सोमवार, 16 अप्रैल 2018

बजट ,तूँ मारेसि मोहि कुठाँव

***************हमारे देश में निम्न मध्यम आय वाले नौकरी पेशेवर बेहद तन्मयता से बजट की प्रतीक्षा करते हैं , उनकी वैसी तन्मयता शायद ही किसी अन्य वस्तु की चाहत में दिखती है। देश में एक और महत्वपूर्ण वर्ग है जो कुछ ऐसे ही या यूँ कहें कि प्यासे चकोर की भाँति केंद्रीय बजट की बाट जोहता है और वह है मध्यम आय वाली महिलाओं का वर्ग।केंद्रीय सत्ता में बैठा कोई भी योजनाकार यदि इन दोनों वर्ग की पीड़ा को नहीं जानता या जानते हुए उनकी उपेक्षा करता है तो मानिए कि वह हिंदुस्तान को नहीं जानता या  उसे प्रफुल्लित नहीं देखना चाहता।आशा तो नहीं थी कि मोदी युग में ऐसा होगा परन्तु दुर्भाग्य कि ऐसा ही हो रहा है।इस वर्ष के केंद्रीय बजट द्वारा वित्त मंत्री ने फिर परिलक्षित कर दिया है कि इनके शोषण पर ही हमारा लोकतंत्र खड़ा है।रोटी ,कपड़ा, मकान , महँगाई ,शिक्षा ,स्वास्थ्य,सुरक्षा,भ्रष्टाचार,राजस्व व राजतन्त्र सभी इनका बेहिचक शोषण कर रहे हैं।आर्थिक तथा सामाजिक लाभ मे अहर्निश हमारे देश में अनुसूचितों और पिछड़ों की बात होती है ,लुटेरे अमीरों की बात होती है,देश को वर्वाद करने वाले निरंकुश नेताओं के विशेषाधिकार व आय बढ़ोत्तरी की बात होती है परन्तु दो पाटन के बीच पिसती इन खालिस वासिंदों की कहीं गिनती नहीं।इन्हें मात्र श्रोत और साधन माना जाता है।
 ***************आज करोड़ों कर्मचारी परिवारों के साथ साथ मध्यम आय वर्ग की  महिलाएँ भी ठगी सी निहार रही हैं कि उनके सपनों की सरकार को किसकी बुरी नजर लग गई।उन्हें तो बताया गया था कि जीएसटी के बाद रोजमर्रा उपयोग की जींस सस्ती हो जाँय गी परन्तु हुआ ठीक उसका उलट।बताया गया था कि बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सबकी सहनीय पहुँच सुनिश्चित की जाय गी परन्तु ये दोनों ही आवश्यकताएँ दुष्प्राप्य एवँ दिवालिया बनाने वाली सिद्ध हो रही हैं।इस  वर्ग पर तीसरी सर्वाधिक प्रभाव डालने वाली वस्तु पेट्रोलियम एवँ पेट्रोलियम उत्पाद की तो पूछिए मत जिनकी कीमतें सरकारें मनमाने ढंग से बढ़ा रही हैं और अब वे आसमान से बातें कर रही हैं।आमदनी की बात हो तो सातवें वेतन आयोग की सस्तुतियाँ न तो समय सापेक्ष उनकी चाहत के अनुरूप आईं  न कर्मचारी संगठनों की माँग पर सरकार गम्भीर हुई। इस निराशा और बढ़ती बेरोजगारी का परोक्ष प्रभाव निजी क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों पर भी पड़ा जिससे उनकी वेतन बढ़ोत्तरी पर बुरा प्रभाव पड़ा है;ऊपर से आयकर की क्रूर कैंची साल दर साल उनकी आय को कतरती जा रही है।भ्रष्टाचार मिटाने की पुरजोर शंखध्वनि हुई थी परन्तु आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबी संस्थाएँ व व्यवस्था पहले से ज्यादा पल्लवित ,पुष्पित हो रही हैं और इस बड़े उपभोक्ता वर्ग को अपनी आय का कुछ अंश यदा कदा रिश्वत मद में  भी  ब्यय करने केलिए विवश कर रही हैं।इस प्रकार मध्यम वर्ग की घटती क्षमता और उनपर बढ़ते बोझ का सरकार द्वारा आकलन और समायोजन न कर पाना भविष्य में गम्भीर सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकता है।
*************** सरकारों के राजस्व में सर्वाधिक योगदान इसी वर्ग का है। फिर सरकार के ध्यान पर भी इसी वर्ग का सर्वाधिक हक़ बनता है। परन्तु सरकारों का कृतित्व अक्षरशः इसके विपरीत है।प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में चालू वित्त वर्ष के लिए केन्द्र सरकार के  आय व्यय विवरण का अनुशीलन पर्याप्त है।उदहारण चाहिए तो सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना पर ध्यान दिया जा सकता है।सरकार पचास करोड़ गरीब लोगों को पाँच लाख प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा देने जा रही है।अब इनसे कौन पूछे कि मध्यम वर्ग को क्यों नहीं ?क्या वित्त मन्त्री इतना अनभिज्ञ हो सकते हैं कि उन्हें ज्ञात न हो कि एक मध्यम वर्ग का परिवार किसी बीमारी पर पाँच लाख रुपये खर्च करने के बाद निम्न आय वर्ग में फिसल सकता है।अतः उन्हें भी ऐसी सुविधाएं मिलती रहें जो कम से कम उन्हें मध्यम वर्ग में बनाए रखें।बजट व योजना वही बने जिससे सबका लाभ और विकास हो परन्तु राम राज्य की बातें करने वाले उसे धरातल पर उतारने के लिए कुछ भी करते हुए नहीं दीख रहे हैं।रामराज्य का निदेश है ---
_______________मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कहुँ एक ।
______________पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ।
____राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।(रामचरितमानस )
फिर क्यों न ऐसी धारणा बने कि सरकार सकल अंग का तात्पर्य सांसद ,विधायक ,गरीब ,निम्न वर्ग ,आरक्षित वर्ग ही समझती है और इसके लिए ये लोग ही साध्य हैं ;शेष  मध्यम वर्ग के लोग साधन।
