना चाहिए। रबी कटाई के समय  तूफानी वरसात ,हिमालय की गोंद में एक से एक भूकम्प के झटके,पानी के लिए मचा हाहाकार एवँ आंध्र से पूरे उत्तर भारत में गर्मी का चल रहा  प्रलयंकरी ताण्डव जैसे प्राकृतिक उपहार पर्यावरण से छेड़ -छाड़ के रिटर्न -गिफ्ट हैं। यदि ऐसे रिटर्न -गिफ्ट नहीं चाहिए तो मानव जाति पचास वर्ष पहले का पर्यावरण धरती को लौटा दे वरन हम याचना करें गे -"हे प्रभु !अच्छे दिन तो बाद में देना ,ठण्डे दिन पहले दे दो। भूख तो मिटती रहेगी,प्यास तो पहले मिटा दो। "  -------------------मंगलवीना  
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पर्यावरण दिवस :दिनाँक 5 जून 2015 --वाराणसी।
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शुक्रवार, 15 मई 2015

A homage to late Dr Kesar Singh

Today is the 3rd Punya-tithi of Late Dr. Kesar Singh, who was my younger brother and served as a Professor at Rutgers University, New Jersey. All my family members remember him too much and pay homage to his simplicity and selflessness. His ideas and thoughts will motivate us for years to come.
Here is a still taken in his university chamber during my US visit in 2011

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

विषयान्तर ? पसन्द नहीं

************संप्रग की सत्तावधि में भ्रष्टाचारियों ने खुलकर देश को लूटा और काँग्रेस की लुटिया डुबाई। अब राजग में वे सत्य एवँ निष्ठा का दुपट्टा ओढ़ कर लूट रहे हैं। बगुला भगत की कहानी चरितार्थ हो रही है। देश में आशा की किरण रूप एक नई "मोदी संस्कृति "का अभ्युदय हुआ है जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का उद्घोष है। इसका प्रभाव बड़े भ्रष्टाचारियों पर तो स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। परन्तु देशव्यापी मझोले एवँ निचले स्तर के भ्रष्टाचारियों की दुनियाँ में एक नया जोखिम गुणक या रिस्क फैक्टर भी उभरा है जिसे वे मोदी रिस्क फैक्टर का नाम देते हैं और इस जोखिम के चलते पहले से अधिक उगाही कर रहे हैं। आम लोग यह नया परिदृश्य भी भुगत रहे हैं और सरकार की ओर से यह कथन सुन कर हैरान हैं कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया है। प्रत्यक्ष तो यह है कि न लूट की संपत्ति देश को मिली ,न लुटेरों को धरा -पकड़ा गया ,न अभियोजन चलाया गया ,न जेल भेजा गया और न ही जनता की लूट बन्द हुई।सुहाने सपने कहीं गुम हो रहे हैं। लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने आम भारतीय को सुशासन एवँ सुराज का स्वप्न दिखाते हुए अपने लिए सत्तासुख का सपना देखा। जनता ने भाजपा के सपने को एवमस्तु कर दिया परन्तु अपने सपने की कोई डोर या  छोर उसे कहीं से पकड़ में आती नहीं दीख रही है। आम लोग एक किनारे ठिठक गए हैं और विस्मृत हैं कि उन्हें अपेक्षा से इतर क्या कुछ परोसा जा रहा है।
************अब उद्धव !बाँह गहे की लाज।परिस्थिति से खिन्न लोग भाजपा का साथ छोड़ने की बात तो नहीं सोच रहे हैं परन्तु पकड़ को शिथिल अवश्य करने का मन बना रहे हैं।दिल्ली में तत्काल विधान सभा के लिए संपन्न हुआ चुनाव एवँ इसका परिणाम इस शिथिलता का स्पष्ट प्रमाण दे रहा है। भाजपा की दिल्ली में हुई पराजय न तो श्रीमती किरण बेदी को बाहर से लाकर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से हुई न हर्षवर्धन जी या किसी अन्य स्थानीय नेता की उपेक्षा से हुई बल्कि लोकसभा चुनाव के समय किए गए वादों को प्रतिबद्धता से न लेने के कारण हुई। चुनाव में भाजपा नेताओं ने यह नहीं बताया कि काले धन को वापस लाने , भ्रष्टाचार मिटाने रोजगार के अवसर बढ़ाने और महँगाई  पर नियंत्रण केलिए सरकार ने प्रतिदिन क्या प्रयास किया , कठिनाइयाँ क्या हैँ और विलंब क्यों।