गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

गुजराती गौरव -एक चुनावी चर्चा

तीन -चार दिन पहले कच्छ गुजरात के निवासी मेरे एक चिर परचित मित्र  का देर रात फोन आया । चूँकि रात में आने वाले फोन थोड़ा चौंकते हैं ,अतः झट उठकर मोबाइल सँभाला और हेलो बोल पड़ा ।
उधर से आवाज आई -साब जी नमस्ते । मैं नरायन भाई कच्छ से बोल रहा हूँ ।  देर रात में फोन करने से आप बिचलित तो नहीं हुए ।
बिल्कुल नहीं भाई ,नमस्ते । तुम कैसे हो ?घर -परिवार एवँ कच्छ का कुशल -छेम बताओ ।
सब भलो ।आप लोग कैसे हैं ?बनारस में नरेंद्र भाई मोदी का चुनाव अभियान कैसा चल रहा है ?
बहुत बढ़िया । फिरहाल मोदी जी की स्थिति सर्वोत्तम चल रही है । वे बनारस से चुनाव जीत सकते हैं । ऐसी प्रबल सम्भावना है । परन्तु तुम तो काँग्रेसी नेता एवँ ओहदेदार हो। फिर तुम्हें मोदी जी से सहानुभूति क्यों ?
दूसरी ओर से आवाज आती है "सा --ब जी !हमारे लिए भारतीय होना सर्वाधिक गौरव एवँ गुजराती होना प्रथम गौरव की बात है। मेरा काँग्रेसी होना तो बाद की बात है । आज नरेंद्र भाई हम गुजरातिओं के लिए गुजरात का गौरव हैं। हम सबकी शुभेक्षा है कि नरेन्द्र भाई देश के प्रधान मंत्री बनें ।
परन्तु तुम सरीखे काँग्रेसी मोदी जी को प्रधान मंत्री बनाने में क्या योगदान कर सकते हैं ?
अरे सा -ब जी !समझने का प्रयास करिए । राज की नीति को राजनीति कहते हैं । हम लोग भी अपने ढंग से काम कर रहे हैं ।अभी -अभी होटल वापस लौटे हैं । मस्तिष्क में कौंध हुई "होटल "
तुरन्त सवाल दागा -भाई तुम इस समय कहाँ से बात कर रहे हो ?
मैं इस समय दिल्ली हूँ और अभी एकाध सप्ताह यहीं रहूँ गा । हो सकता है कि बनारस आने का भी कार्यक्रम बनाऊँ । रात बहुत हो चुकी है । फिर किसी दिन चर्चा करें गे । जय भारत ।
नमस्ते भाई । ऐसा लगा कि लाइन कट चुकी है । मेरी नींद गायब थी । एक क्षण राज ---नीति का ध्यान आता तो दूसरे क्षण "जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान हो "का ध्यान आता । मुझे लगा कि कच्छ के लिए काशी का हाथ बढ़ाने का समय आ गया है ।
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अंततः -एक लघु कहानी
-----------------------------------------------रजाई वाला रमैया  -----------------------------------
**********रमैया अपने परिवार के साथ समाज के अन्य जंगल पर आश्रित परिवारों की भाँति जीवन यापन कर रहा था । कभी जाड़े में लकड़ी की बेच से उसे थोड़ी अच्छी कमाई हो गई ।  उसने मन ही मन सोचा कि बड़े लोग जाड़े में रजाई ओढ़ते हैं । उन्हें बड़ा मजा आता होगा । हमारी भी कोई जिन्दगी है ?पूरी सर्दी पुआल एवं कथरी में लिपटे बीत जाती है । उसने अपने को धिक्कारा कि पिछले साल भी उसने अपने बच्चों द्वारा इकठ्ठा किये गए सेमर की रुई को नून- तेल के चक्कर में महाजन को भेंट कर दिया था। न जाने कहाँ से हौसला बढ़ा ,झटपट बाजार की ओर बढ़ गया और एक नई रजाई खरीद कर ख़ुशी -ख़ुशी घर आया ।
**********पूरे परिवार में खुशियों की बाढ़ आ गई । पत्नी ने त्योहारी खाना बनाने का उपक्रम किया । तभी रमैया के साले साहब बहन का हाल समाचार लेने आ धमके । फिर क्या था । भोजन के बाद नई रजाई का  पहला आनन्द साले साहब उठाये । जब तक साले जी बहनोई के घर से विदा हुए ,पूरे समाज एवं रिश्तेदारों में यह बात जंगल की आग की तरह फ़ैल गई कि रमैया ने नई रजाई खरीदी है  ।जहाँ समाज में किसी के पास एक साबुत ओढ़ना नहीं वहाँ रमैया के पास नई रजाई ।आश्चर्य । फिर शुरू हुआ रमैया के यहाँ एक रिश्तेदार का आना तो दूसरे का जाना । वीटो वाले रिश्तेदार तो पांच- छः दिन से पहले हिलने का नाम न लिए । इस प्रकार जाड़ा बीतने को आया परन्तु रमैया और उसको बच्चों  को अपनी नयी रजाई ओढने का सौभाग्य न मिला । उलटे रिश्तेदारों के आव- भगत में पूरा घर बेहाल हो गया और गाँव के महाजन का क़र्ज़ भी उसपर बढ़ता चला गया ।
**********जिस रजाई को रमैया  बड़ी नियामत समझ कर घर लाया था उस  रजाई ने उसका सुकून छीन लिया । अब वह रात दिन उस रजाई से छुटकारा पाने की तरकीब  सोचने लगा  । एक अल -सुबह जब फूफा महोदय रजाई छोड़ कर बहार सैर पर निकले ,रमैया ने झट कौड़ा जलाया और रजाई को अग्नि के हवाले कर दिया।सारी बात समझते ही फूफा भी खिसक लिए ।रमैया के जाड़े एवं कष्ट का एक साथ अंत हो गया ।
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दिनाँक 17.04.2014                                    Mangal-Veena.blogspot.com@Gmail.com
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बुधवार, 26 मार्च 2014