***************कमियों को उजागर करना यदि लेखन दायित्व है तो उन कमियों को दूर करने के लिए व्यक्तिगत सुझाव देना भी वांछनीय लेखन धर्म।उदाहरण पर उतरें तो चुनाव के समय जिन भ्रष्टाचारी नेताओं को नित्य याद किया जाता था ,उन्हें कारागारों में पहुँच जाना चाहिए था।विदेशों में छिपाया धन देश वापस लाना चाहिए था और उसकी त्रैमासिक प्रगति दरबार -ए -आम में नियमित पढ़ी जानी चाहिए थी। प्रचारित किया गया था कि जी एस टी से रोजमर्रा उपयोग की चीजें सस्ती होंगी तो बजट में परिलक्षित होना चाहिए था और धरातल पर ऐसा ही दिखना चाहिए था।पेट्रोलियम पदार्थों को जी एस टी से बाहर रखने से तो  सरकार की नीयत ही कठघरे में खड़ी हो गई है क्योंकि यही एक वस्तु है जो सस्ती होने पर सस्ताई और महँगी  होने पर पूरे अर्थ व्यवस्था में महँगाई लाती है।इसकी कीमतें नियंत्रित कर रसोई घरों की रौनक बढ़ाई जा सकती थी। देश और अपनी पार्टी की  भलाई चाहने वाली सरकार को अब भी चाहिए कि वचनवद्धता एवँ पारदर्शिता को अविलम्ब पुनः  गले का हार बना ले।दिशा निर्देशों के बल पर सांसद और विधायक चाहे माननीय कहला लें या संवैधानिक शक्तियों से अपना वेतन भत्ता कल्पना की हद से परे तक बढ़ा लें , आम लोग इन्हें अनुज्ञाप्राप्त लुटेरा , अति निंदनीय प्राणी और योग्यता की कसौटी पर सरकारी ढांचे के न्यूनतम वेतन के लिए भी अयोग्य मानते हैं। अतः आम आदमी से जुटाए राजस्व को इनके ऊपर इस हद तक लुटाना जनता को बहुत चुभने लगा है। इस विषय पर युवा भारत की सोच को सांसद वरुण गाँधी ने आवाज देने का प्रयास किया परन्तु इन सर्व शक्तिमान लोगों को लूट पर मुहर लगवाने से वे नहीं रोक पाए।भारतीय संविधान आम आदमी के सब्र को ऐसे कब तक बाँध रखे गा; यह भारत भाग्य विधाता ही जानें।हमें भी पता है ,सरकार को भी पता है कि आज पाँच लाख रुपये वार्षिक आय से एक  परिवार का पालन पोषण कितना दुष्कर है फिर भी ऐसे लोगों को आयकर में घसीटा जा रहा है। आवश्यकता थी कि उन्हें इस बन्धन से मुक्त किया जाता और दस लाख की सीमा तक कर देयता दस प्रतिशत कर दी गई होती।सबके साथ सामान व्यवहार के आधार पर कृषि क्षेत्र को कर के दायरे में लाना चाहिए था।सर्वोपरि बात है कि हम सभी भारतीय कर देते हैं। अतः सभी का सरकारी  सुविधाओं पर  यथेष्ठ अधिकार है और वह हमें मिलना ही चाहिए।बहुत हो चुका असमान वितरण। अब नहीं चले गा।
***************वर्ष दो हजार चौदह में हुए लोकसभा चुनाव की पूरी दुनियाँ साक्षी बनी जब हमारे देश में  शासन की राष्ट्रपति प्रणाली न होने पर भी यह चुनाव हूबहू वैसे ही श्री नरेंद्र मोदी के लिए लड़ा गया और भाजपा अच्छी खासी बहुमत के साथ श्री मोदी जी नेतृत्व में सत्तारूढ़ हुई। जन जन ने उनके 'सबका साथ ,सबका विकास 'पर विश्वास किया। परन्तु जैसे जैसे समय बीतता गया, सरकार अपने वादों से दूरतर होती पाई गई।सरकार नित्य नए विचार व क्रियान्वयन के साथ जनता के बीच आती रही और चुनावी वादे व उनके क्रियान्वयन पीछे छूटते रहे। मोदी जी उत्तम किस्म के राजनीतिज्ञ होते हुए भी उसी प्रकार आधारहीन चाटुकार नेताओं से घिर गए जैसे कभी कांग्रेस का नेतृत्व घिरा रहता था। यदि मोदी जी जन धन की चौकीदारी ही सुनिश्चित कर दिए होते तो उन्हें आमजन को कुठाँव न मारना पड़ता।निःसंदेह जनता में अब भी मोदी जी की लोकप्रियता किसी भी अन्य नेता से अधिक बनी हुई है और सरकारी गाड़ियों से अति विशिष्ठता दर्शाने वाली लाल- नीली बत्ती  पर प्रतिबंध या स्वच्छता अभियान की भूरि भूरि प्रसंशा भी हुई है परन्तु यह तय है कि जनता आगामी चुनाव के समय उनसे सबके विकास ,चौकीदारी ,काले धन ,भ्रष्टाचार ,पारदर्शिता ,खुशहाली सूचकांक , स्वच्छ प्रशासन ,धारा तीन सौ सत्तर ,राम मन्दिर ,रोजगार इत्यादि पर प्रगति आख्या  माँगे गी।यह और रोचक होगा जब माननीयों की आर्थिक दीनता की चर्चा होगी क्योंकि सरकार की दृष्टि में वे ही गाँधी जी द्वारा रेखांकित पंक्ति में सबसे पीछे खड़े नजर आए हैं।सरकार के लिए गंभीर सोच का विषय है कि जिनसे देश बनता है ,समाज बनता है ,संस्कृति बनती है और सरकारें बनती हैं उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए। आज  मध्यम वर्ग आर्थिक चोट से घायल है और मोदी जी से निराश।------------------------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 16 अप्रैल 2018.                              mangal-veena.blogspot.com
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अंततःऋतु चर्चा
बसन्त को परास्त कर ग्रीष्म ऋतु ने अपने आगमन की भेरी बजवा दी है। भूमि जलस्तर, जलसंरक्षण,वृक्ष लगाओ ,वृक्ष बचाओ ,पर्यावरण इत्यादि पर कागजी और मीडिया वाली मौखिक परिचर्चाएँ भी प्रारम्भ हो चुकी हैं। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्यरत मेरे जेष्ठ बेटे ने चार अप्रैल को व्हाट्सएप्प पर एक बड़ा ही मर्मभेदी सन्देश भेजा जिसे मैं प्रासंगिकतावश आप सभी के अनुशीलन हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। कृपया देखें ," आम ,नीम ,पीपल और बरगद के पेड़ काटकर घर में मनी प्लांट लगाने वाले बुद्धिजीवियों को  भीषण गर्मी की शुभ कामना। "और फिर भारतेन्दु जी की इन पंक्तियों को गुनगुनायें ,"हम क्या थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी ?