विशिष्ठ संस्कृति  की ओर बढ़ती भाजपा विलंब  एवँ ढिलाई केलिए क्षमा माँगना भूल कर दम्भी बनती जा रही है। शंका तो यहाँ तक होने लगी है कि जिसे जनता भ्रष्टाचार मानती है ,वह भाजपा सरकार  की समझ वाले भ्रष्टाचार से अलग कुछ और तो नहीं है। यह शंका निर्मूल भी नहीं है क्योंकि  सभी सहमत हैं कि केंद्र सरकार तन्मयता से काम कर रही है फिर भी जिन बुराइयों से जनता छुटकारा चाहती है,वे अपनी पकड़ और बढाती जा रही हैं। तत्काल विमर्श की आवश्यकता है कि चुनाव के समय भाजपा ने जो वादे किए थे जनता के सन्दर्भ में उनके अर्थ क्या हैं। अन्यथा बहुत देर हो जाय गी।
************वर्तमान दशाब्दी में भारतीय जनाकांछाओं का सटीक प्रतिनिधित्व केवल अन्ना हजारे कर रहे हैं और वे जिस भ्रष्टचार की बात करते हैं वही आम जन को बेहाल करने वाला महा दानव है जिसका संहार किये बिना सुराज एवं सुशासन का अवतरण हो ही नहीं सकता।अन्ना ने जिस लोकपाल एवँ लोकायुक्त की बात की वे ही इस भ्रष्टाचार को मारने वाले सक्षम शस्त्र हैं परन्तु आज की सरकारों के लिए ये सन्दर्भ परिधि से बाहर हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग शासन बदलने के बाद भी देश में भ्रष्टाचार की वर्तमान स्थिति पर अपना नियमित रिपोर्ट तक नहीं दे रहा है।  केंद्र और राज्य की सरकारें यह न भूलें की जनता हर दिन हर पल भ्रष्टाचार और काले धन पर प्रहार होते देखना चाहती है।चाहें भी क्यों न ? इनके चलते जनता को अपनी दुश्वारियाँ दिखाई देती हैं न कि दिल्ली की अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी। अपनी दिनचर्या में जब वह घर से बाहर सड़क पर होता है तो गड्ढों में डूबती सड़कें उसे अभियन्ताओं व ठेकेदारों के भ्रष्टाचरण की याद दिलाते हैं और चौराहों पर दिखते पुलिस वाले लूट -खसोट की याद दिलाते हैं। जब अपने कार्य वश किसी कार्यालय में होता है तो बाबुओं की प्रभुता व रिश्वतखोरी सताती है और जब कभी किसी शिक्षा ,चिकित्सा या न्याय के आलय में होता है तो वहाँ की निर्दय लूट सताती है। और तो और किराना एवँ फल सब्जी की दुकानों से मिलावट तथा कालाबाजारी का शिकार होते हुए साँझ तक घर पहुँच कर वह निढाल पड़ जाता है। सुराज और सुशासन हर भारतीय को सुख पहुँचाने वाले कारक हैं। यदि ये सुख जनता को मिल जांय तो संप्रग सरकार के सारे कार्यक्रम जैसे स्वच्छता अभियान ,बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ ,स्वच्छ गंगा ,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती छवि इत्यादि उनके सुख को और बढ़ा सकेंगे। सुख हो तो उसको बढ़ाने वाली बातें अच्छी लगेंगी।जनता विषयान्तर नहीं चाहती है। पहले वादा भर दे दिया जाय फिर उससे ज्यादा की बात हो। राष्ट्रवादी सरकार के सामने योजना बनाने का नहीं क्रियान्वयन का समय आ गया है।
************देखन में छोटे लगें ,घाव करें गम्भीर। मध्य प्रदेश देश का एक प्यारा सा प्रान्त है। वहाँ से प्रायः समाचार आता है कि अमुक विभाग के अमुक स्थान एवँ पद पर कार्यरत अमुक के यहाँ भ्रष्टाचार निरोधक इकाई /लोकायुक्त का छापा पड़ा  है और करोड़ों की आय से अधिक सम्पत्ति पकड़ी गई है। वहाँ आईएएस से लेकर चपरासी जी तक भ्रष्टाचार में पकड़े जा चुके हैं। वहाँ के शासन की इस प्रतिबद्धता की हर आम आदमी प्रसंशा करता है। मध्य प्रदेश के सीधे ,सरल मुख्य मन्त्री ,वहाँ की लोकायुक्त व्यवस्था,शासन की सतर्क कार्यशैली तथा भ्रष्टाचारियों से निपटने में दृढ़ता अन्य राज्यों व केंद्र के लिए अनुकरणीय होनी चाहिए।