A homage to the compassion

My eldest brother Shri Shambhoo Narain Singh,who had been an exemplary poet of Hindi literature,passed away on 6.3.2014 at the age of eighty three years.Better known with nickname Akinchan Ji in the literary word ;he carried forward the great tradition of Shri Jaishankar Prasad in spirit as well as letters.Through out his life he was a teacher,a scholar,a philosopher and a Satsangi full of compassion.
During college days in 1960s Akinchan Ji published his first two books of poems namely 1.PREMMANDIR 2.JIVAN MALA having philosophical approach of life in stenza.He had such a passion for literature in those days that he convinced mother and aunt to sell their ornaments to meet the expenses of printing these books.Afterwards he also saw bundles of these books being sold to Noonwalah for buying common salt in exchange.But the best creation of this poet came in 1987 when an epic HANS KALADHAR reached in hands of Hindi scholars and comments sprang in news papers.This Mahakavya is based on story of Nala and Damyanti narrated in Mahabharata.This work has perfected all the parameters of a Mahakavya and thus a treasure of Hindi literature which may be compared well with Kamayani  for its literary richness.The epic has a very smooth journey with the umbrellas of nine Rasas and pretty clothings of Alankars on the platform of poetic standards.This epic is still waiting for its evaluation.His post 90s and unpublished writings viz poems ,proses,stories are left with his family awaiting publication.
Here are some stenza to recall the gret poet-
हे  नाथ ! दीनता  के  पीछे , जैसी  तव  करुणा  रहती  है ।
इस दास अकिंचन की आशा ,निशि दिवस उसी पर रहती है।
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स्वामी की चाह जान मन में
श्री जा पहुँची ज्यों निषध देश
सुख -शान्ति -साधनों में प्रवेश
पाकर बैठी ज्यों विविध वेश । 1 परिचय सर्ग
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नीरव अम्बर के  किस पथ से-
वह आई थी मेरे   समीप
फिर किस पथ से वह गई कहाँ
यह मुझे बता दे ,गगन -दीप । 35 स्वप्न -सर्ग
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अम्बर  परिधान पहन श्यामल
फहरा मादक छवि क्षितिज छोर
ज्यों सन्ध्या -श्री अञ्चल पसार
उनको पुकारती विभा -ओर । 2 6 निसर्ग -दर्शन सर्ग
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निज अहँकार के पोषण में
जीवन करता कल्मष रचना
चाहे जैसी भी सिद्धि मिले
उसमें न कहीं कुछ भी अपना । 59 हँस -प्रदीप (द्वितीय -कला )सर्ग
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With passage of time and research of his literary contributions the genius of this great poet will get its proper place.I have never seen a poet of such a high standard and of such a low popularity.This may be the plight of today,s marketing management.
 Passing away of Akinchan Ji is an irreparable loss to our family and to the literary world.With all our sentiments and sincerity we pay homage to his compassion .
O GOD !May his soul rest in peace .
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Date-26.3.2014                                   Mangal-Veena.Blogspot.Com
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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