ग्रीष्म सबके लिए मंगलमय हो। इस शुभेच्छा के साथ ---------------------------------मंगलवीणा
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बुधवार, 7 मार्च 2018

महिला दिवस

महिला दिवस ,आठ मार्च 2018
***************महिला का प्रथम नाम शक्ति ,दूसरा महिला नारी वुमन ,तीसरा अबला इत्यादि व चौथा आधुनिक अनेक नाम हैं जो आज के चलचित्रों व टीवी के कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे हैं।यह भी निर्विवाद है कि हमारे सामाजिक ताने -बाने में शक्ति का सन्तुलन सदैव महिलाओं के पक्ष में रहा है परन्तु इस शक्ति का महिला समाज में समान वितरण नहीं रहा है।इसी कारण महिला के अनेक उचित, अनुचित पर्याय बनते गए। क्या यह सच नहीं है कि महिलाओं के कुछ रूप, शक्ति सम्पन्नता के कारण, स्वामिनी जैसे हो जाते हैं तो कुछ ,शक्ति विपन्नता के कारण, दासी जैसे। गौर करने के लिए सास -बहू ,सधवा -विधवा ,मालकिन -धाय ,कुल बधू -नगर बधू  के उदहारण पर्याप्त होंगे।आप हमेशा भाई चारा की बात सुनते होंगे परन्तु महिलाओं में  बहिनत्व या बहिन चारे की बात कभी नहीं। कभी सपने में सुन भी लिए होंगे तो देखना तो गधे की सींग जैसी घटना होगी।
***************महिला दिवस पर महिलाओं को एक दूसरे को शक्ति के समतल पर लाने का प्रण करना चाहिए और बहिनत्व का नारा बुलन्द करना चाहिए। सच ही कहा गया है कि हम बदलें गे --युग बदले गा।जहाँ तक पुरुष की बात है ,वह महिला की संस्कारशाला से ही निकला उन्ही के साथ उन्हीं के लिए व्यवस्थाधीन जीने वाला प्राणी है और यदि कभी कोई पुरुष महिलाओं के साथ अभद्र होता है तो फिर ध्यान संस्कार की ओर ही जाता है।हाँ , पुरुषों का  परम कर्तव्य है कि वह महिलाओं में श्रद्धा भाव सदैव व प्रति पल रखे। छायावादी महा रचनाकार स्व जय शंकर प्रसाद जी ने भी कामायनी में यही कहा है कि ----
नारी तुम केवल श्रद्धा हो ही,
विश्वास रजत नग  पद तल में।
पियूष श्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
***************आज महिलाओं को ध्यान देना होगा कि वे न तो अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी बनें और न ही तू चीज बड़ी है -- बनें।उन्हें अपनी प्रगति के वर्तमान दौर में उपभोक्तावाद संस्कृति से सावधान रहते हुए अपनी गरिमा बनाए रखना होगा।श्रद्धा के लिए आचरण की योग्यता रखना महिलाओं का सर्वोपरि दायित्व है। यदि महिलाओं में यह योग्यता नहीं होगी तो वे आज की अपसंस्कृति की शिकार होती रहें गी। अतः आदरणीया या श्रद्ध्येया  को सत्यशः आदरणीया या श्रद्ध्येया ही बने रहना चाहिए।
***************यद्यपि आज महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र जैसे विज्ञान ,अंतरिक्ष ,कला ,साहित्य ,शिक्षा ,खेलकूद ,राजनीति ,नौकरी ,उद्यमिता इत्यादि में आसमान छूने छूने लगी हैं ;फिर भी उनकी सहभागिता सँख्या ऊँट के मुँह में जीरा जैसी ही है। समाज अपवाद की उन्नति से नहीं बनता है, समाज सामान्य की उन्नति से बनता है और यह तभी सम्भव होगा जब महिलाएं स्वयँ बढे गी और बहिनत्व भाव से अन्य महिलाओं को आगे बढ़ाएं गी।नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा भाव जताते हुए आज हम उन्हें उनकी शक्ति का सादर स्मरण कराते हैं।  ----- मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 08 . 03 . 2018
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अपनी बात भी -
***************वर्षों से आज का दिन मेरे लिए तो  अविस्मरणीय रहा है क्योंकि तैंतालीस वर्ष पूर्व  सन 1975 में आज के दिन ही मैं अपनी पत्नी वीणा सिंह के साथ परिणय सूत्र में बँधा था। जीवन में इस संयोग के लिए मैं अपने को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ।मेरी धर्म पत्नी जी एक सशक्त महिला हैं और हमारे परिवार संचालन में अपनी सशक्त भूमिका निभा रही हैं।सहमति- असहमति, प्रेम- तकरार,उतार -चढ़ाव के बीच हम दोनों  अच्छे सहयात्री हैं और अपनी नई पीढ़ी को सँवारने में ब्यस्त हैं। यह मंगलवीणा ब्लॉग जो वर्षों से आप स्नेही पाठकों एवँ मित्रों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है , हम दोनों के नाम युग्म का ही पुष्प गुच्छा है।अंततः महिला दिवस पर दुनियाँ की समस्त महिलाओं का सादर अभिनन्दन एवँ इस सुखद संयोग का आभार।-----------------------------------मंगला सिंह
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मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

चक्रव्यूह में फँसता भारतीय इतिहास

***************मध्यकाल से अब तक भारतीय इतिहास के तोड़ मरोड़ का क्रम जारी है। पद्मावती नाम के चलचित्र पर इस समय चल रहा विवाद इसका ज्वलन्त उदहारण है।इतिहास में रूचि रखने वाले हैरान हैं कि हजारों क्षत्राणियों के साथ जौहर करने वाली महारानी पद्मावती  के चरित्र में फिल्म बनाने वालों ने मनोरंजन का कौन सा विषय गढ़ लिया कि फिल्माँकन कर दौलत बटोरने की सोच ली। भारतीय इतिहास में हाथ डालने से पहले इन फिल्मकारों को भारतीय सिनेमा के इतिहास को याद कर स्वयँ झेंप लेना चाहिए कि ये लोग मनोरंजन को राजा हरिश्चन्द्र से पद्मावती तक की यात्रा में कहाँ से कहाँ पहुँचा दिए।शायद निर्माता और उसके कलाकारों को अनुभूति नहीं कि पद्मावती किन उच्च भारतीय आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती हैं।यदि किसी फिल्म निर्माता को ऐतिहासिक पद्मावती पर फिल्म बनानी है तो वह बनाने को तो स्वतन्त्र है परन्तु उसे शत प्रतिशत यह सुनिश्चित तो करना ही होगा कि उसकी अभिनेत्री हूबहू पद्मावती का चरित्र अभिनीत करे। उसे रंचमात्र भी  चरित्रान्तर या स्वयँ नायिका बनने का अवसर नहीं दिया जा सकता है। उन्हें बहुत स्पष्ट होना होगा कि वह पद्मावती का अभिनय कर रही हैं न कि वे स्वयँ किसी फिक्सन ,गल्प या दंतकहानी की नायिका हैं।
*************** फिल्मों में अभिनय करने वाले लोग  हमारे समाज या इतिहास के नायक -नायिका या हीरो- हीरोइन  नहीं हैं। ये मात्र अभिनेता और अभिनेत्री हैं।जिस पद्मावती फिल्म पर आज पूरे देश में विवाद व विरोध है वह पद्मावती भारत की ऐतिहासिक एवँ सांस्कृतिक गौरव की अद्वितीय नायिका हैं। उन्हें फिल्म निर्माता भन्साली ने अपनी कल्पना से नहीं उपजाया है कि व्यावसायिक हित में उसे जैसा चाहें वैसा गढ़ दें।