कुछ अन्य प्रान्तों जैसे कर्नाटक ,उत्तराखण्ड इत्यादि में भी अच्छे लोकायुक्त प्रावधान हैं पर शायद जुनून नहीं।  यदि नेकनीयती से देश की सभी सरकारें वैसे ही कानून ,वैसे ही लोकायुक्त और लोकपाल की टोली के साथ भ्रष्टाचार पर चोट करने लगें तो भ्रष्टाचार को गम्भीर रूप में घायल होने और भारत की धरती से विदा होने में देर नहीं लगेगी।तभी काले धन एवँ भ्रष्टाचार मुक्त भारत  में विकास एवँ निवेश की गति तेज होगी ,महँगाई से छुटकारा मिलेगा और युवकों को बेहतर रोजगार के अवसर सुलभ होंगे।
************सपाट सा सन्देश है कि अन्नावाद ही आज की समस्या का सर्वमान्य समाधान है। जो सरकारें इस धारा को नकारने या भोथरी करने का प्रयास करेंगी वे सत्ता से बाहर जाएँगी।निसंदेह आज की राजनीति में हमारे प्रधान मंत्री सुयोग्यतम, कर्मठतम एवँ सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं जिन्हे जनता अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरते देखना चाहती है। अतः अन्ना की चाहत ,सुराज व सुशासन की परिकल्पना और चुनाव के समय किये गए वादों की पूर्ति के लिए भाजपा सरकार को मोदी जी के नेतृत्व में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देनी चाहिए। पारदर्शी क्रियान्वयन ,सविनय व्यवहार एवँ विशिष्ठ  संस्कृति से वैराग्य ही वे कारक हैं जो  इस दल को देश के कोने -कोने में स्थापित कर सकते हैं।भाजपा के भविष्य एवँ विस्तार का निर्णय उसके कृतित्व से होगा जबकि सौ टके कि बात यह है कि जनता को विषयान्तर बिल्कुल पसन्द नहीं है।भारत के अन्य राजनीतिक दलों केलिए भी कुछ ऐसी ही करो या मरो की स्थिति है।
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अंततः
रामचरितमानस में कागभुशुण्डि ने गरूङ की जिज्ञासा शांत करते हुए कलियुग अर्थात वर्तमान समय का बड़ा ही मार्मिक श्रव्यचित्र प्रस्तुत किया है। सन्दर्भ को आगे बढाती कुछ पंक्तियाँ यूँ हैं -
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहीं मान निगम अनुसासन।
सोइ  सयान जो  परधन  हारी ।  जो  कर  दम्भ  सो  बड़    आचारी।
जो  कह  झूठ मसखरी   जाना।   कलियुग  सोइ  गुनवंत  बखाना।
अर्थात कलियुग में ब्राह्मण वेदों को बेचने वाले होंगे। राजा प्रजा को खाने वाले होंगे। निगम या स्थापित संस्थाओं के अनुशासन को कोई नहीं मानेगा। जो दूसरे की संपत्ति हड़प लेगा, वही बुद्धिमान समझा जायगा।जो दम्भ करेगा, वही सदाचारी की मान्यता पायेगा। जो मिथ्यावादी या हँसी -दिल्लगी करने वाला होगा, कलियुग में वही गुणवंत माना जायगा।तो क्या राष्ट्रवादी शासन काल में कलियुग का अन्त होगा और सुराज तथा सुशासन वाला रामराज्य देश में स्थापित होगा? यही यक्ष प्रश्न है।--मंगलवीणा
दिनाँक 21 .02 . 2015   ------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मंगल से कोच्चि की सड़कों तक

************भारत के इतिहास में सन दो हजार चौदह कुछ विशेष उपलब्धियों के लिए सदैव अविस्मरणीय रहे गा। इस वर्ष अंतरिक्ष क्षेत्र में छलाँग लगाते हुए मंगल ग्रह पर पहुँच भारत ने विश्व में अपना डंका बजाया। वंशवाद ,जातिवाद एवँ क्षेत्रवाद की तिकड़ी तोड़ते हुए एक बहुमत वाली सरकार के नेतृत्व में हमारा लोकतंत्र विकास की ओर अग्रसर हुआ। धर्मनिरपेक्षता की छद्म व्याख्या ध्वस्त हुई। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के लिए देश की जनता ने यह देश हुआ बेगाना की धुन सुनाई।  अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उभरते भारत के सशक्त प्रतिनिधित्व के लिए प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को देश ही नहीं पूरे विश्व में अपार लोकप्रियता मिली।श्री मोदी के पहल पर ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व में प्रति वर्ष योग -दिवस मनाने का निर्णय लिया।