समाजवादी टोपी एवं लाल बत्ती

--------------------इस वर्ष होने जा रहे आम लोकसभा चुनाव में अपनी -अपनी विजय केलिए भाजपा या काँग्रेस ही नहीं अपितु देश के सभी छोटे- बड़े राजनीतिक दल अपने आधुनिक रणकौशल केसाथ जनता के बीच उतर चुके हैं । सायकिल सवार समाजवादी भी लाल टोपी लगाये झुण्ड के झुण्ड उत्तर प्रदेश की सडकों पर निकल पड़े हैं । जनता को मोहक सपने दिखा कर उन्हें अपना सपना पूरा करना है । सपना एक ही है कि यदि किसी भाँति जनता एक बार फिर बहक जाती और लोकसभा चुनाव में उन्हें ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विजयी बना देती तो जोड़ -तोड़ की कोई जुगत भिड़ा कर उनके नेता जी अर्थात मुलायम सिंह यादव भी चौथेपन में देश के प्रधान मंत्री वाली कुर्सी का नैसर्गिक आनन्द उठा लेते ।कितने दिन केलिए बैठ लेते -यह बात समाजवादिओं के सपना में गौण है । बैठने के बाद वे मनमोहन सिंह ,देवगौड़ा, स्व नरसिंह राव या स्व चौधरी साहब सिद्ध होंगे -यह भी इन लोगों का नहीं बल्कि इतिहासकारों का विषय होगा ।    
--------------------अभी नेता जी ने कहा है कि चुनाव से पहले कोई तीसरा मोर्चा नहीं होगा । बात भी ठीक है चुनाव परिणाम आने तक सारे विकल्प खुले रखना उनके हित में है । यदि अच्छी सँख्या में उत्तर प्रदेश से सीटें मिल गईं और सम्भावना का सिद्दांत काम कर गया तो मन माँगी मुराद पूरी नहीं तो सोनिया जी की शरण में तो वे पहले से हैं ही । सारे आकलन गलत होने की दशा में नेता जी तो कहते ही हैं कि अडवाणी जी देश के बड़े नेता हैं । चूँकि प्रदेश के बाहर समाजवादी दल अस्तित्व विहीन है अतः इन्हीं तीन विकल्पों में उन्हें अपनी जगह तलाशनी है । समाजवादी भूलें -न भूलें परन्तु उनके मुखिया कैसे भूल सकते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव के समय वे ममता बहन का कितना साथ निभाए या नाभकीय मुद्दे पर वे बामपंथियों के साथ कितना चले ।
--------------------उत्तर प्रदेश में राजशाही ज़माने से दबंगई की एक सामन्ती धारा बहती है ।समाजवादियों में भी दबंगई की अपनी संस्कृति है। किसी को उठक -बैठक करा देना ,किसी जी हुजूरी न करने वाले अधिकारी को अपमानित कर देना ,जाति विशेष के अधिकारियों का योग्यता न होते हुए भी रुतबा बढ़ा देना ,कानून ब्यवस्था की धज्जियाँ उड़ते देखना या सैफई जैसे नाच -गाने का आयोजन सदा इनके शासन और शान में होता आया है । इनकी दबंगई कार्यालयों एवं सडकों पर दिखती है और एक वर्ग के नव युवकों को खूब भाती है।ऊपर से इस दल के बड़े नेताओँ का अपने छोटे कार्यकर्ताओं एवं परंपरागत मतदाताओं से गहरा जुड़ाव है । सोने में सुहागा कि उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण निर्विवादरूप से समाजवादियों की सबसे बड़ी मतपूँजी है ।
 --------------------दबंगई बढ़ाने एवं कार्यकर्ताओं में नया रक्त -संचार भरने केलिए उत्तर प्रदेश सरकार चाहती है कि हर जिले में उनके दस -पाँच नेता लाल बत्ती से सुशोभित हों और जनता में इनके साथ रहने के ग्लैमर का चकाचौंधी संदेश जाय । किसी को मंत्री ,किसी को राज्यमंत्री तो किसी को उनका दर्जा देकर लालबत्ती एवं सुरक्षा कर्मियों का कवच देना भी तो सरकार का दायित्व है ताकि समाजवादिओं में समाजवाद चहुँ ओर दिखे । यह तो माननीय उच्च न्यायालय है कि लाल बत्तियों की बाढ़ को रोक रही है । फिर भी समाजवादी सरकार उच्चतम न्यायालय जाने का मन बना चुकी है और यह बात माननीय न्यायालय के संज्ञान में लाये गी कि लाल बत्ती की सँख्या बढ़ाने से भला जनता का क्या लेना -देना है । अलबत्ता इससे तो हनक बढे गी कि पुलिस वाले खोई हुई  समाजवादी भैसें हर हाल में ढूंढ़ निकालें गे ।
-------------------- लाल टोपी और लाल बत्ती की युगलबंदी जनता को भली लग रही है या नहीं -यह तो चुनाव परिणाम ही बताएँ गे ।परन्तु समाजवादियों को इतना तो समझ लेना चाहिए कि अन्ना आन्दोलन से देश की जन चेतना जागृत हुई है और वह अब नेताओं को मात्र सेवक के रूप में देखना चाहती है । अभी समाजवादी सरकार जनता की कितनी और क्या -क्या सेवा कर रही है ;इसका सड़क और चौराहों पर आकलन हो रहा है । अब निर्णय ,धर्मनिरपेक्षता के छलावे पर नहीं, सामने दिखते विकास पर होगा । यह आगामी चुनाव का बड़ा ही दिलचस्प पहलू होगा कि उत्तर प्रदेश किस करवट बैठता है।  बेहतर होगा कि समाजवादी खास बनने का चक्कर छोड़ आम बनने का प्रयास करें और अपनी सारी ऊर्जा एवं संसाधन उत्तर प्रदेश के विकास और जनता की खुशहाली केलिए लगा दें ।
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अंततः
--------------------विकास वह चकाचौंध है जो दिखती है । इसे रैली,सड़क यात्रा या विज्ञापन द्वारा दिखाने की अवश्यकता नहीं पड़ती है ।
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दिनाँक 11 . 2 . 2014 -------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 29 जनवरी 2014