अतः उन्हें यह छूट बिल्कुल नहीं मिलती कि हमारे ऐसी बेजोड़ नायिका के व्यक्तित्व को कहीं से भी हल्का करें। पद्मावती मनोरंजन नहीं गौरव गाथा की प्रकाश पुञ्ज हैं। पद्मावती वह गौरव गाथा है जिसे चित्तौड़ में अनुभव किया जा सकता है , राजपूताने में आज भी भाटों -चारणों से सुना जा सकता है,कर्नल टाड ,ओझा या इतिहासकारों को पढ़ा जा सकता है या मालिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को गाया जा सकता है।
***************किसी भी देश की जनता एवँ उनकी सरकारों का प्रथम कर्तव्य होता है कि वे अपने इतिहास को किसी दशा में विकृत या निज संस्कृति आक्षेपी न होने दें ताकि पीढ़ियाँ उस पर गर्व कर सकें ,उससे प्रेरित हो सकें और उनकी संस्कृति अबाध आगे बढ़ती रहे। यह ठीक है कि अतीत में भारतीय प्रायद्वीप की परिस्थितियाँ बहुत विषम थीं और इतिहास भी छोटे छोटे भूखण्डों में विभक्त होता रहा और इसका लाभ उठाते हुए विदेशी हमलावरों,मुग़लों  तथा बाद में अंग्रेजों ने भी भारत के इतिहास को ऐसे अंकित करने का प्रयास किया कि हम भारतीयों को हमारा अतीत लज्जाजनक लगे और बहुसंख्यकों में हीन भावना पनपती रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बामपन्थी ,काँग्रेसी ,मुस्लिमपंथी एवँ तुष्टिपंथी -  इतिहासकार भी एक निर्दिष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए हमारे इतिहास को पूर्ववर्तियों की दिशा में घसीटते रहे। ऐसे लोगों का सुनियोजित प्रयास रहा है कि  मध्यकालीन  आक्रमणकारियों और  नेहरू एवँ उनके परिवार जैसे लोगों की नायक वाली विरासत स्थापित हो सके तथा  राणा प्रताप ,सुभाष चन्द्र  बोस और बल्लभ भाई पटेल जैसे लोग इतिहास पटल पर मद्धिम होते जाँय । यहाँ तक कि इतिहास और हिन्दुत्व के खलनायकों को नायक और नायकों  को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने का क्रम जारी है।लोग भूले नहीं हैं कि  हाल में सत्ताधारी काँग्रेस द्वारा  बैंगलुरु में टीपू सुल्तान की जयन्ती मनाई गई। ये वही टीपू सुल्तान थे जो धुर हिन्दू विरोधी थे और तलवार के बल पर लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराया था।
*************** इस तरह की मानसिकता से प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास ,समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व प्राचीनतम सभ्यता को लगातार चोट पहुँचाने का प्रयास जारी है और फिल्म निर्माता संजय लीला भन्साली इसकी अद्यतन कड़ी हैं।बहुसंख्यकों की सहनशीलता का लाभ उठाते हुए ये लोग स्वार्थी इरादों के साथ इतिहास के गर्भगृह में घुसकर उसे नष्ट भ्रष्ट करने का दुस्साहस दिखाने लगे हैं।रानी पद्मावती ; बाजीराव की मस्तानी , वैशाली की नगर बधु,आम्रपाली  या चित्रलेखा ; नहीं हैं अतः उनका फिल्मांकन भी वैसे नहीं हो सकता कि  भंसाली  अलाउद्दीन खिलजी के रूप में स्वप्न लोक पहुँचे और अप्रतिम सुंदरी पद्मावती को नृत्य करते देंखें। भारतीय सिनेमा ने हमारे नैतिक मूल्यों को बहुत हानि पहुँचाया है।  चलचित्र जगत के लोग बहुधा कहते हैं कि वे दर्शकों को वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं। फिर सिनेमा वालों को मालूम हो जाना चाहिए कि वे भन्साली द्वारा बनाई गई पद्मावती बिलकुल नहीं देखना चाहते हैं और ऐसे सिनेमा न बनाये जाँय।वर्तमान रोष तो एक चेत वाणी है कि आने वाले समय में हमारे पौराणिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक एवँ ऐतिहासिक नायक ,नायिकाओं एवं अन्य चरित्रों  के चित्रण में छेड़ छाड़ का विरोध और प्रचण्ड होता जाय गा।
***************परिस्थितियाँ करवट ले चुकी हैं। आज पूरी दुनियाँ में हमारी उत्कृष्ट मानवतावादी सोच , संस्कृति ,दर्शन ,विरासत और प्रतिभा का डंका बजने लगा है और हम भारतवासी भारतीय कहलाने पर गर्व कर रहे हैं। देशवासियों और नई पीढ़ी को राष्ट्र के आतंरिक घातियों की समझ हो चुकी है और वे समय समय पर विरोध व प्रदर्शन कर ऐसे लोगों को सँभल जाने का सन्देश दे रहे हैं। सरकारें भी ऐसे षड्यंत्रकारियों पर नियंत्रण की दिशा में काम कर रही हैं।अतः समय की माँग है कि मनोरंजन अपने को मनोरंजन की सीमा में समेटे हुए चले तथा हमारे किसी भी अतीत और वर्तमान के नायक या नायिका के चरित्रान्तर का प्रयास न करे। लोकतंत्र तभी परिपक्व माना जाता है जब उसके नागरिक स्वतः अनुसाशन का आचरण करें और विरोध की स्थिति ही न बने। तब तक यदि हमारे इतिहास को चक्रव्यूह में फँसाया जायगा तो व्यूह रचने वाले नई पीढ़ी द्वारा बुरी तरह पराजित होंगे।
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वाराणसी :दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 ---------------------mangal-veena.blogspot.com
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अन्ततः
**हेमन्त बीतने जा रहा है  और जाड़े की दुंदुभी बज उठी है।  जो वातावरण शादियों के रेलम रेल व गुजरात के चुनाव से ही गरम था वह क्रमशः खरमास (15 दिसम्बर से प्रारम्भ ) व 18 दिसम्बरागमन के साथ ठंढा पड़ चुका है और बढ़ती ठंढ में अब ऊनी पहनावे के साथ कम्बल रजाई से ही गर्मी की आस है।
**भला हो गुजरात के उन मतदाताओं का जिन्होंने गुजरात मॉडल को बचा लिया और हमारे विश्वख्यात नेता नरेंद्र मोदी के साख को गृहराज्य में आँच नहीं लगने दिया।आशा है भाजपानीत सरकार गहन विश्लेषण करे गी और लोकहित की ओर तेजी से अग्रसर होगी। कुछ ऐसी शक्तियां भाजपा के अन्दर अवश्य हैं जो उससे जनाकांछा की शनैः शनैः अनदेखी करा रहीं हैं। यदि भाजपा नहीं संभलती है तो सोच ले कि प्रधान मंत्री जी के लिए जनता कब तक अपने अहित को सहन कर पाए गी।
**आगे इस ब्लॉग के माध्यम से सभी सुधी पाठकों को क्रिस्मस पर्व की शुभ कामनायेँ एवँ हार्दिक बधाई। हो सके तो जिन गर्म कपड़ों को अब  हम न पहनते हों , जरुरतमन्दों को ढूंढ़ कर उन्हें सादर हस्तगत करें। इस  छोटे प्रयास से मानवता की बड़ी सेवा होगी।प्रणाम।-----------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 19 दिसम्बर 2017 -----------------------mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 15 नवंबर 2017

गुजरात से शँखनाद या साइरन ?