देश की झोली में शान्ति के लिए एक नोबेल पुरस्कार आया तो देश के योग्यतम पूर्व प्रधानमन्त्रियों में अग्रणी श्री बाजपेई एवँ स्वनामधन्य स्व महामना मालवीय को भारतरत्न से अलंकृत किया गया।इतना ही नहीं भारतीय संस्कृति की झोली में कोच्चि की सडकों से किस ऑफ़ लव का खुला प्रदर्शन भी आया।अधिकतर उपलब्धियों से भारत खुश हुआ.. .  परन्तु यह किस ऑफ़ लव ने विवाद ही नहीं खड़ा किया बल्कि समाज को असहज करते हुए भारतीय संस्कृति के एक कगार को ढहा दिया।
************जब कोच्चि में युवाओं ने विरोध या प्रदर्शन का यह अभिनव प्रयोग किया तो समझ में नहीं आया कि हमारी संस्कृति विकासोन्मुखी फ़ैलाव ले रही है अथवा बाहरी संस्कृतियों के संगम से उथली होती जा रही है। घटना हुई तो पुलिस उनपर कार्यवाही करती दिखी। वहाँ के उच्च न्यायलय को उसमें हस्तक्षेप करने जैसा कुछ नहीं दिखाई दिया। मीडिया ने पुलिस के मॉरल पुलिसिंग के अधिकार पर वहस करा दिया। भारतीय संस्कृति के परम्परावादियों ने इसे संस्कृति को नष्ट करने  वाला कुत्सित प्रयास माना जबकि आयोजन करने वाले एवँ उन जैसे युवा स्वतन्त्र सोच वाले लोगों ने इसे अपना अधिकार बताया।बताएं भी क्यों न। हमारी संस्कृति को इस पड़ाव तक लाने में सिनेमा ,टीवी एवँ आधुनिक सञ्चार जगत के साथ -साथ इन लोगों ने पचासों वर्षों से भगीरथ प्रयास किया है।इनके योगदान द्वारा ही हमलोग पूर्ण भारतीय परिधान से न्यूनतम परिधान ,एकान्तिक प्यार व्यवस्था से कहीं भी प्यार व्यवहार,दूत सन्देशन से फेस बुक ,एसएमएस इत्यादि सन्देशन ,वात्सल्य चुम्बन से उन्मुक्त श्रृंगारिक चुम्बन ही नहीं अपितु स्वच्छ और शालीन मनोरंजन विधाओं से आगे बढ़ अभद्र एवँ हिंसा फ़ैलाने वाले चलचित्रों व धारावाहिकों  तक पहुँचे हैं।यह उन्हीं की कर्षण शक्ति है जो युवतियों को पबों तक ले जाती है या किसी मेरठ के पार्क में अपने प्रेमी के साथ युगल जोडी बन बैठाती है। फिर सांस्कृतिक विकर्षण से प्रेरित हो श्री राम सेना वाले पब पर टूट पड़ते हैं या पुलिस वाले ऑपरेशन मजनू चला प्रेमी युगलों को पीट देते हैं। संभावना है कि भविष्य में पूर्ण नग्न प्रदर्शन सशक्त विरोध का माध्यम बने और अवरोधक शक्तियाँ व्यवस्था ,तर्क ,निर्णय और समर्थन के समक्ष घुटनें टेक दें। परन्तु इसे कोई नकार नहीं सकता की पार्श्व प्रभाव भारतीय समाज केलिए बहुत ही पीड़ादायी होगा।
************आगे बढ़ती सभ्यता के साथ सांस्कृतिक बदलाव एवँ परिष्करण अवश्यमेव होते रहते हैं। आबाल बृद्ध पूरे  समाज के लिए सहजता के कारण ये बदलाव आत्मसात भी हुए हैं जिससे हमारी अद्भुत संस्कृति अविरल विस्तार पा रही है।चूँकि भूमण्डलीकरण के इस दौर में विश्व की सभी संस्कृतियाँ एक दूसरी से प्रभावित हो रहीं हैं,हर भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह अपनी संस्कृति की मूल आत्मा एवँ विशिष्ठता को अछुण्ण रखते हुए इसे और सुन्दर व सरस बनायें। किसी भी नए प्रयोग या कृत्य से यदि समाज असहज हो तो निश्चय ही हम अपने प्रयोग पर पुनर्विचार करें कि अपनी संस्कृति को कहीं उथला तो नहीं कर रहे हैं। जौहर प्रथा ,बाल विवाह ,बहु विवाह ,स्पृश्यता ,पशु बलि इत्यादि  ऐसी  प्रथाएँ थीं जिन्हें हमारी संस्कृति ने असहजता के कारण अतीत में बाहर का रास्ता दिखाया और अपनी समृद्धि बढ़ाई।आज को देखें तो कल तक श्रद्धा और स्नेह से अभिसिंचित रही चरण स्पर्श की आदर्श प्रथा आज चाटुकारिता एवँ स्वार्थपूर्ति की एक विधा बन कर हमें असहज कर रही है। जब कोई पुलिस अधिकारी सैफई महोत्सव में मुलायम परिवार के किसी सदस्य के चरण के पास झुक बैठता है ,कोई पुलिस कर्मी किसी डीआईजी के चरण पकड़ उसके जूते का फीता बाँध रहा होता है या कोई प्रशासनिक अधिकारी किसी मन्त्री का चरण पकड़ते दिखता है तो हम भारतीय असहज हो जाते हैं। अतःपरिष्करण के क्रम में अपनी ही संस्कृति से उपजी इस अपसंस्कृति को समाप्त करने का समय हो चुका है।