भारतीय गणतंत्र की पैंसठवीं वर्षगाँठ

---------------बीते छब्बीस जनवरी को पूरे देश में यहाँ -वहाँ भारतीय गणतंत्र की पैंसठवीं वर्षगाँठ मनाई गई । जो लोग भारतीय तंत्र से सीधे या परोक्ष जुड़ें हैं वे इसे मनाने का चाक -चौबंद एवँ सफल उपक्रम किये । जो लोग इस तंत्र से सीधे या परोक्ष लाभार्थी हैं वे उत्सव का आनंद उठाए और अपना छबिप्रदर्शन भी किए । वर्षों से देखा गया है कि राष्ट्रीय पर्वों पर कर्मचारी बहुत आनंदित होते हैं जिन्हें पर्व के नाम पर एक दिन की छुट्टी मिल जाती है या वे लोग प्रसन्न होते हैं जिन्हें मिठाई खाने ,खेलने -कूदने या मौज-मस्ती का अवसर मिल जाता है । वे भी बहुत खुश होते हैं जिन्हें काफी प्रतीक्षा के बाद उस दिन केलिये व्यवस्था दायित्व निर्वहन के बदले छतिपूर्ति का भरपूर लाभ मिल जाता है । परन्तु गणतन्त्र चलाने वाले नेता और नौकरशाह रूपी तांत्रिकों के ख़ुशी एवं उमँग का क्या कहना जो ऐसे अवसरों पर सञ्चार माध्यमों से जनता को यह अनुभव कराते हैँ कि वे ही इस देश की सवा सौ करोड़ जनता के विधाता हैं । इन विशेष वर्गों से इतर शेष जन मानस से हमारे राष्ट्रीय पर्व भावनात्मक एवं ब्यवहारिक तौर पर जुड़ ( कनेक्ट ) नहीं पाये हैं । ढेर सारे कारणों में साफ़ दीखता कारण यह है कि गणतन्त्र चलाने वालों में जनता के प्रति कोई ईमानदार प्रतिबद्धता नहीं है और जनता में गणतंत्र चलाने वालोंके प्रति उनके नित नए कारनामों से उपजा घोर विकर्षण है।
---------------गणतांत्रिक देश बनने के बाद चौसठ वर्षों में अर्जित हमारी उपलब्धियों ने पूरी दुनियाँ का ध्यान खींचा है । परंतु चीन से विकास में अभी पीछे होने और विश्व शक्ति न बन पाने केलिए गणतंत्र चलाने वालों पर सदैव उँगली उठती रही है । गणतंत्र के उम्र का एक भारतीय नागरिक जब देश में ऊबड़ -खाबड़ ,गड्ढायुक्त ,धूल -गुबार भरी घटिया सडकों का संजाल देखता है , सड़क चौराहों पर पुलिस को अवैध वसूली करते पाता है ,कार्यालयों में किसी भी काम केलिए कर्मचारियों को सुविधा शुल्क माँगते पाता है या सरकारी अस्पतालों में स्वयँ अस्पताल को बीमार पड़ा देखता है तो वह निराश होकर गणतंत्र से डिस्कनेक्ट हो जाता है ।इसी वय का गंगा किनारे वसने वाला कोई दूसरा ब्यक्ति; जो लड़कपन में नित्य गंगा की धवल धारामेंतैराकी,स्नान,मज्जन एवं पान  का आनंद उठाया करता था ;आज जब उसी धाराविहीन और दुर्गंधयुक्त गंगा को मल- जल के साथ बहते देखता है तो उसे घोर निराशा होती है । ऋषियों -मुनियों की ब्यथा का तो कहना क्या । ऐसे ही एक कृषक अपनी उपेक्षा एवँ एक ब्यवसायी उसपर थोपी जानेवाली असुविधाओं के कारण डिस्कनेक्ट हो जाता है । डिसकनेक्सन  की ये सारी लड़ियां मिलकर जन को जनतंत्र से अलग कर दी हैं । फिर जन में जनतंत्र के लिए उत्साह कहाँ से आए ?
---------------इस निराशा के बीच पिछले एक -दो वर्षों से इन राष्ट्रीय पर्वों पर भागीदारी में कुछ अद्भुत बदलाव दिखने लगा है  जो मरुस्थल में किसी मरूद्यान सा प्यारा लगता है ।गली ,मुहल्ले में घूम -घूम कर सब्जी बेचने वाले अपनी रेहड़ी पर ,गाड़ी चालक अपने वाहन पर ,कुछ घरेलू लोग अपने घरों पर ,चाय -पानी वाले अपनी दुकानों पर ,यहाँ तक कि घुमन्तू लोग अपनी साइकिल पर छोटे -छोटे तिरंगे लहराते इन पर्वों पर प्रसन्न मन से कार्यशील दीखते हैं।सोने में सुहागा कि कुछ वर्ष पहले से हमारा तिरंगा भी सरकारी दायरे से आगे बढ़ कर जन -जन के हाथ पहुँचने का राह पा चुका है। यह परिदृश्य स्पष्ट संकेत देता है कि परिवर्तन की वयार चल पड़ी है और गणतंत्र का नया युग प्रारंभ हो रहा   है । नई पीढ़ी के युवा ही इस बदलाव के सूत्रधार एवं नायक हैं । इन युवकों में पुरानी पीढ़ी की अपेक्षा अधिकार और कर्तब्य की बेहतर समझ है । ये युवक भारत एवं इसके गणतंत्र को नई उँचाई देना शुरू कर दिए हैं । इन्हीं की उर्जाभरी सहभागिता से गणतंत्र चलाने वालों की सोच बदल रही है और जनता गणतंत्र से कनेक्ट हो रही है । जनता की आपसी विमर्श में तुरंत संपर्क माध्यम भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं । इन माध्यमों की सक्रियता ने भारत क्या पूरे विश्व में परंपरागत शासन प्रणाली को झकझोर दिया है ।आज का बदलाव कल के सुनहरे  भारत का शुभ संकेत है ।
---------------कितना अच्छा होता कि देश की निःस्वार्थ सेवा करने वाले अन्ना हजारे जी इस पर्व पर राजपथ पर विशिष्ट अतिथि के रूप दिखे होते या काले धन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले बाबा रामदेव को इस अवसर पर पदमभूषण जैसा पुरस्कार दिया गया होता अथवा गणतंत्र को गंगा -यमुना बचाओ या जंगल और पर्यावरण बचाओ अभियान पर केंद्रित (फोकस )किया गया होता । निःसंदेह भारत एक दिन अनुकरणीय राष्ट्र बने गा जब हमारे सांस्कृतिक एवं धार्मिक पर्व राष्ट्रीय पर्व बन जाएँ गे और राष्ट्रीय पर्व सांस्कृतिक एवं धार्मिक बन जॉय गे । रिट्रीट का समय निकट है अतः बस । जय भारत ,जय गणतंत्र ।
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अंततः
अजीब लगता है जब "जो शहीद हुए हैं ,उनकी जरा याद करो कुर्बानी "जैसे कालजयी गाने की याद आते ही लता जी की ओर ध्यान चला जाता है परन्तु जिसकी अन्तःपीड़ा इस कविता के रूप में अवतरित हुई उस महान कवि प्रदीप को लोगों में याद कराना पड़ता है । उन्हें भारतरत्न देने वाले किस श्रेणी में रखते हैं ?
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दिनाँक 29 जनवरी 2014                                              mangal-veena.blogspot.com
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