***************आज की तिथि में गुजरात हमारे देश के कतिपय सर्वाधिक विकसित राज्यों में एक है और हमारी प्रगति का पर्याय है ।सकल घरेलू उत्पाद या प्रति व्यक्ति सालाना आय अथवा खुशहाल जिंदगी के मानक आँकड़ों की बात न कर केवल विभिन्न राज्यों से गुजरात जाकर वहाँ अपनी जीविका चलाने वालों की संख्या तथा उस राज्य के विकास पर उनकी राय ले कर गुजरात विकास की चकाचौंध करने वाली सच्चाई समझी जा सकती है।न्यूनाधिक सभी राज्यों , विशेषतया पिछड़े राज्यों, के लोग गुजरात के विभिन्न शहरों या कस्बों में काम करते मिल जाँयगे जबकि व्यवसाय से इतर जीविका के लिए अन्य राज्यों में गुजराती न के समतुल्य मिलें गे। यही है गुजरात का विकास मॉडल जो आम लोगों को दिखता है।
***************परन्तु हमारे देश के तथाकथित यायावर नेता जो पीढ़ियों से गरीब देश के अमीर लुटेरे हैं और जिनके लिए यूरोपीय व अमेरिकन देश सुगम व सुरम्य सैर- गाह हैं ,उन्हें गुजरात में कहीं विकास दिखता ही नहीं। ये वही लुटेरे हैं जिनकी मान्यता है कि जहाँ लूट के अवसर नहीं वहाँ विकास कैसा। सन दो हजार चौदह तक देश की गद्दी जुगाड़े इन लुटेरों का कृत्य जन जन को पता है फिर भी निर्लज्ज बगुला भगत सा विश्वास पाले गुजरात के मैदान में धर्म ,जाति ,सवर्ण , पिछडों और दलितों का जहर घोल कर ये विजय की आशा पाल रहे हैं।इन हारे हुए काँग्रेसी खिलाडियों के पास हारने को कुछ नहीं है पर खेल बिगाड़ने को बहुत कुछ है। वहीँ गुजरात की जनता एक बड़ी कसौटी पर चढ़ी हुई है। वह या तो भारतीय जनता पार्टी को विजय देगी या पराजय ।
***************देश के हर राष्ट्रप्रेमी नागरिक की आकांछा है कि गुजरात के लोग भाजपा को विजयश्री पहना कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक , सामाजिक तथा सामरिक सुधारों पर मुहर लगायें ताकि देश विदेश को एक संदेश मिल सके कि जिस  मोदी ने वर्षों तक गुजरातियों की बेहतरी के लिए साधना किया और जिस जनता ने उन्हें आज प्रधान मन्त्री के पद तक पहुँचाया वे आज भी थोड़ी दुश्वारियों के बावजूद  एक दूसरे के लिए चट्टान की भाँति खड़े हैं। याद रहे कि आर्थिक उतार- चढ़ाव तथा मत भिन्नता के बाद भी मोदी जी राष्ट्रवाद ,राष्ट्रभक्ति ,राष्ट्रगौरव व सर्वोपरि -राष्ट्र वाली अवधारणा के बेजोड़ नायक व आशा के किरण पुञ्ज हैं। इस तथ्य को हमें किसी भी पल दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते क्योंकि सावधानी हटी कि देश लुटा।
***************दूसरी अर्थात पराजय की स्थिति में स्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाँयगे और सारे विपक्षी नेता एक होकर देश को सन चौदह से पूर्व की स्थिति में घसीट ले जाने व सत्ता सुख के बंदरबाँट का पुरजोर प्रयास करेंगे।फलतः बचे डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार को उग्र विपक्षी विरोध का सामना करना होगा जिससे सरकार की दृढ इच्छाशक्ति डगमगा सकती है।हार भाजपा की होगी परन्तु खुशियाँ विघटनकारी नेता व पार्टियाँ मनाएँ गी। जो  कारण मतदाताओं को भाजपा के विरोध में जाने को प्रेरित कर सकते हैं वे क्रमशः पाटीदारों का आरक्षण के नाम पर प्रबल विरोध ,दलितों में उकसाया गया छद्म असंतोष ,व्यवसाय पर जीएसटी का कुप्रभाव ,पेट्रोलियम पदार्थों की घटी कीमतों का लाभ जनता को न देना ,स्थानीय भाजपा नेताओं के प्रति विकर्षण तथा सबसे ऊपर राज्य स्तर पर मोदी जी जैसे चमत्कारी नेता की अनुपलब्धता हैं।
*************** निश्चय ही राष्ट्रवाद की छाँव में भाजपा  यह भूल रही है की सरकार अपनी जनता के लिए एक चुनी हुई कल्याणकारी संस्था होती है और बिना कोई संकट की स्थिति आए वह जनता को आर्थिक बेहतरी के बदले आर्थिक बदहाली नहीं दे सकती।आम जन की जेब पर दबाव पड़ेगा तो समर्थन भी घटे गा।फिर भी दबाव ने कोई लक्ष्मण रेखा नहीं पार किया है कि जिस दल के सरकार ने गुजरात में वर्षों तक बेहतरीन परफॉर्मन्स दिया ,गुजरात को आधुनिक गुजरात बनाया व देश को मोदी जी जैसा अद्वितीय नायक दिया ;उसे राज्य से सत्ताच्युत कर दिया जाय।
***************सरकारी सेवा में रहते हुए उन्नीस सौ नवासी से वानवे तक मुझे गुजरात के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करने व वहाँ के विभिन्न वर्ग व समुदाय के  लोगों के साथ जब संपर्क का अवसर मिला तो समझ आई  कि प्रभु श्रीकृष्ण को द्वारकापुरी  रास क्यों आई याकि गाँधी जैसे सत्य एवँ अहिँसावादी और पटेल जैसे  लौहपुरुष वहीँ क्यों उपजे। वहीँ समझ सका कि पानी की कमी से जूझते प्रदेश में  अमूल जैसी श्वेत क्रान्ति ,खूबसूरत दस्तकारी ,वस्त्रोत्पादन ,हीरा उद्योग या अन्य भारी उद्योग क्यों परवान चढ़ पाए।वास्तव में शुद्ध भारतीय परिवेश व मीठासमयी संस्कृति को सँजोए हुए गुजरातियों में गजब की उद्यमिता एवँ संघर्ष क्षमता है। उन्हें सरकार  से मात्र  सरकार जैसी व्यवहार की अपेक्षा रहती है। उन्हें सरकार से सार्वजानिक सुविधा ,संरचना ,सुरक्षा और व्यवसाय परक वातावरण चाहिए न कि व्यक्तिगत सुविधाएँ। इस राज्य में मोदी जी के सफलता का मन्त्र भी यही रहा है। आज के संशय का कारण भी स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा इस मंत्र का थोड़ा बहुत विकृत किया जाना लगता है।
***************सभी धन ऋण  विचारों के समायोजनोपरान्त कहा जा सकता है कि मोदी जी के बाद की प्रदेश सरकार यदि पूर्ववत जनता के प्रति संकल्पित रही है और स्थानीय भाजपा के नेता जनता से मित्रवत संवाद में रहे हैं तो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए गुजरात के मतदाता भाजपा को विजय श्री देंगे। उभरते भारत में हो रहे बदलाव के दौर में जीएसटी से उत्पन्न अस्थाई व्यावसायिक कठिनाइयोँ  के कारण भी वे भाजपा को नहीं नकारें गे। हिमाँचल प्रदेश की भाँति वहाँ एन्टी इनकम्बेंसी जैसा कोई गुणक भी काम नहीं करेगा। ऐसे में भाजपा के हार की सम्भावना बहुत दूर तक नहीं है। हारे गी तभी यदि सत्तारूढ़ सरकार ने सरकार के लिए निर्धारित लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण किया होगा। जीत से भाजपा नीत केंद्र सरकार के आर्थिक सुधारों व विकास कार्यक्रमों  को और तीब्र आवेग (मोमेंटम )मिले गा अन्यथा  हार, आवेग में अस्थाई ठहराव का,गुजरात से एक साइरन होगा। फिर सिंहावलोकन की स्थिति बने गी और पुनः नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में  इन्हीं सुधारों व विकास को प्रचंड समर्थन मिलेगा  क्योंकि भारत को दुनियाँ मेँ अपना मुकाम पाना है और हम आम भारतीयों के लिए सबसे पहले भारत है।
वाराणसी ;दिनाँक 14 नवम्बर 2017         ------------------------------------ मंगलवीणा