************हो सकता है कि नए प्रयोग करने वालों को शंका हो कि उनके कृत्य में गलत क्या है। हमारे धार्मिक ग्रन्थ गीता में जब करने योग्य कर्म और न करने योग्य कर्म के विषय में अर्जुन को संशय हुआ तो कृष्ण ने निर्णय के लिए शास्त्र को प्रमाण मनाने की बात कही।  यथा -
------[तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्यकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तम् कर्म कर्तुमिहार्हसि।]
अतः हर भारतीय संस्कृति धर्मी, प्रश्न चिन्हित कार्य में शास्त्रों को प्रमाण मानते हुए, विकास एवं नए प्रयोगों की ऊँचाइयाँ छुए जिससे सहज रहते हुए समाज अग्रगामी हो सके। समय रहते आत्ममंथन करने से ज्यादा सुसंस्कृत एवँ विकासोन्मुखी नई पीढ़ी सामने आएगी। कल का दायित्व आज पर है।दूसरों की सहजता को दृष्टिगत रखते हुए यदि प्रदर्शन करने वाले ,फिल्मबनाने वाले ,धारावाहिक गढ़ने वाले ,व्यवस्था सुनिश्चित करने वाले ,मीडिया के लोग ,साहित्यकार ,संगीतकार ,वैज्ञानिक ,कलाकार व अन्य सभी वर्गों के लोग नए -नए अनछुए विकासोन्मुखी कार्य समाजहित मे करेंगे तो दो हजार चौदह की भाँति हर नया वर्ष अभूतपूर्व उपलब्धियों से भारत को गौरवान्वित करता रहे गा। रग -रग में भारतीयता दौड़े गी तब हर भारतीय के आभामण्डल से विश्व चमत्कृत होगा ही ।  इति।
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अंततः
ब्लॉग के सभी सुधी पाठकों ,टिप्पणीकारों ,जागरण जंक्शन परिवार के साथियों और अपने शुभेक्षुओं को देहरी तक आ पहुँचे नव वर्ष के लिए मैं शुभ कामनाएँ प्रेषित करता हूँ। वर्ष दो हजार पन्द्रह के भाग्य विधाता से याचना करता हूँ कि वे आप सबको स्वास्थ्य ,समृद्धि ,सहजता एवँ सरसता से ओतप्रोत रखें और पंद्रह चौदह से बेहतर हो। सहकारिता के लिए अपने परिवार को भी कृत्यज्ञता ज्ञापित करता हूँ तथा नववर्ष में उनके साथ और जुड़ाव एवँ सहभागिता का संकल्प लेता हूँ।शुभमस्तु।    ... मंगला सिंह
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वाराणसी दिनाँक 27 . 12 . 2014                               mangal-veena.blogspot@gmail.com
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सोमवार, 15 दिसंबर 2014

ये माफ़ी-वाफी क्या है

************इन दिनों माफ़ी की माँग करने वालों ने देश एवं संसद को सर पर उठा रखा है। विशेषकर माननीयों के ऐसे अमाननीय आचरण पर नागरिक स्तब्ध हैं।प्रतिनिधियों की ऊर्जा रचनात्मक कार्यों से इतर संकीर्ण प्रयोजनों में बर्बाद हो रही है और शालीनता तार -तार ---। धन्य हैं हमारे जनप्रतिनिधि कि लोकसभा की अध्यक्ष महोदया को उनसे पूछना पड़ा कि क्या क्षमा माँगने केलिए नियमित रूप से संसद में एक समय निर्धारित कर दिया जाय। हंगामा करनेवालों को पता है कि वे गांधी की विचारधारा को सर्वाधिक हानि पहुँचा रहे हैं फिर भी अपने  कृत्य केलिए उन्हीं की दुहाई भी। महात्मा की विचारधारा तो यह सिखाती है कि विवादस्पद वक्तव्य देने वाले से पुनर्विचार का आग्रह तो किया जा सकता है परन्तु हठ या बल प्रयोग से उसकी विचारधारा को जीता नहीं  जा सकता।
************किसी व्यक्ति का स्टेटमेंट ,वक्तव्य ,बयान या उद्गार उसके विचार या चिंतन की  धारा का सारांश होता है। जब अनचाही गलती या भूल होती है तो व्यक्ति स्वतः संज्ञान लेता है और अपराधबोध से मुक्ति के लिए माफ़ी माँग लेता है परन्तु जब किसी के वक्तव्य का विपरीत विचारधारा वाले संज्ञान लेते हैं और क्षमा याचना का दबाव बनाते हैं तब वे भूल जाते हैं कि येन केन प्रकारेण क्षमा मँगवाना किसी की विचारधारा को दबाने का बलात प्रयास है। माफ़ी मँगवाने से अहम की संतुष्टि हो सकती है परन्तु माफ़ी माँगनेवाले के ह्रदय परिवर्तन की कोई गारण्टी नहीं।