नववर्ष मंगलमय रहे


आकलन की बात हो तो कुछ सुखद दीखता नहीं ।
फिर भी प्रभु से प्रार्थना , नववर्ष मंगलमय रहे । (1)
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जानता हूँ ‘विश' के, कोई मायने होता नहीं ।
पर शुभेच्छा चाहती , नववर्ष मंगलमय रहे । (2)
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तरणि तरना चाहती , लहरों पर उसका वश नहीं ।
नाविक नदी से चाहता , कि पार वह होता रहे । (3)
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रश्मियाँ हैं जानती , कि बादलों पर वश नहीं ।
फिर भी लहरें चाहती , अठखेलियाँ होती रहें ।  (4)
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उम्र ढलती जा रही , इस पर किसी का वश नहीं । 
दिल सदा यह चाहता, वह चिर युवा दिखता रहे । (5)
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काल अपना काम करता , मौत पर है वश नहीं ।
किन्तु इतना खुश रहो , यमराज भी सहमा रहे ।  (6)
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पुष्प की क्या उम्र हो? माली कभी सोचे नहीं ।
सुरभि ऐसा दे , पवन मदमस्त हो रमता रहे ।    (7)
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कर्म करते हैं सभी , कर्तव्य  की  चिंता नहीं ।
द्वंद में जीते रहें ,फिर भी विजय मिलती रहे ?   (8)
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बहुत हल्ला कर लिया,वर्तन हुआ कुछ भी नहीं ।
भ्रष्ट  रिश्वतख़ोर  हँसते , और हम घुटते रहे ।   (9)
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उठो मिलकर थाम लें,उल्टी हवा के वेग को ।
नव सवेरा हो धरा ,  अंगड़ाइयां  लेती रहे ।     (10)
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यदि मिले एक डायरी , कोई सुहृद सौजन्य से
एक कैलेंडर टाँग दूँ , नववर्ष भर चलता रहे ।    (11)
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चाहता हूँ कुछ लकीरें , इस धरा पर खींचना ।
लेखनी को क्या कहूँ , चट्टान पर है वश नहीं |   (12)
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दिनाँक 30.12.2013 Mangal-veena.Blogspot.com