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अंततः
 **********समूचे उत्तरभारत में दीपावली से आरम्भ हुए नव वर्ष का स्वागत धुन्ध ,धुँए ,गुबार व कुहरे से हुआ है। स्वागत भी ऐसा कि लोगों का श्वाँस लेना दुश्वार। सभ्य भाषा में स्मॉग  कहर बरपा रहा है और हम लोग जैसी करनी वैसी भरनी पा रहे हैं।
**********आश्चर्य होता है कि नए वर्ष का शुभारम्भ हुआ है और अगहन या मार्गशीर्ष का वह मनोहारी महीना चल रहा है जिसकी महत्ता में  प्रभु कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि ऋतुओं में बसन्त ऋतु और महीनों में मार्गशीर्ष का महीना मैं ही हूँ।यथा -
*****बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहं।
*****मासानां मार्गशीर्षः अहम् ऋतुनां कुसुमाकरः। 35 /10 श्रीमद्भगवद्गीता
**********ऐसे महीने में पर्यावरण को स्वयं प्रदूषित कर मानवता कराह रही है। धन्य हैं विज्ञान के उत्कर्ष युग या इस कल युग में जीने वाले हम विद्वान् लोग कि धरती को स्वर्ग न बना नरक बना डाले।क्यों न हम अपनी तुलना मूर्ख कालिदास से करें और कवि कालिदास की ओर अग्रसर हों।
वाराणसी                                                                              -------- मंगलवीणा
दिनाँक:14 नवम्बर 2017                                     mangal-veena.blogspot.com
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बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

आपदाओं के भँवर में फँसती मानवता

***************मानवता के हत्यारों में एक और नाम स्टीफन पैडक जुड़ गया।अमेरिका के लॉस वेगास शहर में संगीत कॉन्सर्ट देख रहे आम जन समूह पर इस क्रूर हैवान ने पास के एक होटल के बत्तीसवें तल पर स्थित कमरे से चंद मिनटों में इतनी गोलियाँ बरसाई कि पचास के आस पास लोगों की जानें गई और कई सौ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।इस भयावह मास शूटिंग की घटना को सदियों तक भूला नहीं जा सके गा।घटना के बाद रस्मी तौर पर हम तथाकथित सभ्य लोग मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए पूर्व की भाँति प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं परन्तु भविष्य में ऐसी कृतिम आपदाएँ कहर न ढायें,इसके लिए न तो हम मतैक्य से सुदृढ़ व्यवस्था बनायेँ गे,न अपराध बोध के लिए प्रभु से क्षमा माँगेगे और न ही मानवता को सन्मति देने के लिए महात्मा गाँधी की भाँति  नियमित समूह प्रार्थना करेंगे ।
***************यह दुखद किन्तु सत्य है कि तकनीक के वर्तमान दौर में कृतिम या मानव निर्मित आपदाएँ धरती के हर हिस्से में प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में ज्यादा भयावह और दिल  दहलाने  वाली कहर ढा रही  हैं । मजबूर एवँ असहाय मानवता जब और जहाँ कृतिम आपदाओं से हत हो रही है,पीड़ित लोग अश्रु भरे आँखों से एक ही प्रश्न पूछते हैं कि उनकी गलती क्या थी ?उत्तर सभी को पता है परन्तु निदान के नाम पर सारे राष्ट्र व सारी संस्थाएँ अंधकार में लाठी पीटने जैसा स्वाँग कर रही हैं।अधिक क्या कहा जाय ; अमेरिका जैसा संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र भी ऐसी कृतिम आपदाओं को रोकने में दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखा पा रहा है। इस धरती पर बसने वाली सम्पूर्ण मानवता न जाने किस दिन की प्रतीक्षा कर रही है।
***************वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं जैसे अतिवृष्टि,जलप्रलय , बादलों का फटना ,भूकंप ,ज्वालामुखी ,समुद्री या चक्रवाती तूफान इत्यादि को मनुष्य अपने उद्भव काल से आज तक अनवरत झेलता आ रहा है और ये आपदाएँ वैसी ही भयावह और विनाशकारी बनी हुई हैं।फिर भी इन्हे हम इस लिए झेल जाते हैं क्योंकि ये प्रकृति प्रदत्त हैं जिन पर मनुष्य का दैव -दैव कहने के सिवा कोई वश नहीं है। दूजे इन आपदाओं से निपटने में सारी मानवता सामंजस्य बिठा कर एक साथ खड़ी हो जाती है। और तीजे सभ्यता एवं वैज्ञानिक प्रगति के साथ मनुष्य ने इनके प्रभाव को कमतर करने में दक्षता  भी प्राप्त कर लिया है। परन्तु इनसे भी विनाशकारी आपदाओं का कहर आदमी ,आदमी पर, बार -बार और लगातार ढा रहा है जिसके लिए न हम दैव -दैव कर सकते हैं न प्रकृति को कोस सकते हैं।सुरक्षा या संहार के नाम पर मानव निर्मित एटमी हथियार आज   दुनियाँ में किसी भी प्राकृतिक आपदा से ज्यादा प्रलयंकरी आपदा हैं।सबसे बड़ा डर है कि कहीं मानव निर्मित नाभिकीय आपदाएँ कभी इस प्यारी धरती को पूर्णरूपेण मानव विहीन न कर दें।वस्तुतः इतिहास प्रमाण है कि जहाँ  कहीं कृतिम आपदाओं से नरसंहार हुए हैं या हो रहे हैं ,उनके पीछे विचार धारा  या सत्तात्मक  वर्चस्व ,धार्मिक या नश्ली द्वेष किंवा लापरवाही या संवेदन शून्यता जैसे मूल कारण ही पाए गए हैं।
***************वर्तमान समय में इस विश्व व्यापिनी आपदा ने पूरी एशिया और विशेषतया भारत को अपने ताण्डव की रंगभूमि बना डाली है। प्राकृतिक आपदाएँ जैसे बाढ़ ,सूखा ,शहरों में जल प्रलय ,समुद्री तूफान इत्यादि से तो हम दो चार तो होते ही रहते हैं परन्तु कृतिम आपदाएं तो पूरे देश को निरन्तर रुला रही हैं।राजनीति से निर्मित आपदा का ज्वलंत उदहारण सन उन्नीस सौ सैतालिस में हुआ भारत का विभाजन है जिसने लाखों लोगों की जाने ले ली और करोड़ों लोगों को जन्मभूमि छोड़ने व बेघर होने को विवश किया। पीढ़ियाँ उस आपदा के दंश से अब भी पीड़ित हैं। उसी आपदा के पार्श्व प्रभाव में  आए दिन पश्चिमी सीमा पर आज भी गोली बारी से वहाँ के निवासियों व सीमा प्रहरियों की जानें जा रही  है।धार्मिक कट्टरवाद व देश विघटन के लिए प्रायोजित आतंकवाद या नक्सलवाद जैसी जघन्य और अमानवीय आपदाएँ मानव निर्मित ही तो हैं। धार्मिक आपदाओं का तो कहना क्या। स्नान ,दर्शन और प्रवचन श्रवण के लिए भीड़ ,अव्यवस्था फिर भगदड़  और अनगिनत मौतें इस देश में प्रायः सुनाई देती हैं।