प्रयोग के तौर पर जिन लोगों ने क्षमा याचना किया है ,उनका झूठ पकड़ यंत्र से जाँच करा कर देखा जा सकता है कि उनका ह्रदय परिवर्तन हुआ क्या। गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल से उसकी विचारधारा पर पुनर्विचार का ही मात्र आग्रह किया था परन्तु परिणाम ऐसा कि लोगों के सामने वह दुर्दांत डाकू एक सद्पुरुष के रूप में सामने आया।गांधी जी के सत्य एवँ अहिंसा का यही आग्रह पूरी दूनियाँ में पूजा जाता है।देश की दशा एवँ दिशा में धनात्मक बढ़त एवँ सद्भावना के लिए विपरीत बयानोँ का आग्रहपूर्वक पुरजोर विरोध होना चाहिए। ऐसे विरोध का स्वागत भी होना चाहिए परन्तु विरोध केलिए विरोध अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात  है।
************गांधीवाद भारत की एक परमपूज्य विचारधारा है जिसने भारत को स्वतंत्रता ही नहीं दिलाई ;पूरी दुनियाँ को एक नई दार्शनिक सोच दी जिसके समक्ष आधुनिक सभ्यता भी नतमस्तक है। परन्तु भारत के शत प्रतिशत लोग गाँधीवादी ही हों-ऐसा न तो गांधी के समय था ,न आज है न कल होगा। हर भारतीय की गांधी में श्रद्धा निर्विवाद रूप से होनी चाहिए परन्तु विश्वास की अनिवार्यता कदापि नहीं। सन 1944 में जिन लोगों ने सेवा ग्राम पहुँच कर जिन्ना से गाँधी के प्रस्तावित बैठक का उनके सामने विरोध किया था ,वे लोग भी महात्मा में श्रद्धा रखते हुए अन्य सोच के साथ देश के लिए चिंता कर रहे थे।महात्मा गाँधी की हत्या की याद आते ही नाथूराम के लिए मन घृणा से भर जाता है  परन्तु उसपर चर्चा या विमर्श को नकारना क्यों ?किसी न किसी विचारधारा से वह भी प्रेरित एवँ उद्द्वेलित रहा होगा। 30 जनवरी 1948 से पहले के नाथूराम के व्यक्तित्व एवँ कृतित्व के मूल्यांकन की चर्चा प्रासंगिक तो हो ही सकती है।तात्पर्य यह कि नाथूराम के नाम पर उत्तेजित हो उठना किसी उत्कृष्ठता का परिचय नहीं  देता।हमारी संस्कृति तो इतनी शालीन है कि हम रावण व कंस को भी गुनते हैं।
***********मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की अयोध्या में उनकी  जन्मस्थली पर मंदिर निर्माण भी एक ऐसा विषय है जिसकी पक्षधर विचारधारा पर किसी का वक्तव्य आते ही पहाड़ टूट पड़ता है।यह जानते हुए भी कि सिक्ख ,इस्लाम , ईसाई ,बौद्ध इत्यादि सभी धर्मों से अति प्राचीन धर्म हिंदुत्व है और उसमें भी श्री राम प्रथम पूज्य अवतार हैं ;यदि कोई कह दे कि हम सभी राम के वंशज हैं तो समझिए कि उसने कोई गंभीर अपराध कर दिया।प्रभु के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर बनाने की बात कर दी तो उससे भी बड़ा अपराध।  न्यायालय से जल्दी निर्णय की अपेक्षा कर दे तो न्यायिक प्रक्रिया का बाधक बने और उससे आगे कोई आग्रह हो तो वैमनष्यता का वाहक।संभवतः वोट की राजनीति के कारण विरोध उगलने वाले झुठलाना चाहते हैं कि धर्म के सन्दर्भ में विभिन्न धर्मावलम्बी लोग श्री राम को मानें या न मानें परन्तु हर धर्म के अनुयाई और सारे देशवासी उनमें तथा उनमें स्थापित आदर्शों में अपार श्रद्धा तो रखते ही हैं। यह जानते हुए कि सद्भावना भारतीय जनमानस की आत्मा है; कुछ राजनीति एवँ धर्म के ठेकेदार भृगु ऋषि की भाँति उसकी छाती पर पांव मार रहे हैं और जनाकांछा वाली समस्या के समाधान की बात करने वालों को घसीट रहे हैं। जनता इन्हें पाठ पढ़ाई है और यदि समझ में नहीं आ रहा है तो और स्पष्ट पढ़ाएगी।