बुधवार, 20 नवंबर 2013

भारतरत्नगर्भा वसुन्धरा

 ************  इस धरती पर कभी खनिज विशेष के रूप में तो कभी व्यक्ति विशेष के रूप में रत्न अवतरित होते रहते हैं । खनिज या पत्थर वाले रत्न परीक्षण के तो शतप्रतिशत परिभाषित मानक  हैं परन्तु ब्यक्ति के परीक्षण हेतु ,कम से कम भारत में ,कोई स्पष्ट मानक नहीं हैं । फिर भी जो मानक उपलब्ध हैं ;उनके परिपेक्ष्य में जब कोई व्यक्ति कुछ एक भारत रत्नों के लिटमस जाँच का प्रयास करता है ,उसकी शंका घटने के वजाय बढ़ती जाती है । हाल में सचिन तेंदुलकर एवं प्रो सीएनआर राव को भारतरत्न दिए जाने के बाद पूरे देश में इसके मानकों पर एक बार फिर ऐसी ही चर्चा होने लगी है और भारतरत्न के मानक ही लड़खड़ाते दिख रहे हैं । हम भारतीयों की विशेषता है कि हम किसी भी निर्णय के लिये बहुत ही लचीला एवं धुँधला मानक बनाते हैं ताकि निर्णय को गलत या सही ठहराने में इन  दो शब्दों का लाभ उठाया जा सके ।थक हार क़र एक मानक को सर्वोपरि मानना पड़ता है कि सरकार जिसे भारतरत्न की उपाधि देदे वह भारतरत्न पाने की योग्यता रखता है । अन्यथा नहीं ।
************अभी हाल में जिन दो महानुभावों को भारतरत्न दिया गया ;निःसंदेह उनमें से एक विज्ञानं जगत का सितारा है तो दूसरा क्रिकेट का । इन्हें यह सम्मान मिलने से इनके प्रसंशकों में ख़ुशी की लहर है और बधाइयों का ताँता । यह और भी अच्छी बात रही कि बीते सप्ताह ये दोनों भारतरत्न विशेषकर तेंदुलकर महँगाई ,भ्रष्टाचार एवं जनता के तमाम घावों पर भारी पड़े ।यदि ऐसा ही कुछ हमारी सरकारें सप्ताह दर सप्ताह करती रहें तो भूखी जनता ख़ुशी मनाते मरेगी और उनके कराह की आहट भी नहीं लगेगी ।मीडिया को भी ब्यस्त होने का मसाला मिल जायगा । इस घोषणा हेतु चुने गए समय केलिए भी भारतरत्न चयन समिति के सदस्य और भारत सरकार सभी बधाई के योग्य हैं । सोने में सुहागा यह कि सप्ताह जाते -जाते इस अलंकरण ने एक नया एवं बड़ा बहस का विषय खड़ा कर दिया कि सचिन को भारतरत्न तो अटल विहारी बाजपेयी को क्यों नहीं । यह विषय भी दर्द निवारक की तरह थोड़े दिन जनता को राहत देते दिख सकता है ।
************रही बात भारत के पूर्व प्रधान मंत्री बाजपेयी की । उन्हें भारतरत्न न देने में मानक अड़चन हैं ही नहीं ।मूल में अड़चन तो राजनीति है वरन मानकों की निष्पक्ष कसौटी पर वे सबसे पहले और सबसे ऊपर खरे उतरते हैं । उन्हें यह सम्मान देने से सम्मान भी सम्मानित होता । यदि श्रेष्ठता की चर्चा हो तो यह सच्चाई है कि समान कार्यक्षेत्र में योगदान देने वालों में ही तुलना हो सकती है। अतः सचिन की तुलना किसी खिलाड़ी से , प्रो राव की किसी वैज्ञानिक से एवं अटल विहारी बाजपेयी की किसी राजनेता या राष्ट्रनायक से ही सटीक हो सकती है ।चूँकि प्रो राव पर कोई विवाद नहीं है , अतः मानकों के विश्लेषण हेतु  हम सचिन को भरपूर सम्मान देते हुए , उपलब्धियों के रूप में उनके योगदान को स्मरण कर सकते हैं ।
 ************ उनका कार्यक्षेत्र क्रिकेट का खेल रहा है जो दुनियाँ के मात्र आठ -दस देशों में खेला जाता है ।  यह खेल न तो विश्व स्तर का है न ही ओलम्पिक में सम्मिलित है ।