मानवीय लापरवाही के चलते अस्पताल , रेल ,बस कार व अन्य सड़क दुर्घटनाओं द्वारा प्रति वर्ष कई हजार लोग काल कवलित हो रहे हैं। जाँच होती रहती है,सीख़ लेने और भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न होने देने की बात भी होती है परन्तु ये आपदाएँ हैं कि मानती नहीं और यत्र तत्र सर्वत्र कहर बरपाती ही रहती हैं।इस समाज में कहीं भी किसी बेटी या बहन का किसी दरिन्दे द्वारा बलात्कार हो जाना उस पीड़ित परिवार के लिए सबसे दुसह आपदा है।और तो और जिस देश में गौतम और महात्मा जैसे महामानवों ने अहिंसा का सीख दिया हो उस देश में हिंसक प्रवृत्ति का बढ़ना किस आपदा से कमतर है।
***************इन सारी आपदाओं के बीच मानव सभ्यता के पास कुछ ऐसी संजीवनी विशेष तो है कि परिस्थितियों से जूझते और उनपर विजय पाते हुए वह सभ्यतर होती रही है।यह संजीवनी ही परिणामी रूप में व्यवस्था है जिसे सदैव हर रचनात्मक या विध्वंसक उपलब्धि से ज्यादा  सक्षम और चुस्त - दुरुस्त बनाना होगा ताकि बिपरीत परिस्थितियों में मानव निर्मित आपदाओं को घटने की स्थिति ही न आने दे।इस समूची धरती पर मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति प्रेम,सहकार तथा सहयोग से ऐसी व्यवस्था साकार हो सकती है।यह ठीक है कि ऐसी व्यवस्था की स्थापना में अभी हम वाँछित सफलता नहीं पाए हैं। फिर भी प्रयास जारी रहना चाहिए क्योंकि प्रयासी कभी असफल नहीं होते।ऐसे ही राह पर आई कैन नामक संस्था, धरती को नाभिकीय आयुधों से मुक्त करने के लिए,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  प्रयासरत है।वर्ष दो  हजार सत्रह के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार इंटरनेशनल कम्पेन फॉर अबॉलिशन ऑफ़ न्यूक्लियर वेपन (ICAN)  को देकर नोबेल समिति ने इस प्रयास पथ पर मुहर लगा दिया है। अतः उसे साधुवाद और सराहना मिलनी ही चाहिए। ऐसे ही समन्वित प्रयास  से उपजी व्यवस्था हमें आपदाओं के भँवर से  सदैव बाहर निकालती रहे गी और बेहतरी की यात्रा आगे बढ़े गी ।अनादि काल से न जिंदगी कभी थमी है न कभी थमे गी क्योंकि यह धरती परमेश्वर और प्रकृति की अनूठी कृति है।--------------------------------------------------------------------------------------------मंगलवीणा
वाराणसी ;दिनाँक 12 अक्टूबर 2017 .                          mangal-veena.blogspot.com
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रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता दिवस

स्वार्थ की तीन स्थितियाँ होती हैं -जुड़ाव, टकराव और न जुड़ाव न टकराव ।
पहली से मित्र व सम्बन्धी बनते हैं,दूसरी से शत्रु तथा तीसरी से तटस्थ अर्थात न मित्र न शत्रु जैसे सड़क, रास्ते या अन्यत्र कहीं किसी का मिल जाना ।
मित्रता दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने स्वार्थ को कभी भी अपने सम्बन्धी या मित्र के स्वार्थ से टकराने नहीं देंगे ताकि वे हमारे अपने सदैव बने रहें ।शुभम्अस्तु ।-------मंगलवीणा
वाराणसी ,दिनाँक 0 6 अगस्त 2017 -------------------------------------------mangal-veena.blogspot.com
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मंगलवार, 4 जुलाई 2017

किसान भी बदल गए

***************निश्चय ही भारत बदल रहा है। वोटतन्त्र के कारण हमारे देश में  आरक्षण ,सुविधा  एवं छूट माँगने तथा उन्हें पाने वालों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी  बढ़ती जा रही है।जनता के लिए सुविधाओं का बढ़ना जहाँ अर्थ ब्यवस्था के बढ़ते सामर्थ्य  की परिचायक है वहीँ आरक्षण और छूट देश की प्रगति में सबसे बड़े वाधक हैं।इन्हीं बाधाओं के परिपेक्ष्य में कृषि ऋण माफ़ी के लिए किसानों का,अपने मूल स्वभाव की लक्ष्मण रेखा लाँघ कर, आन्दोलित होना  इस वर्ष की सर्वाधिक अचंभित करने करने वाली घटना है।इसे अन्य आंदोलनों की दृष्टि से देखना बहुत बड़ी भूल होगी क्योंकि इतिहास के क्रम  में आज भारत जहाँ पहुँचा है; उसका प्रथम श्रेय भारत के कृषक एवं कृषि को जाता है और कल भारत विश्वपटल पर कहाँ होगा ;यह भी कृषि के विकास एवं कृषक की खुशहाली पर निर्भर होगा।  अतः तमिल- नाडु  ,महाराष्ट्र ,मध्यप्रदेश ,पंजाब ,राजस्थान ,कर्नाटक व अन्य राज्यों में उठे किसान आंदोलन ,उनकी पृष्ठभूमि ,कारण और निवारण पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। जिसे समाज अन्नदाता और जीवन दाता कहता रहा वह उचित मूल्य पर  साधन ,सुविधा की अपेक्षा से हट कर सरकारों से ऋण माफ़ी ,मुफ्त की बिजली ,छूट की खाद ,छूट के अन्य सारे संसाधन व फसल की ऊँचे दाम पर सुविधापूर्ण विक्री माँग रहा है।बहुत अटपटी बात है कि सास्वत दाता आदाता की भूमिका में सामने है।
***************विगत कुछ वर्षों से किसानों में आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ी हैं परन्तु आत्महत्या करने वालों की सूची में केवल  किसान ही हैं ;ऐसा नहीं है। नौकरी या सेवा क्षेत्र के लोग ,उद्योग करने वाले ,व्यवसायी ,छात्र ,व अन्य सभी वर्ग के लोग भी आत्महत्या करते रहे हैं और उनकी आत्महत्या के लिए उत्तरदायी आर्थिक ,वैयक्तिक  व मनोवैज्ञानिक कारणों की चर्चा भी सामने आती रही हैं।सारी दशाएँ समान होते हुए मात्र कृषक होना कोई ऐसा कारण नहीं है जो सहानुभूति विशेष की पृष्ठभूमि बनाती हो। हाँ ,चूँकि हमारा देश कृषि प्रधान देश है और आधा से ज्यादा आबादी कृषि से जुड़ी है,अतः इसकी बेहतरी के लिए सरकार एवं समाज के अन्य वर्गों द्वारा सर्वाधिक ध्यान  देने एवं सुविधाएँ बढ़ाने की अपेक्षा है।यदि तकनीक ,ऋण ,बिजली ,सिंचाई ,कृषि बीमा ,खाद ,बीज ,उत्पाद विपणन व  भण्डारण के साथ किसानों को नियमित विशेषज्ञ परामर्श की सुविधा मिलती रहे तो पारिवारिक ,सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व निर्वाह के लिए उसे अग्रिम पंक्ति में खड़ा दीखना चाहिए। उपभोक्तावाद के चलते विलासिता की वस्तुयें भले ही आज किसानों के लिए भी अपरिहार्य हो गई हैं परन्तु एक किसान को ऐसी इच्छा पूर्ति के लिए कभी भी फसली ऋण नहीं लेना चाहिए और हर हाल में अपनी रफ एवं टफ की छवि बनाये रखना चाहिए। स्व लाल बहादुर शास्त्री जी द्वारा दिया गया 'जय जवान -जय किसान 'का नारा किसानों को भी बहुत गहरा सन्देश देता है।