************भारतीय संविधान के प्रति शपथबद्ध हर नागरिक को अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता है। अभिब्यक्ति यदि शालीनता से विशेषणित हो तो सोने में सुगंध।समाज के हित में मन ,वाणी तथा शरीर से चिंतनशील लोगों को दुराग्रह रहित होकर शालीनता से अपना वक्तब्य देते रहना चाहिए।इससे समाज अग्रगामी होता है। विरोध भी तभी गरिमामयी होगा जब वह आग्रह का अनुगामी होगा।जनता तो सब समझती है। ये देश चलानेवाले और देश  चलाने केलिए छटपटानेवाले माननीय लोग क्यों नहीं समझ पा रहे हैं। अरे भाई !ये माफ़ी -वाफी क्या  है।
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************चिन्तन श्रोत :साध्वी निरंजन ज्योति सांसद फतेहपुर ,स्वामी साक्षी महराज सांसद उन्नाव ,योगी आदित्य नाथ सांसद गोरखपुर एवँ माननीय श्री राम नाइक राज्यपाल उत्तर प्रदेश के हाल के वक्तव्य और संसद तथा उसके बाहर विरोधी दल के माननीय सांसदों एवँ नेताओँ द्वारा मचाया गया शोर -शराबा। 
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अंततः
************"महाजनों येन गतः स पन्थाः" का तात्पर्य यह भी है कि जिसके चलने से पथ
************ या रास्ते का निर्माण न हो वह महाजन या बड़ा आदमी नहीं हो सकता।।।।।।
दिनाँक 14 . 12 . 2014                                 mangal-veena.blogspot.com@gmail.com
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बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

बुहारी के दिन बहुरे

**********किसके सितारे कब चमक जाँय ;यह तो प्रभु जानें या ज्योतिषी जोड़ें ,घटायें। पर यह ध्रुव की भाँति अटल है कि कभीं न कभीं सबके अच्छे दिन आते हैं।कुछ ऐसा ही बुहारी ,बढ़नी ,झाड़ू या कूँचे के साथ हो रहा  है। जो झाड़ू कभी भँगी ,भिस्ती ,मेहतर या झाड़ूबरदार के हाथ रहकर उनको रोटी की आश जगाए रखता था ,वह आज सार्वजनिक स्थानों पर बड़े -बड़े नेताओं ,नौकरशाहों ,उद्योगपतिओं ,समाजसेविओं के हाथ सुशोभित हो रहा है। लोगों को ईर्ष्या होने लगी है कि दिन बहुरे तो झाड़ू की भाँति। यह नंगा फटेहाल देशी झाड़ू अब ब्रांडिंग एवँ पैकेजिंग के साथ शालीन हो चुका है। साथ ही इस कारोवार से जुड़े दस्तकार ,निर्माता ,विक्रेता सभी मस्त हैं। हों भी क्यों न। अब यह भारी खपत और अच्छे मुनाफे का धँधा बन चुका है। कवि रहीम ने ठीक कहा था कि चुपचाप समय का उलट - फेर देखो।जब अच्छे दिन आयगें तो बनते देर नहीं लगेगी। सो हर घर ,गली ,गाँव ,मुहल्ला ,सड़क ,रेल ,दफ्तर,स्कूल  ,अस्पताल ,अत्र-तत्र ,सर्वत्र पूरे भारत में यदि कोई चीज चलन और चर्चा में है तो वह झाड़ू और स्वच्छता ही है।आशा करनी चाहिए कि समग्र स्वच्छता के ईमानदार क्रियान्वयन की निरन्तरता से विश्व में भारत की छवि स्वच्छ भारत के रूप में अवतरित होगी।
**********झाड़ू की सफलता बीते तीन -चार वर्षों के घटनाक्रमों की वर्तमान अभियान में परिणति है।त्वरित सिंघावलोकन करें तो इसका श्रीगणेश अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार पर झाड़ू चलाने वाले आन्दोलन के साथ हुआ।अन्ना द्वारा जन लोकपल विधेयक के लिए चलाया गया आन्दोलन वास्तव में स्वतंत्रता के बाद का पहला सामाजिक पुनर्जागरण शँखनाद था जिसने भ्रष्टाचार एवँ सड़ी गली ब्यवस्था के विरोध में  पूरे देश के अंतर्मन को झकझोरा। जनता शनैः शनैः राष्ट्रहित, जनहित एवँ  स्वच्छ सामाजिक ब्यवस्था को जनतांत्रिक तरीकों से आगे बढ़ाने लगी। आन्दोलन में अग्रणी रहे अरबिंद केजरीवाल तथा उनके साथी अवसर का लाभ उठाते हुए एक राजनितिक दल बना लिए और झाड़ू लेकर चल पड़े- राजनितिक एवँ भ्रष्टाचारीय गन्दगी साफ करने। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठाया और झाड़ू लेकर चलने वालों की बाढ़ आ गई।अभिनव प्रयोग में इन्हें दिल्ली राज्य की सत्ता भी मिल गई।परन्तु जल्दी ही जनता समझ गई कि ये भी भ्रष्ट सत्तेबाजों की भाँति सत्ता लोलुप हैं और इनकी महत्वाकांछा भी पूरे देश की सत्ता हथियाने की है नकि अन्ना के संकल्प को सफल करने की।इस प्रकार इनकी सत्ता और संभावना दोनों समाप्त हो गईं। परन्तु जनता ने झाड़ू चलाना तय कर लिया था और उन्हें राष्ट्र स्तर पर नरेंद्र मोदी में सबसे विश्वसनीय  एवँ योग्य झाड़ू चलाने वाला विकल्प दिखने लगा था। अतः ऐतिहासिक सूझ -बूझ का परिचय देते हुए भारी बहुमत ने अपने सपनों का झाड़ू प्रधान सेवक श्री मोदी को पकड़ा दिया। आशा के अनुरूप मोदी जी अनेकानेक क्षेत्रों में पूरी क्षमता से झाड़ू चलाने लगे हैं और झाड़ू का इक़बाल बुलंद हो रहा है। आज कार्यपालिका ,न्यायपालिका ,विधायिका और संचार माध्यम सभी स्वच्छता के प्रति अभूतपूर्व गम्भीर हो गए हैंऔर स्वच्छ भारत मिशन की गाड़ी तेज गति से दौड़ने जा रही है।
**********इस बुहारी के अनेक पर्याय ही नहीं अपितु विस्तार देने वाली ढेर सारी सहायक क्रियाएँ भी हैं यथा पोंछा लगाना ,धूल  झाड़ना ,धुआँ उड़ाना ,प्रकाश करना ,फिनायल ब्लीचिंग या क्लोरिनेट करना ,ऑक्सीजन उत्सर्जन के लिए अधिकाधिक पेंड़ -पौधे लगाना,रासायनिक कचरे का प्रबंधन करना ,कूड़े  का निरंतर अंतिम निस्तारण करना इत्यादि इत्यादि। इन सबसे बड़ी सहायक क्रिया है-- गन्दगी या तो की ही न जाय या न्यूनतम की जाय और कूड़े का निस्तारण बुहारी करने से उसके अस्तित्व मिटाने तक की जाय।इन सभी क्रियाओं को समाहित करते हुए स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत भारत सरकार का एक उत्कृष्ट कदम है। इसकी सफलता के लिए देश के हर नागरिक की सहभागिता अपेक्षित है। यह सहयोग हमें असहज भी नहीं लगाना चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तानी संस्कृति ही स्वच्छता की नींव पर खड़ी हुई है। परंपरागत तौर पर हमलोगों की अपनी, अपने घरों एवँ द्वार- दरवाजों की स्वच्छता बेमिशाल होती है यहाँ तक कि हमारी एक पूज्य देवी के हाथ सदैव झाड़ू शोभायमान रहता है।परन्तु उस परिधि से बाहर हमें सार्वजानिक स्थलों जैसे सरकारी चिकित्सालय ,विद्यालय ,कार्यालय ,रेलवे स्टेशन ,बस पड़ाव,गली , सड़क, नदी,बाजार इत्यादि में गन्दगी करने ,देखने और सहने की आदत सी बन गई है। एक प्रचलित कथन है कि जिससे छुटकारा मिलना सम्भव न हो उसके साथ रहना सीख लो।इस सोच से बहार  निकलने और स्वच्छ भारत निर्माण का समय आ गया है क्यों कि झाड़ू के सितारे आसमान छू रहे हैं।
**********महात्मा गाँधी अपने जीवन में स्वतंत्रता से अधिक स्वच्छता को महत्व देते थे। स्वच्छता जीवन पर्यन्त उनकी चर्या में समाहित थी। इसकी छाप आज भी साबरमती या सेवाग्राम आश्रम में द्रष्टब्य है। महात्मा जी की अगुआई में हुई जनजागृति ने हमें स्वतंत्र भारत दिया परन्तु स्वच्छ भारत का स्वप्न वर्षों से स्वप्न बना रहा। अब दूसरी जन जाग्रति ने वर्तमान सरकार की अगुआई में  हमें स्वच्छ भारत देने की ठान ली है। अतः अपनी -अपनी भूमिका निभाते हुए स्वच्छ भारत अभ्युदय का उत्सव मनाना चाहिए। स्वतंत्र भारत का स्वच्छ भारत होना महात्मा की पुनीत जयन्ती पर उन्हें सर्वाधिक प्रिय श्रद्धांजलि होगी। यह झाड़ू की ही बलिहारी है कि स्वच्छ भारत  अवतरित हो रहा है। बुहारी तेरे दिन बार बार बहुरे।
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अंततः
विजय पर्व दशहरा की सभी सुधी प्रिय पाठकों को मंगल कामनाएँ। सुत्योहारमस्तु।___मंगल वीणा
दिनाँक :2 अक्टूबर 2014  स्थान :वाराणसी
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