भारत में इस खेल का दायित्व एक गैर सरकारी संस्था ,जिसका नाम भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड है ,निभाती है । यही संस्था खिलाड़ियों का चयन कर उन्हें अनुबन्धित करती है और इन्हीं आठ -दस देशों में मैच आयोजित कर करा करा कर अपने और खिलाड़ियों के लिए पैसे कमाती है । चूँकि भारत में यह खेल बहुत ज्यादा लोकप्रिय एवं धन संपन्न है इस लिए क्रिकेट खेल एवं इसके खिलाड़ियों  की आभा भी  चकाचौंध करने वाली बन चुकी है । आंकड़ों की ढेर सारी रोमांचक विविधताओं से भरी इसी क्रिकेट में सचिन ने सैकड़ों का सैकड़ा बनाया ,सर्वाधिक रन बनाया ,सर्वाधिक मैच खेला ,सर्वाधिक समय तक क्रिकेट खेला ,सभी प्रारूप में भारत को विजय दिलाया ,इत्यादि इत्यादि ।बदले  में तेंदुलकर ने बोर्ड एवं विज्ञापन से अरबों रूपया कमाया और शोहरत के शिखर पर पहुँच गए ।क्रिकेट में वर्षों तक खेलते हुए सचिन ने आंकड़ों के अनेक कीर्तिमान बनाने के अलावा खेल को ऐसा कोई योगदान नहीं दिया जिससे वह पूरे विश्व में खेला जाने लगा हो या खेल भावना की कोई सांस्कृतिक लहर चल पड़ी हो । पैसा एवं सोहरत से इतर उनकी दृष्टि ,सोच ,कृतित्व एवं प्रतिबद्धता में कोई करिश्मा भी अबतक नहीं दिखा है जो समाज के लिए एक चालन -शक्ति (driving -force )का काम करे । अब कोई अन्य खिलाडी किसी अन्य खेल या क्रिकेट में ऐसी ही परिस्थितियों में इस तरह के आँकड़े बनाए तो क्या सचिन के लिए बनाये गए मानक उसे भारत रत्न दिलाएं गे ?शायद नहीं । खेल को योगदान के मापदण्ड पर मेजर ध्यानचन्द ,कपिल देव या पी टी उषा उनसे किसी भी प्रकार पीछे नहीं रहे । फिर यही यक्ष प्रश्न कि इन सितारों को भी भारतरत्न क्यों नहीं ।
************निर्विवाद सचिन ने करोड़ों भारतीयों का वर्षों तक बेजोड़ मनोरंजन किया । इसके लिए उन्हें साधुवाद । भारतीय समाज एवं राजनीतिज्ञों को उन्होंने ऐसा बल्ला और गेंद भी पकड़ा दिया कि वे भविष्य   में वाद-विवाद रूपी  विषम बैट -बाल का खेल खेलते रहेंगे ।इस योगदान के लिए भी उन्हें याद किया जायगा ।        भारतरत्न चयन समिति को चाहिए कि अपनी भूल ठीक करते हुए ,आज की स्थिति में पहुँच चुके मानकों के सन्दर्भ में ,श्री अटल विहारी बाजपेयी ,स्व ध्यान चन्द व अन्य ऐसे विशिष्ट ब्यक्तियों को फटाफट भारत रत्न देदे ताकि वर्तमान विवाद को विराम लगे । भारतीयों को आवश्यक और अनावश्यक बोझ ढोने की आदत है । वे सभी भारतरत्नों को याद करेंगे और अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाएंगे । जब मानकों की बात उठेगी ,भारत के भाग्य विधाता लोग इतिहास -भूगोल बदलने की बात उठा देंगे । परन्तु किसी को नहीं भूलना चाहिए कि मानकों का क्षरण समाज के लिए घातक है । यदि माप -तौल के मानकों को क्षरण से बचाने के लिए वैज्ञानिक एक से बढ़ कर एक त्रुटिहीन ब्यवस्था कर रहे हैं तो हम भारतीय अपने सर्वोच्च सम्मान के क्षरण पर गंभीर क्यों नहीं ?सम्मान वही जो मानकों पर खरा उतरे और सर्व स्वीकृति पाये ।
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अंततः
           जिस पुरुष या नारी को सम्मान देने से सम्मान स्वयं सम्मानित हो
          ,वही पुरुष या नारी उस सम्मान के लिए सुपात्र है ।
दिनाँक 21 नवम्बर 2013   वाराणसी                                Mangal-Veena.Blogspot.com
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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