एक किसान की जो छवि लोगों की दिलों में है ;उससे विरत होने पर आज उनकी गरिमा खण्डित हो रही है।
*************** किसान और किसानी को वर्तमान पड़ाव तक पहुँचाने वाले निमित्तों की जानकारी हेतु  उनसे जुड़ी मूल बातों पर ध्यान देना सन्दर्भ सहायक होगा।यथा साधरणतया खाद्यान्न, तेल ,मसाले, दूध  ,फल -सब्जी,गन्ना ,कपास इत्यादि  के उत्पादन ,पशुपालन ,बागवानी व उनसे जुड़े अन्य विविध क्रियाकलापों को खेती या किसानी तथा इन कामों में लगे लोगों को खेतिहर या किसान कहते हैं और खेती का सीधा सम्बन्ध खेत या जमीन से होता  है।फिर बात जब खेत और किसान की की जाय तो जहाँ हमारे देश में खेती योग्य जमीन घट कर आधी से भी कम बची हैं ,वहीँ सारे विकास और औद्योगीकरण के बाद भी कृषि पर निर्भर कुल जन संख्या देश की पूरी जनसँख्या की आधा से अधिक है।आज की स्थिति यह है कि आबादी के बढ़ते और परिवारों के बँटते तीन चौथाई से अधिक किसानों के पास चार बीघे या उससे कम कृषि योग्य जमीन बची हैं। इतना ही नहीं ,गाँवों में देश के सर्वाधिक बेरोजगार बसते हैं और वे भी अपने परिवारिक कृषि से जुड़ जाते हैं। ऐसे में लघु और सीमांत स्तर की खेती व इससे जुड़े अन्य उद्यमों में इतनी उत्पादकता शेष नहीं है कि इतनी बड़ी जनसँख्या को समाहित कर उपभोक्तावादी खुशियाँ सुनिश्चित कर सके।यह भी तथ्य कान खड़ा करने वाला है कि इतनी बड़ी मात्रा में मानव संसाधन एवं कृषि भूमि खपने के बाद भी भारत की कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान सप्तमांश के आस पास ही है। संकेत स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र में सराहनीय प्रगति के बावजूद विगत वर्षों में योजनाकारों ने इस क्षेत्र की सारी समस्याओं एवं भावी परिदृश्य पर ध्यान नहीं दिया।उल्टे वोट की राजनीति ने इन समस्याओं और अनुचित प्रलोभनों को सत्ता पाने का हथियार बना डाला।परिणाम सामने है। राजनीति से सुचिता गई और कृषि की मर्यादा डगमगाई ।
***************यदि राजनीति एवं अनुचित लोभ को अलग रख कर देखा जाय तो देश की प्रगति  में अद्वितीय योगदान के लिए  हर देशवासी को  किसानों पर सदैव गर्व  रहा है।ये किसान ही हैं जिन्होंने खाद्यन्न के लिए देश को आत्मनिर्भर ही नहीं निर्यातक भी बनाया। उनके ही पसीने से जहाँ उत्पादन में कई  गुणा बढ़ोत्तरी हुई वहीँ कृषि में नए -नए अवसर व विविधताएँ जुड़ी। भविष्य में इनके और बढ़ने की अपार  संभावनाएं हैं।एक समय था  जब खाद्यान्न की कमी के कारण देशवासियों से सप्ताह में एक दिन अन्न न खाने की अपील हुआ करती थी तथा पी एल चार सौ अस्सी के अंतर्गत आयातित गेहूँ ,मक्के के आटा पाने को भागम -भाग मचती थी ,आज उसी भारत के गोदामों मेँ पड़े अधिशेषों  का निष्तारण कठिन हो रहा है। इसका सम्पूर्ण श्रेय दीर्घावधि की हरित व श्वेत क्रांति जैसी सफल योजनाओं एवं हमारे कृषकों को ही जाती है। आज उन्नत कृषि का वह दौर है जब हमारे राज्यों में  कृषि उत्पादन बढ़ाने व किसानों की कमाई बढ़ाने की होड़ मची है और मध्यप्रदेश जैसे राज्य अधिक उत्पादन से उपजी समस्या झेल रहे हैं क्योंकि कृषकों के उत्पाद खरीदने वाले नहीं मिल रहे हैं। आपूर्ति बढ़ रही है परन्तु माँग परंपरागत एवं पूर्ववत है।फसल न बिकने ,उचित मूल्य न मिलने या फसल वर्बाद होनेसे ऋण लेने वाले किसान बैंकों को ऋण की अदायगी नहीं कर पा रहे हैं ,जिस कारण तनावग्रस्त हो रहे हैं।यही समस्यायें किसानों को आत्महत्या या आंदोलनों के लिए प्रेरित कर रही हैं।परन्तु स्वभावतः कठिनाइयों से जूझने वाले किसान, जिनसे संयम ,साहस और सहनशीलता भी परिभाषित होते रहे हों ,उनका उद्वेलित होना , हिंसात्मक आंदोलन पर उतरना,ऋण माफ़ी जैसा प्रगति विरोधी माँग करना या अवसादग्रस्त हो आत्महत्या करना सबको चौंका रहा है। कहाँ हैं स्व मैथिली शरण गुप्त की कविता में वर्णित किसान --
---------------------------------घनघोर वर्षा हो रही है ,गगन गर्जन कर रहा 
----------------------------------घर से निकलने को गरज कर ,वज्र वर्जन कर रहा 
----------------------------------तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं 
----------------------------------किस लोभ में वे आज भी,लेते नहीं विश्राम हैं  
 ***************  समय का निर्देश है कि आमदनी  के लिए किसानों द्वारा उपजाई पैदावार की शत प्रतिशत एवं उचित मूल्य पर त्वरित विक्री सुनिश्चित हो साथ ही उनके फसल ,पशुधन व बाग -बगीचों की व्यावहारिक एवं प्रचुर बीमा हो।शत प्रतिशत खरीद या खपत तभी सम्भव हो सकती है जब बहुत बड़े स्तर पर भण्डारण ,संरक्षण ,प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण हेतु उद्योगों की श्रृंखला स्थापित हों।कृषि उत्पादों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक त्वरित पहुँच के लिए एक अलग विशेष यातायात संजाल  की स्थापना भी समस्या समाधन की अनेक उपायों में एक है। इन नई आवश्यकताों से उपजी कृषि क्रान्ति को धरातल पर उतारने का समय है और सरकारें भी इसके लिए गंभीरता से आगे बढ़ रही हैं।देश की कृषि पर आधारित आबादी कितनी भी बढ़ जाय ,हमारी जोत जमीन की उर्वरा शक्ति एवं जलवायु की विविधता सबको समायोजित करने एवं खुशहाल रखने की सामर्थ्य रखती हैं। आवश्यकता है तो मात्र कुशल प्रबन्धन ,संयम एवं सही दिशा की।समस्याओं से अवसर पैदा होते है।अतः धैर्य पूर्वक समस्याओं से जूझना चाहिए। आत्महत्या कर अपने परिवार को बिपत्तिओं में झोंक जाना या हिंसा कर किसी और का घर उजाड़ देना,अथवा देश की सम्पत्तिओं को छति पहुँचाना, हमारे अन्नदाता किसान का चरित्र नहीं हो सकता है। ऐसे में विचारणीय है कि कहीं छद्म किसानों ने तो किसान आंदोलन नहीं खड़ा किया है या कृषक बन कर इतर लोग तो बैंकों से इतर उद्देश्यों के लिए ऋण ले- लिवा रहे हैं; फिर माफ़ी के लिए आन्दोलन चला रहे हैं।एक बार ऋण माफ़ी हो भी जाय तो क्या इसकी पुनरावृत्ति हो सके गी ? नीर क्षीर विलगाव न होने से यह बात आम हो रही है कि किसान भी बदल गए।---------------------------------------------------------मंगल वीणा
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वाराणसी ,दिनाँक 4 जुलाई 2017                                              mangal-veena.blogspot.com
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