पारदर्शिता में पिछड़ती भाजपा

                               जैसे -जैसे काँग्रेस से जनता की उम्मीदें चकनाचूर हो रही हैं वैसे -वैसे जनता भाजपा के हर कदम पर सावधान निगाहें रख रही है। दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है। भारतीय  जनता पार्टी पर उम्मीदें भी टिकी हैं और शंकाएँ भी क्योंकि अलग चाल ,चरित्र और चेहरा वाली पार्टी इन्ही सन्दर्भों में कहीं -कहीं बिलकुल काँग्रेस सी दिखती है। अभी हाल में जब दागी सांसदों एवं विधायकों से संवंधित उच्चतम न्यायलय के फैसले को पलटने का प्रकरण चल रहा था ,भाजपा द्वारा भी इस मुद्दे पर परोसी जा रही थाली जनता को पसन्द नहीं आ रही थी। जब राजनीतिक पार्टियों के आमदनी श्रोत उजागर करने की बात आई तो वह काँग्रेस जैसी दिखी और अपने को जनता से छिपाती नजर आई। वैसे ही जब मंत्रियों एवं जनप्रतिनिधियों के संपत्ति विवरण की बात आती है तो भाजपा की आक्रामकता भोथरी नजर आती है। जब नेताओं की महत्वाकान्छा की बात होती है तो अनुशासन की बात करने वाली पार्टी के लोग मर्यादा को धता बताते नजर आते हैं और राष्ट्रवाद की बात करने वाले नेता अपनी महत्वाकान्छा के लिए लड़ पड़ते हैं। पारदर्शिता पर बल न देने के कारण ही जनता के मन में  भाजपा के विरोध और विचारधारा पर शंका के बादल उठते रहते हैं।
                               काँग्रेस पार्टी कहती है कि उसने जनता को सूचना का अधिकार दिया जिससे शासन और ब्यवस्था में पारदर्शिता आई परन्तु सबको पता है कि शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ एवं केंद्र और राज्य की सरकारें सूचना के अधिकार के प्रति कितनी ईमानदार और संवेदनशील हैं।यह भी पता है कि अन्ना हजारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को सूचना अधिकार केलिए क्यों और कितना संघर्ष करना पड़ा था। शर्म की बात है कि इस लोकतान्त्रिक देश में बहुत कुछ जनता से छिपाया जाता है या कि नहीं बताया जाता है जिसे जानने के लिए उसे सूचना के अधिकार रूपी हथियार से लड़ना पड़ता है। जहाँ इस हथियार को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता थी वहीँ इसे दिनोंदिन निष्प्रभावी बनाने के लिए अनेकानेक अपवाद बनाये जा रहे हैं और इसके दायरे सीमित किए जा रहे हैं। बहुत अजीब लगा जब काँग्रेस एवं अन्य पार्टियों के साथ भाजपा भी खड़ी हो गई कि राजनीतिक पार्टियों के श्रोत एवं ब्यय विवरण नहीं दिए जा सकते क्योंकि पार्टियाँ कोई सरकारी या लोक इकाई नहीं हैं। यही है अंधी पारदर्शिता कि भाजपा भी जनता से चन्दा लेगी लेकिन जनता को इसका हिसाब नहीं देगी। फिर जनता सोच में है कि राष्ट्रवादी भाजपा पर अन्य मुद्दों के सन्दर्भ में किस दिशा में और कितना भरोसा किया जा सकता है।यह जानना सबकी बेहतरी में है कि बीसीसीआई के तर्ज पर विभिन्न दलों द्वारा दिखाया जा रहा बल्ले और गेंद का मनोरंजन महँगाई और भ्रष्टाचार की मारी जनता को शूल की तरह साल रहा है।
                             अभी उन्नीस अक्टूबर को भाजपा के प्रधान मंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी की कानपुर में एक भीड़ भरी जन सभा हुई जिसमें मोदीजी बहुत ही मार्मिक एवं तार्किक ढंग से अपनी बात जनसमूह के समक्ष प्रस्तुत किए। यहाँ तक कि वे सेक्युलरिस्म की एक अच्छी परिभाषा भी दे डाले कि हिन्दू अच्छा हिंदू बने ,मुसलमान अच्छा मुसलमान बने ,सिक्ख अच्छा सिक्ख बने और इसाई अच्छा इसाई बने -फिर हमसब मिलकर बेहतर राष्ट्र बनायें गे। यहाँ वे यह भी उल्लेख कर सकते थे कि भाजपा अच्छी सरकार बनाये गी और फिर सब मिल कर देश को बेहतर बनायें गे। फिर अच्छी सरकार के विजन पत्र की बात होती कि उनकी सरकार कराहती जनता को महँगाई और भ्रष्टाचार से बाहर निकाल कर उन्हें कैसे खुशहाल बनाने की सोच रखती है।यह अच्छा होना ही वह  ब्रह्मास्त्र  है जो भाजपा केलिए  काँग्रेस की बुराइयों पर विजय दिला सकता है। संभव है कि काँग्रेस को नकारने के लिए लोग भाजपा को चुनें परन्तु जब लोग अच्छाइयों के लिए भाजपा को बहुमत केसाथ सत्ता पर बैठाएं तभी उसे  सर्वोत्तम राष्ट्रवादी पार्टी होने का गौरव प्राप्त होगा।
                             राजनेताओं द्वारा बार -बार ठगी गई जनता के लिए आज किसी पार्टी के अच्छा होने का सबसे बड़ा मापदंड उसकी पारदर्शिता है। पारदर्शिता इस बात की गारन्टी देती है कि पार्टी मन ,वाणी और कर्म से एक है और उसपर भरोसा किया जा सकता है। पारदर्शिता की कसौटी पर, जनता के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा  कुछ माह पहले गठित "आम आदमी पार्टी " ,सबसे आगे दीख रही है। इसी पारदर्शिता के बल पर आज "आप "ने दिल्ली प्रदेश के चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है। काँग्रेस और भाजपा के माथे पर दिल्ली के चुनाव को लेकर चिंता की लकीरें स्पष्ट हैं। जिस साफगोई से विभिन्न मुद्दों जैसे महँगाई , भ्रष्टाचार ,कालाधन ,जन लोकपाल ,नोटा ,पार्टी का आय -ब्यय विवरण ,बहुमत की स्थिति में सरकार के स्वरुप इत्यादि पर "आप "के लोग बोल रहे है ;वह आज की तारीख में जन भावना के बहुत नजदीक है। पारदर्शिता में धुंधलापन के कारण राष्ट्रीय स्तर भाजपा उस श्रेणी की आत्मीयता जनता के साथ नहीं बना पा रही है। इस दिशा में नरेन्द्र मोदी को विशेष ध्यान देना देना होगा। जनता को लगना चाहिए कि उनसे कुछ हाईड ( छिपाया )नहीं किया जा रहा है। तभी भाजपा काँग्रेस से बिल्कुल अलग दिखेगी  और जनता को अच्छा विकल्प दे सके गी।
Mangal-Veena.Blogspot.com                Date 22 October 2013
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अन्ततः
                             जब -जब हस्तिनापुर में गान्धारी की हित साधना में गान्धार के शकुनि जैसे लोग सक्रिय होंगे ,तब -तब महाभारत की पुनरावृत्ति होगी और परिणाम में गान्धारी एवं धृतराष्ट्र को केवल संताप हाथ लगेगा।                                                                   --मंगल -वीना
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